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उत्तर प्रदेश चुनाव 2022: जनता की मुश्किलें भले ही बढ़ी हों, लेकिन सूबे में बहुत आसान नहीं हैं विपक्ष की राहें

Tue, 04 Jan 2022 07:57 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Tue, 04 Jan 2022 07:57 PM IST
सार

प्रयागराज में भाजपा ने 2017 में 12 में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार मुकाबला काफी कांटे का होने की संभावना है। भाजपा और संघ से जुड़े एक नेता भी मानते हैं कि नौ तो नहीं 5-6 सीटें भाजपा को मिलनी तय हैं। इसका एक कारण वह कुछ गोलबंदी और कुछ सरकार विरोधी लहर को देते हैं...

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Uttar Pradesh Election 2022: people are facing so many difficulties but still want to vote BJP, Samajwadi party facing big challenges
अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

विस्तार

श्रावस्ती जिला थोड़ा पिछड़ा जरूर हैं, लेकिन लोग काफी जगरुक हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में यहां की दो सीटों पर भाजपा और बसपा के उम्मीदवारों को सफलता मिली थी, लेकिन इस बार राह बहुत आसान नहीं है। समाजवादी पार्टी ने पूरा जोर लगा रखा है। बहराइच के बगल का यह छोटा सा जिला भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित है। जिले में राजनीतिक चहल-पहल तेज है। बहराइच से लेकर गोरखपुर तक और गोरखपुर से गाजीपुर, आजमगढ़ तक हर 40 किमी पर राजनीति का एक अलग ढंग देखने को मिल रहा है। इस पूरे क्षेत्र पर भाजपा जहां अपना दबदबा बनाए रखने के लिए पूरा जोर लगा रही है, वहीं समाजवादी पार्टी को इसी क्षेत्र से लखनऊ का रास्ता आसान सा दिखाई पड़ रहा है।

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आजमगढ़ में सपा से विधायक दुर्गा प्रसाद यादव कहते हैं कि भाजपा केवल दु्ष्प्रचार करने, हल्ला मचाने में तेज है। लेकिन इस बार उसकी कोई चाल सफल नहीं होगी। गोरखपुर में भी समाजवादी पार्टी ब्राह्मण और राम भुआल निषाद के परिवार की पुरानी टीम के सहारे बड़ी गोलबंदी करने में जुटी है। गाजीपुर में ओमप्रकाश राजभर के साथ आने से समाजवादी पार्टी को काफी ताकत मिली है, लेकिन इसके बाद भी उसकी राह बहुत आसान नहीं है। गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर में भी समाजवादी पार्टी को 2012 जैसा चुनावी नतीजा लाने के लिए नाको चने चबाने पड़ सकते हैं।

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भाजपा के लिए किला बचा पाना मुश्किल

प्रयागराज में भाजपा ने 2017 में 12 में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार मुकाबला काफी कांटे का होने की संभावना है। भाजपा और संघ से जुड़े एक नेता भी मानते हैं कि नौ तो नहीं 5-6 सीटें भाजपा को मिलनी तय हैं। इसका एक कारण वह कुछ गोलबंदी और कुछ सरकार विरोधी लहर को देते हैं। हालांकि पूर्वांचल के 16 जिलों के जनसंपर्क प्रभारी रह चुके सूत्र का कहना है कि अभी चुनाव की अधिसूचना जारी नहीं हुई है। उम्मीद है कि मतदान के पहले चरण तक काफी कुछ ठीक हो जाएगा। देवराज प्रजापति विहिप के नेता हैं। देवराज का कहना है कि अन्य पिछड़ी जातियों में समाजवादी पार्टी ने भी कुछ सेंध लगाई है। दूसरे बसपा कहीं भी चुनावी मैदान में तेजी नहीं दिखा रही है। इसलिए अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। देवराज कहते हैं कि भाजपा की सीटों की संख्या कम होगी, लेकिन सरकार भाजपा की ही बनेगी।

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बीएमवाईओ के सहारे अखिलेश पार करना चाहते हैं 2022 की नैया

टीम अखिलेश की नजर बीएमवाईओ (ब्राह्मण, मुस्लिम, यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग) पर है। इसके लिए ब्रह्मा देश समागम का आयोजन किया जा रहा है। सुशील चंद्र दुबे, ओम प्रकाश दुबे, बाबा समेत तमाम कार्यकर्ता और पूर्व विधायक ब्राह्मणों पर डोरे डालने में लगे हैं। सपा के रणनीतिकारों को उम्मीद हैं इस बार उन्हें अल्पसंख्यक और यादव मतदाताओं का पूरा समर्थन मिलेगा। इसके अलावा बड़ी संख्या में पिछड़ी जातियां भी समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ रही हैं। इसमें कोईरी, कुनबी, पटेल, मौर्या, वर्मा, राजभर, नोनिया, धोनिया, पासी, केवट, कोहार, मल्लाह समेत अन्य हैं। बताते हैं कि पिछले चुनाव में पटेलों ने अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल का साथ दिया था, लेकिन इस बार वह उनकी मां कृष्णा पटेल के साथ लामबंद हो रहे हैं। कृष्णा पटेल का समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल है।  


सत्ता पक्ष की कहां बढ़ रही हैं मुश्किलें
सहूलियतों के नाम पर जनता को एक्सप्रेस-वे की सौगात मिल रही है, लेकिन दुश्वारियां भी जस की तस हैं। गोरखपुर से लेकर प्रयागराज तक हर गांव में किसान की परेशानी भी करीब-करीब एक जैसी है। सभी जिलों में किसानों की पहली समस्या उन्हें समय पर और तय मात्रा में रासायनिक खाद नहीं मिल पाना है। नहरों में पानी आ रहा है। गांव में बिजली की आपूर्ति है, लेकिन मंहगाई ने गांव, कस्बों और शहर में सरकार के खिलाफ जनता में नाराजगी बढ़ा रखी है। हर जगह थोड़े-थोड़े अंतराल पर कड़ाके की ठंड में रात-रात भर जाग कर किसानों को खेतों की रखवाली करते देखा जा सकता है। छुट्टा गौवंश, नील गाय समेत तमाम जानवरों का खतरा बना हुआ है। आजमगढ़, गाजीपुर के रास्ते में तमाम लोगों ने बताया कि वह मटर, चना, अरहर की खेती करने से बच रहे हैं। सरसों का तेल 200 रुपये किलो बिक रहा है। तमाम गांवों में बिजली के तारों का घेरा बनाकर उसमें हल्की तीव्रता का करंट दौडाकर भी खेतों की रखवाली की जा रही है।

...मजदूरों की सुनिए, सरकार तो बांटती रही है

सुबह सवेरे अजमगढ़ में लेबर चौक पर करीब पांच-छह मजदूर काम की तलाश में बैठे मिले। पूछने पर बताया कि कोरोना के बाद से निर्माण कार्य भी कम हो रहे हैं और काम भी कम मिल रहा है। लेकिन गांव में सरकार हर महीने प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज, और रिफाइंड तेल दे रही है। कुछ मजदूरों को प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत घर बनाने के पैसे भी मिले हैं। कुछ के पास गैस कनेक्शन हैं, हालांकि वे गैस नहीं भरवाते। क्योंकि एक सिलेंडर भराने में साढ़े नौ सौ रुपये लगेंगे और एक दिन की मजदूरी केवल 400 रुपये ही मिलती है। लेकिन राजनीति की चर्चा करने पर आधे से अधिक को अखिलेश यादव की पार्टी पहले नंबर पर दिखाई दे रही है। बड़ी संख्या में मजदूरों में भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री मोदी के प्रति क्रेज दिखाई पड़ रहा है। वहीं बसपा के बारे में कोई उत्साह नहीं है। इससे भी खराब स्थिति कांग्रेस की है। मुफ्त राशन, खाते में सब्सिडी का पैसा, गैस कनेक्शन, आवास जैसे सवालों पर मजदूर राम प्रकाश का कहना है कि जो भी सरकार सत्ता में आती है, कुछ न कुछ देकर जाती है। किसी ने लड़कियों को साइकिल बांटी थी, तो किसी ने लैपटॉप।

अभी बहुत साफ नहीं है राजनीतिक स्थिति

बसपा प्रमुख मायावती अभी जहां खुलकर पत्ते नहीं खोल रही हैं, राजनीतिक हलचल तो है लेकिन स्थिति बहुत साफ नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीकांत सिंह के मुताबिक प्रत्याशियों की घोषणा होने के बाद ही राजनीतिक स्थिति के बारे में कुछ कहा जा सकता है। सुशील चंद्र दूबे समाजवादी पार्टी से टिकट मांग रहे हैं। सुशील कहते हैं कि यदि ब्राह्मण भाजपा को छोड़कर समाजवादी पार्टी में आ गया तो भाजपा 100-125 सीटों पर सिमट जाएगी। सुशील कहते हैं कि ब्राह्मण नाराज हैं, उनका झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ है, लेकिन अभी हम यह नहीं कह सकते कि आगे क्या होगा। प्रयागराज की करछना सीट से भाजपा के टिकट के दावेदार का भी कहना है कि इस बार टिकट का बंटवारा ही भला कर सकता है। यह बात सभी दलों पर लागू होती है। अभी तो मामला हर तरफ 50:50 का है। किसी भी तरफ गाड़ी घूम सकती है।

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