भागवत मनुष्य को मरना सिखाती है और रामायण जीना सिखाती है। मनुष्य को मोक्ष मृत्यु के एक क्षण पहले तक संभव है। मृत्यु के बाद मोक्ष संभव नहीं है। इसलिए मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करते रहना चाहिए। यह उद्गार उत्सव लान में चल रही भागवत कथा के अंतिम दिन शुक्रवार को कथावाचक राजन महाराज ने मौजूद श्रोताओं के बीच व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सुख और आनंद मनुष्य अपने भीतर ही तप के प्रकाश में प्राप्त कर सकता है। इसलिए मनुष्य को सद्गुरु के पास जाकर ज्ञान अर्जित करना चाहिए। बताया कि संत दत्तात्रेय ने समाज में 24 गुरु बनाकर उनसे शिक्षा ली, इसमें उन्होंने पृथ्वी से धैर्य, आकाश से असीमित होना, सूर्य से समानता का व्यवहार, पानी से गतिमान, अगिभन से हर चीज को अपने में समाहित कर लेने का गुण सीखा। इसलिए सद्गुरु का स्मरण करते हुए हर पल ईश्वर में विश्वास रखते हुए उस परमपिता परमेश्वर का गुणगान व भजन करना चाहिए। इस मौके पर परीक्षित के रूप में हरिप्रसाद साहू, देवी प्रसाद साहू शामिल रहे। इसके अलावा सूर्यकांत तिवारी, रमाशंकर शर्मा, जगदंबा प्रसाद, शिवनरेश, आशू पांडे, सुशील बाजपेई, रामप्रकाश साहू, प्रवीण बाजपेई, दीपक साहू, विवेक साहू, दर्शन साहू, श्रीकांत दीक्षित आदि मौजूद रहे।