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84 कोसी परिक्रमा पर परदे के पीछे रहे पराक्रमी
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
Updated Wed, 28 Aug 2013 03:58 PM IST
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वजह कुछ भी हो लेकिन मंदिर मुद्दे पर 84 कोसी परिक्रमा के दौरान अतीत में मंदिर आंदोलन पर पराक्रम दिखाने वाले कई चेहरे परदे के पीछे ही रह गए।
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न कल्याण सिंह की दहाड़ सुनाई दी और न विनय कटियार की लोगों से अयोध्या पहुंचने की पुकार।
कुछ चेहरे आए भी तो पूरे मामले के उत्तरार्ध में और वह भी बेहद औपचारिक तरीके से। जिसमें उत्साह कम औपचारिकता ज्यादा लग रही थी।
उम्मीद थी कि कम से कम वे चेहरे तो जरूर विहिप के इस आंदोलन में दिखेंगे, जिन्हें पहचान और प्रतिष्ठा राम मंदिर आंदोलन से ही मिली लेकिन उनकी झलक भी नहीं दिखी।
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1990 में कल्याण सिंह बोलते थे कि राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण अगर अयोध्या में नहीं होगा तो फिर कहां होगा। वही कल्याण 1992 में मुख्यमंत्री हो चुके थे।
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6 दिसंबर 1992 को जब ढांचा गिरा और मामला न्यायालय में पहुंचा। तब कल्याण की यह बात घर-घर लोगों की जुबान पर रहा करती थी, ‘ढांचा गिरने पर पछतावा नहीं गर्व है। राम की सत्ता के आगे यह सत्ता कुछ नहीं। राम काज के लिए जीवन भर जेल में रहना स्वीकार है।’
उम्मीद थी कि कल्याण जैसा भगवा चेहरा इस बार भी परिक्रमा में ताप भरेगा। पर, ऐसा नहीं हो पाया। कटियार आए भी तो सकुचाते हुए। विनय कटियार का नाम भी उन लोगों में है, जिनका भाषण 1990 में पानी में आग लगाने वाला समझा जाता है।
उनकी झलक परिक्रमा वाले दिन हल्की सी दिखी, वह भी अपने अयोध्या स्थित आवास पर। उमा भारती बोलीं लेकिन अंत में। उमा उन चेहरों में हैं, जिन्हें राम मंदिर आंदोलन से प्रसिद्धि मिली। 1990 में उनके भाषणों का ताप वही महसूस कर सकता है जिसने सुना है। पर, इस बार वह भी परदे के पीछे ही रह गईं। पत्रकारों के सवाल में उनके वह तेवर नहीं दिखे।
ऋतंभरा और आचार्य धर्मेंद्र भी नहीं दिखे
सिर्फ कल्याण, कटियार व उमा ही नहीं, अब वात्सल्य ग्राम के माध्यम से सामाजिक सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ चुकीं साध्वी ऋतंभरा के भाषणों की आंच भी इस बार किसी को महसूस नहीं हुई। वह भी पूरे परिदृश्य से गायब रहीं। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार भी उनकी वह लाइनें गूंजेंगी, ‘राम के जो काम न आए, वह बेकार जवानी है।’
आचार्य धर्मेन्द्र के भाषणों की आंच सिर्फ वही महसूस कर सकता है, जो 6 दिसंबर 1992 को ढांचा ढहने के दिन वहां रहा होगा। उस समय मध्यप्रदेश के जयभान पवैया की गिनती भी उन लोगों में होती है, जो विनय कटियार की तरह ही 1990 में लोगों के भीतर आग भरा करते थे। पर, इस बार वह भी कहीं नहीं दिखे।