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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sultanpur News ›   Vanvasi on the brink of starvation

दो जून रोटी के लिए संघर्ष कर रहे वनवासी

Thu, 07 Jan 2016 10:33 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/सुल्तानपुर
अमर उजाला ब्यूरो/सुल्तानपुर Updated Thu, 07 Jan 2016 10:33 PM IST
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वनवासियों के परंपरागत व्यवसाय दोना-पत्तल पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ढाक, बरगद, पाकड़ व महुए के पत्तों से बनने वाले दोना-पत्तल की डिमांड कम होने से बाजारों में फायबर के दोना-पत्तलों का क्रेज बढ़ गया है। शासन व आमजन की उपेक्षा से वनवासी जातियों पर जीवन-यापन का संकट खड़ा हो गया है। आज भी इनका परिवार घास-फूस से बनाए गए छप्पर में रहने को मजबूर हैं। धीरे-धीरे वनवासी जाति के लोग घर की गृहस्थी चलाने के लिए परदेस को पलायन करना शुरू कर दिए हैं।

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दोना-पत्तल व्यवसाय से जुड़े वनवासी जाति के लोग अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं। वजह, फायबर के बर्तनों ने मार्केट में अपनी जगह बना ली हैं। पत्तल व दोना बनाने के लिए ढाक, बरगद, पाकड़ व महुए के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। एक थाली बनाने में जहां 12 से 15 पत्ते तो वहीं दोने के लिए चार से छह पत्ते की आवश्यकता होती है। एक व्यक्ति एक दिन में 2500-3000 पत्ते को तोड़ता है और इन पत्तों से 150 से 200 पत्तल बना पाता है। दो दिन की मेहनत के बाद उसे 70 रुपये के हिसाब से थाली का दाम मिलता है।
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 वहीं, बाजारों में फायबर की थाली 70 से 80 रुपये व दोना 22 से 25 रुपये/सैकड़ा उपलब्ध है। मार्केट में फायबर के दोना-पत्तलों की अधिक डिमांड होने से वनवासी जातियों पर रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। घर का खर्च चलाने के लिए वनवासी जाति के लोग परदेस पलायन कर रहे हैं।
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घर में कुछ नहीं तो सुरक्षा कैसी

करौंदीकलां। क्षेत्र के गंगापुर निवासी रामनेवाज ने बताया कि पत्ते तोड़ने के लिए पांच से छह किमी दूर जाना पड़ता है। जंगल में पत्तों को तोड़ने में कीड़े-मकोड़े, सांप, बिच्छू समेत कई जहरीले जंतुओं का सामना करना पड़ता है। इस कारोबार से अच्छा मजदूरी करना है। कम से कम प्रतिदिन 100-200 रुपये मिलेंगे। दरवाजे पर टाट की पट्टी लगी होने के बारे में रामनेवाज ने कहा कि जब घर में कुछ है ही नहीं तो सुरक्षा किस बात की। मनोज वनवासी ने कहा कि यदि सरकार ने हमारे बारे में नहीं सोचा तो यह कारोबार लुप्त हो जाएगा। चंद्रिका वनवासी ने बताया कि जिनके पेड़ से पत्तियां तोड़ने जाता हूं, उनकी भी खरी-खोटी सुननी पड़ती है। पांच से 10 किमी दूर पत्ती के लिए जाना पड़ता है। शिवराज ने बताया कि पहले गांव के लोग शादी-विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में दो दिन पहले दोना और पत्तल बनाने को कह देते थे। बाजार में फायबर के दोना-पत्तलों के आने से लोगों ने हमें पूछना बंद कर दिया है।

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