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धरती पर देवलोक के दर्शन की तैयारियां
Amarujala Bureau
Updated Wed, 21 Sep 2016 10:48 PM IST
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माता की प्रतिमाएं बनना शुरू
- फोटो : अमर उजाला
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दुर्गा पूजा महोत्सव के लिए पूजा समिति के लोगों ने पंडालों को सजाने का कार्य शुरू कर दिया है। भारत में कोलकाता के बाद दुर्गा पूजा महोत्सव का विशाल स्वरूप सुल्तानपुर में देखने को मिलता है। यहां पर दशहरे के दिन से महोत्सव की रंगत में निखार आता है। दूरदराज से लोग यहां पर दुर्गा पूजा महोत्सव की झलक देखने आते हैं।
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विशालकाय पंडालों में देश-विदेश के मंदिरों के स्वरूप देखने को मिलते हैं। यही नहीं विसर्जन से पूर्व अनवरत शहर में जगह-जगह भंडारे और जागरण का आयोजन किया जाता है। मां के भक्तों की भीड़ शाम होते ही पंडालों में उमडने लगती है।
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हर साल की तरह इस बार दुर्गा पूजा महोत्सव की तैयारियां शहर में शुरू हो गई हैं। मूर्तिकारों ने देवी प्रतिमाओं को जीवंत रूप देने का कार्य शुरू कर दिया है। केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति के संरक्षक राधेरमण मिश्र वैद्य ने बताया कि शहर में 150 के ऊपर देवी पंडाल बनाए जाएंगे। वहीं शहर के विभिन्न स्थानों पर पंडालों के निर्माण के लिए समिति के पदाधिकारियों ने बांस-बल्ली लगाना शुरू कर दिया है।
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1959 में हुई दुर्गा पूजा की शुरुआत
सुल्तानपुर। शहर के ठठेरी बाजार में वर्ष 1959 में भिखारीलाल सोनी व उनके साथियों ने पहली दुर्गा प्रतिमा की स्थापना कराई थी। यहां से शुरू हुआ दुर्गा पूजा का सिलसिला समय के साथ बढ़ता ही गया। दूसरी मूर्ति की स्थापना रुहट्ठा गली में बंगाली प्रसाद सोनी ने 1961 में कराई थी। 1970 में दो प्रतिमाएं और जुड़ीं।
इसके बाद कालीचरन ने श्री संतोषी माता और राजेंद्र प्रसाद ने मां सरस्वती की प्रतिमा की स्थापना कराई। 1973 में श्री अष्टभुजी माता, श्री अंबे माता, श्री गायत्री माता, श्री अन्नपूर्णा माता की स्थापना के साथ ही दुर्गा पूजा महोत्सव में तब्दील हो गया। शहर के दुर्गापूजा महोत्सव से प्रेरित होकर जिले केे सभी तहसीलों व कस्बाई क्षेत्रों में भी प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी है।