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Sultanpur News: रात में रील्स में फंस रही किशोरों की नींद

Sat, 12 Sep 2026 12:47 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर Updated Sat, 12 Sep 2026 12:47 AM IST
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Adolescents losing sleep over late-night Reels
मेडिकल कॉलेज का मनोरोग विभाग। संवाद
सुल्तानपुर। सोने से पहले मोबाइल पर रील देखने की आदत किशोरों की नींद और दिनचर्या पर भारी पड़ रही है। मोबाइल स्क्रॉलिंग कई बार आधी रात तक जारी रहती है। देर रात तक जागने से सुबह समय पर उठना मुश्किल हो रहा है। इसका असर पढ़ाई, एकाग्रता और दैनिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे रहा है। मेडिकल कॉलेज की मानसिक रोग ओपीडी में रोजाना आठ से 10 किशोर काउंसिलिंग और इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
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वरिष्ठ मनोचिकित्सक राम अनुज वर्मा के अनुसार, समस्या सिर्फ मोबाइल स्क्रीन की रोशनी तक सीमित नहीं है। रील्स का लगातार बदलता कंटेंट, नोटिफिकेशन, कमेंट और प्रतिक्रियाएं दिमाग को सक्रिय रखती हैं। मोबाइल दूर रखने के बाद भी दिमाग तुरंत शांत नहीं होता। इससे नींद आने में देरी होती है और धीरे-धीरे सोने का समय आगे खिसकता जाता है। किशोरों में यह समस्या अधिक दिख रही है।
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32 अध्ययनों में भी सामने आया असर
गनपत सहाय पीजी कॉलेज के मनोविज्ञानी डॉ. अवधेश तिवारी ने वर्ष 2026 में प्रकाशित एक स्कोपिंग रिव्यू का हवाला देते हुए बताया कि इसमें 2025 तक के 32 अध्ययनों की समीक्षा की गई। समीक्षा में सोने से पहले स्क्रीन देखने का संबंध कम नींद, नींद आने में देरी और रात में बार-बार नींद टूटने से पाया गया। सोशल मीडिया और वीडियो गेम का इस्तेमाल अनिद्रा के लक्षण और दिन में नींद आने से भी जुड़ा मिला।
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रील्स से बिगड़ी दिनचर्या
शहर के कक्षा 11 के छात्र हिमांशु को देर रात तक रील देखने की आदत पड़ गई थी। पढ़ाई प्रभावित होने पर शिक्षक ने उसकी मां से संपर्क किया। काउंसिलिंग के बाद करीब तीन महीने में उसकी पढ़ाई और दिनचर्या में सुधार आया।
भदैंया की केश कुमारी को दवा लेने के बावजूद नींद नहीं आती थी। वह रात दो से ढाई बजे तक रील देखती थीं। चिकित्सक की रात नौ बजे के बाद मोबाइल दूर रखने की सलाह का पालन करने पर उनकी नींद में सुधार हुआ।

बॉडी क्लॉक पर भी असर
बॉडी क्लॉक शरीर की 24 घंटे की आंतरिक घड़ी है। देर रात तक जागने और सुबह देर से उठने से इसकी लय प्रभावित होती है। इससे सुबह उठने में परेशानी, दिन में नींद-थकान, एकाग्रता में कमी और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। पढ़ाई और शारीरिक गतिविधियों के लिए भी समय कम हो जाता है।
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