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सामाजिक दूरी के लिये विश्वविद्यालय की परीक्षाओं का स्थगित होना स्वागत योग्य कदम
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अनपरा। कोरोना संक्रमण के चलते प्रदेश में इस वर्ष राज्य विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं नहीं होने व सभी विद्यार्थियों को प्रोन्नत करने के मामले में अवधूत भगवान राम स्नात्कोत्तर महाविद्यालय के छात्र-छात्राओ व अध्यापकों का अलग अलग मत है।
अवधूत भगवान राम स्नात्कोत्तर महाविद्यालय अनपरा की एमएड की छात्रा शिखा आहूजा का कहना है कि प्रदेश सरकार ने जो विश्वविद्यालय की परीक्षा ना कराने का निर्णय लिया है यह बिल्कुल अनुचित है क्योंकि जो सामान्य विद्यार्थी हैं जिनका परीक्षा उत्तीर्ण करना सिर्फ लक्ष्य होता है उन्हें तो किसी भी प्रकार का फर्क नहीं पड़ेगा परंतु जो प्रतिभाशाली छात्र हैं और हमेशा से अपनी शिक्षा के प्रति सजग और जागरूक रहे हैं और अपना नाम विश्वविद्यालय की मेरिट में देखना चाहते हैं उनके लिए यह एक नकारात्मक कदम है। बीएससी की छात्रा काजल कुमारी का कहना है कि मैं और हमारे जैसे हजारों छात्र और छात्राएं और हमारे अभिभावक कोरोना महामारी के मध्य यूनिवर्सिटी एग्जाम के प्रति अत्यंत चिंतित थे। सरकार का एग्जाम स्थगित करना स्वागत योग्य कदम है। इससे महामारी को फैलने से रोका जा सकता हैं। जीवन मूल्यों के प्रति सरकार सजग व जागरूक है। आज पूरा विश्व कोरोना संकट की त्रासदी झेल रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। बीएससी के छात्र सूर्य कुमार शर्मा कहते हैं कि कोरोना की वैश्विक महामारी को देखते हुए सरकार ने परीक्षाएं न कराने का यह जो निर्णय लिया है यह बीमारी के प्रसार को देखते हुए उचित है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अगर परीक्षाएं होती तो छात्रों को दूर-दराज के अपने घरों से वापस परीक्षा देने आने में संक्रमण का ख़तरा होता। अधिकतर छात्र लाक डाउन में अपने घर जा चुके हैं। इसके अलावा परीक्षा केन्द्रों पर भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराना कठिन होता। वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ नील कंठ मिश्र का कहना है कि परीक्षाएं न कराए जाने से छात्रों को एक सुधारात्मक मौका नहीं मिल सकेगा। यह अलग बात है कि यदि लॉक डाउन के बाद परीक्षाएं कराने की योजना बनती तो परीक्षा, उसके बाद मूल्यांकन, परिणाम जारी करने में लगभग दो माह का समय और लगता। ऐसे में हमारे अगले सत्र के विद्यार्थियों को %पोस्ट-कोरोना ड्रा बैक% झेलना पड़ सकता था। इससे सत्र विलम्बित होते या शून्य सत्र भी घोषित करना पड़ता। अगर परीक्षाएं करायी जातीं तो संक्रमण का ख़तरा भी बढ़ता।छात्र हित में यदि विश्वविद्यालय और सरकारें चाहें तो विद्यार्थियों को अगली कक्षा में प्रमोट करने के बाद स्थितियां सामान्य होने पर श्रेणी सुधार परीक्षा करवा सकती है। अस्सिस्टेंट प्रोफेसर एवं समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ जय शंकर पांडेय का कहना है कि जान है तो जहान है। सरकार और विश्वविद्यालयों द्वारा लिया गया यह निर्णय एकदम उचित है।इस वर्ष बिना परीक्षा दिये विद्यार्थियों को उनके हितों को ध्यान में रखते हुए उन्हें अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया जाना सही है। कोरोना महामारी के चलते यह नितान्त आवश्यक हो गया है कि व्यक्ति सामाजिक दूरी बनाए रखे, जिससे कि इस भयावह बीमारी से बचा जा सके।
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अवधूत भगवान राम स्नात्कोत्तर महाविद्यालय अनपरा की एमएड की छात्रा शिखा आहूजा का कहना है कि प्रदेश सरकार ने जो विश्वविद्यालय की परीक्षा ना कराने का निर्णय लिया है यह बिल्कुल अनुचित है क्योंकि जो सामान्य विद्यार्थी हैं जिनका परीक्षा उत्तीर्ण करना सिर्फ लक्ष्य होता है उन्हें तो किसी भी प्रकार का फर्क नहीं पड़ेगा परंतु जो प्रतिभाशाली छात्र हैं और हमेशा से अपनी शिक्षा के प्रति सजग और जागरूक रहे हैं और अपना नाम विश्वविद्यालय की मेरिट में देखना चाहते हैं उनके लिए यह एक नकारात्मक कदम है। बीएससी की छात्रा काजल कुमारी का कहना है कि मैं और हमारे जैसे हजारों छात्र और छात्राएं और हमारे अभिभावक कोरोना महामारी के मध्य यूनिवर्सिटी एग्जाम के प्रति अत्यंत चिंतित थे। सरकार का एग्जाम स्थगित करना स्वागत योग्य कदम है। इससे महामारी को फैलने से रोका जा सकता हैं। जीवन मूल्यों के प्रति सरकार सजग व जागरूक है। आज पूरा विश्व कोरोना संकट की त्रासदी झेल रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। बीएससी के छात्र सूर्य कुमार शर्मा कहते हैं कि कोरोना की वैश्विक महामारी को देखते हुए सरकार ने परीक्षाएं न कराने का यह जो निर्णय लिया है यह बीमारी के प्रसार को देखते हुए उचित है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अगर परीक्षाएं होती तो छात्रों को दूर-दराज के अपने घरों से वापस परीक्षा देने आने में संक्रमण का ख़तरा होता। अधिकतर छात्र लाक डाउन में अपने घर जा चुके हैं। इसके अलावा परीक्षा केन्द्रों पर भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराना कठिन होता। वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ नील कंठ मिश्र का कहना है कि परीक्षाएं न कराए जाने से छात्रों को एक सुधारात्मक मौका नहीं मिल सकेगा। यह अलग बात है कि यदि लॉक डाउन के बाद परीक्षाएं कराने की योजना बनती तो परीक्षा, उसके बाद मूल्यांकन, परिणाम जारी करने में लगभग दो माह का समय और लगता। ऐसे में हमारे अगले सत्र के विद्यार्थियों को %पोस्ट-कोरोना ड्रा बैक% झेलना पड़ सकता था। इससे सत्र विलम्बित होते या शून्य सत्र भी घोषित करना पड़ता। अगर परीक्षाएं करायी जातीं तो संक्रमण का ख़तरा भी बढ़ता।छात्र हित में यदि विश्वविद्यालय और सरकारें चाहें तो विद्यार्थियों को अगली कक्षा में प्रमोट करने के बाद स्थितियां सामान्य होने पर श्रेणी सुधार परीक्षा करवा सकती है। अस्सिस्टेंट प्रोफेसर एवं समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ जय शंकर पांडेय का कहना है कि जान है तो जहान है। सरकार और विश्वविद्यालयों द्वारा लिया गया यह निर्णय एकदम उचित है।इस वर्ष बिना परीक्षा दिये विद्यार्थियों को उनके हितों को ध्यान में रखते हुए उन्हें अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया जाना सही है। कोरोना महामारी के चलते यह नितान्त आवश्यक हो गया है कि व्यक्ति सामाजिक दूरी बनाए रखे, जिससे कि इस भयावह बीमारी से बचा जा सके।
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