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Sonebhadra News: अफसरों ने पट्टाधारकों से सांठगांठ कर सरकार को लगाया चूना
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सोनभद्र। जिलों में तैनात खनन अधिकारियों ने पट्टाधारकों से सांठगांठ कर सरकारी को मोटी चपत लगाई है। अफसरों ने इतनी शिथिलता बरती कि पट्टाधारकों से लीज और रॉयल्टी के अंतर्गत करीब 409 करोड़ की वसूली समय से नहीं हो पाई।
सोनभद्र में तो 12.37 करोड़ की रिकवरी के छह नोटिस को यह कहते हुए लौटा दिया गया कि पट्टाधारकों के नाम-पते गलत हैं या उनके पास कोई संपत्ति ही नहीं है। जबकि पट्टा आवंटन से पहले ही विभाग उनकी हैसियत और वास्तविक पहचान की पड़ताल करता है। ऐसी लापरवाही को सीएजी ने बेहद गंभीर माना है।
उत्तर प्रदेश लघु खनिज रियायत (यूपीएमएससी) नियम में प्रावधान है कि अगर पट्टेदार नोटिस प्राप्त करने के तीस दिन के भीतर लीज के अंतर्गत देय किसी भी राशि (जिसमें रॉयल्टी भी शामिल है) का भुगतान करने में विफल रहता है तो राज्य सरकार या उसकी ओर से अधिकृत कोई भी अधिकारी खनन पट्टा समाप्त कर सकता है। यही नहीं अगर भुगतान नियत तिथि से 15 दिन के भीतर नहीं किया गया तो राज्य सरकार उस राशि को भू-राजस्व के बकाए के रूप में वसूलने का अधिकार रखती है।
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यह अधिकार राज्य सरकार के अन्य किसी अधिकार से स्वतंत्र और अतिरिक्त है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने 18 जिलों से प्राप्त खनन अभिलेखों की जांच में पाया कि आठ जिलों के खनन अधिकारियों ने वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच 161 वसूली प्रमाण पत्र (आरसी) जारी किए गए, जिनमें 409.85 करोड़ रुपये की खनन देनदारी शामिल थी।
इसमें से केवल 1.17 करोड़ रुपये की ही वसूली विभाग कर पाया। सोनभद्र में खनन अधिकारी की ओर से अक्तूबर 2020 से दिसंबर 2021 के बीच 11 वसूली प्रमाण पत्र जारी किए गए थे।
इसमें 12.37 करोड़ रुपये के छह वसूली प्रमाणपत्र यह कहकर वापस कर दिया गया कि पिता का नाम और पता ही नहीं मिला या पट्टेदारों की कोई संपत्ति नहीं है। सोनभद्र के अलावा बांदा, फतेहपुर, हमीरपुर, कानपुर देहात, कौशांबी, प्रयागराज और शामली में भी वसूली प्रमाणपत्र जारी हुए, लेकिन बकाया राशि वसूलने में विभाग विफल रहा।
इस तरह से आठ जिलों में 408.68 करोड़ की वसूली नहीं हो पाई। खनन अधिकारियों ने इसकी वसूली के लिए कोई कार्रवाई भी नहीं की। ऑडिट ने इसे सरकारी राजस्व की क्षति का बेहद गंभीर माना।
इस पर सरकार ने भी माना कि वसूली की निगरानी ठीक से नहीं हुई। साथ ही आश्वासन दिया कि संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलबी होगी और बकाया वसूली के लिए ठोस कार्रवाई की जाएगी।
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सोनभद्र में तो 12.37 करोड़ की रिकवरी के छह नोटिस को यह कहते हुए लौटा दिया गया कि पट्टाधारकों के नाम-पते गलत हैं या उनके पास कोई संपत्ति ही नहीं है। जबकि पट्टा आवंटन से पहले ही विभाग उनकी हैसियत और वास्तविक पहचान की पड़ताल करता है। ऐसी लापरवाही को सीएजी ने बेहद गंभीर माना है।
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उत्तर प्रदेश लघु खनिज रियायत (यूपीएमएससी) नियम में प्रावधान है कि अगर पट्टेदार नोटिस प्राप्त करने के तीस दिन के भीतर लीज के अंतर्गत देय किसी भी राशि (जिसमें रॉयल्टी भी शामिल है) का भुगतान करने में विफल रहता है तो राज्य सरकार या उसकी ओर से अधिकृत कोई भी अधिकारी खनन पट्टा समाप्त कर सकता है। यही नहीं अगर भुगतान नियत तिथि से 15 दिन के भीतर नहीं किया गया तो राज्य सरकार उस राशि को भू-राजस्व के बकाए के रूप में वसूलने का अधिकार रखती है।
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यह अधिकार राज्य सरकार के अन्य किसी अधिकार से स्वतंत्र और अतिरिक्त है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने 18 जिलों से प्राप्त खनन अभिलेखों की जांच में पाया कि आठ जिलों के खनन अधिकारियों ने वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच 161 वसूली प्रमाण पत्र (आरसी) जारी किए गए, जिनमें 409.85 करोड़ रुपये की खनन देनदारी शामिल थी।
इसमें से केवल 1.17 करोड़ रुपये की ही वसूली विभाग कर पाया। सोनभद्र में खनन अधिकारी की ओर से अक्तूबर 2020 से दिसंबर 2021 के बीच 11 वसूली प्रमाण पत्र जारी किए गए थे।
इसमें 12.37 करोड़ रुपये के छह वसूली प्रमाणपत्र यह कहकर वापस कर दिया गया कि पिता का नाम और पता ही नहीं मिला या पट्टेदारों की कोई संपत्ति नहीं है। सोनभद्र के अलावा बांदा, फतेहपुर, हमीरपुर, कानपुर देहात, कौशांबी, प्रयागराज और शामली में भी वसूली प्रमाणपत्र जारी हुए, लेकिन बकाया राशि वसूलने में विभाग विफल रहा।
इस तरह से आठ जिलों में 408.68 करोड़ की वसूली नहीं हो पाई। खनन अधिकारियों ने इसकी वसूली के लिए कोई कार्रवाई भी नहीं की। ऑडिट ने इसे सरकारी राजस्व की क्षति का बेहद गंभीर माना।
इस पर सरकार ने भी माना कि वसूली की निगरानी ठीक से नहीं हुई। साथ ही आश्वासन दिया कि संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलबी होगी और बकाया वसूली के लिए ठोस कार्रवाई की जाएगी।