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रसूखदारों ने फैसले का किया बेजा इस्तेमाल

Wed, 11 May 2016 12:46 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला /सोनभद्र
ब्यूरो/ अमर उजाला /सोनभद्र Updated Wed, 11 May 2016 12:46 AM IST
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The decision misappropriating
खजूर
पुरानी कहावत है कि रखवालों ने बांट लिया वन, राजा को खबर तक नहीं..। यह कहावत सोनभद्र के वन क्षेत्र पर खूब चरितार्थ हुई। बनवासी सेवा आश्रम की याचिका पर जो निर्णय आदिवासियों के हक के लिए आया था। उसकी आड़ में रसूखदारों ने जंगल की जमीन अपने नाम करवा ली। 1994 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से वन विभाग की जमीन के अंतरण पर रोक लगाए जाने के बावजूद जंगल को लोगों के नाम करने का खेल कुछ इस कदर खेला गया कि 2015 आते-आते यह आंकड़ा एक लाख हेक्टेअर (चार लाख बीघे) को भी पार कर गया।
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जेपी ग्रुप सहित अन्य को नियमों को ताक पर रखकर जमीन दिए जाने का खुलासा खुद सूबे के मुख्य वन संरक्षक (भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त) एके जैन ने किया, बावजूद किसी भी अफसर ने इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी। अब जब एनजीटी ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई के निर्देश के साथ जेपी समूह को आवंटित की गई जमीन को वापस लेने का फैसला सुनाया है, तो अफसर भी सक्रिय हो गए हैं। हालांकि अभी सिर्फ जेपी समूह से ही जमीन वापस ली गई है। शेष लोगों से जमीन वापस लिया जाना बाकी है।
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सूत्रों की मानें तो वन बंदोबस्त अधिकारी स्तर पर मुकदमा दायर कर वन विभाग की जमीन को अपने नाम कराने का सिलसिला इस कदर खेला गया है कि सिर्फ ओबरा वन प्रभाग क्षेत्र में आने वाला बालू-पत्थर खनन क्षेत्र ही नहीं, कैमूर वन्य जीव विहार की मारकुंडी, सोनभद्र वन प्रभाग का मकरीबारी, रेणुकूट वन प्रभाग के योगेंद्रा सहित दर्जनों गांवों में नेताओं, रसूखदारों और साधन संपन्न लोगों ने बड़े पैमाने पर वन जमीन हथिया रखी है। अब जब एनजीटी ने कड़ा फैसला सुनाया है तो इन लोगों से भी जमीन वापस लिए  
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