एनसीएल की खड़िया परियोजना में ओबी हटाने का काम कर रही कंपनी में रोजगार के मसले पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। विस्थापित संघर्ष मोर्चा, राजनीतिक दलों के बाद अब अगोरी-बड़हर राज परिवार के कुंवर दीपेंद्र रमण ब्रह्मशाह ने भी खड़िया प्रबंधन को पत्र लिखकर रोजगार देने में मनमानी पर अंकुश लगाने को कहा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए परियोजना की स्थापना के दौरान जमीन अधिग्रहण के बदले मुआवजे की भी मांग की है।
खड़िया सीजीएम को भेजे पत्र में उन्होंने निजी कंपनी पर स्थानीय आदिवासी गरीब मजदूर व विस्थापित परिवारों के हितों की अनदेखी का आरोप लगाया है। कहा कि कन्हरा निवासी हीरामणि गरीब व अनुसूचित जाति परिवार है। वह हेल्पर के पद पर कार्य करने के योग्य भी है। उसकी पात्र और माली स्थिति को देखते हुए राज्य मंत्री संजीव सिंह गोंड, विधायक भूपेश चौबे ने पत्र लिखकर उसे रोजगार देने में वरीयता देने को कहा। इसके बावजूद कंपनी के अधिकारियों ने उसे अनसुना कर दिया। कहा कि जिस जमीन पर खड़िया परियोजना स्थापित है, वह ब्रिटिश काल में अगोरी, बड़हर व सिंगरौली परगनों के शासक रहे चंदेल राज परिवार के अधीन रहा है। उन्हें जमीन अधिग्रहण के एवज में कोई मुआवजा नहीं मिला है, जबकि सुप्रीम कोटे के 11 सितंबर 1969 के आदेश के अनुसार उन्हें यह हक मिलना चाहिए था। पत्र के माध्यम से एनसीएल प्रबंधन से आग्रह किया गया है कि हीरामणी की नियुक्ति को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र उचित कार्रवाई की जाए ताकि सामाजिक न्याय और संविधान में निहित मूल अधिकारों की रक्षा हो सके।