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आठ गांवों में खेली गई होली, उड़े रंग गुलाल
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बभनी। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के आठ गांवों में सोमवार को आदिवासियों ने जमकर होली खेली। मानर की धुन पर पुरुष और महिलाएं खूब नाचे। बभनी क्षेत्र के आठ गांवों कनवा, सेवढीटोला, सतबहनी, जौराही, सालेनाग, पतखिरना, झापर और फरीफान में आदिवासियों ने जमकर होली खेली।
पूर्वजों के बनाए गए परंपरा का अब भी लोग निर्वहन करते चले आ रहे हैं। इस आठ गांवों के आदिवासी होली का त्योहार दो दिन पहले ही मनाने की परंपरा चली आ रही है। सोमवार को कनवा और सेवढीटोला के आदिवासी भाई मानर बजा बजाकर घर घर जाकर होली खेले और जमकर अबीर-गुलाल उडाए। महिलाओं ने भी मानर पर झूमकर नाचते हुए होली गीत गाई। शांति ब्यवस्था कायम रखने के लिए क्षेत्राधिकारी दुद्धी संजय कुमार वर्मा तथा प्रभारी निरीक्षक अविनाश चंद्र सिन्हा मयफोर्स के साथ क्षेत्र में भ्रमण करते रहे। बता दें कि आदिवासी समाज में अब भी कुछ गांवों के लोग अपने पूर्वजों के बनाए गए परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। होली का त्योहार एक ऐसा त्योहार है, जिसे यहां की आदिवासी समाज बड़े ही सौहार्द पूर्ण ढंग से दो दिन पहले ही मना लेते हैं। सभी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। बताया जाता है कि होली के दिन गांव में कुछ बड़ी घटना हो गई थी, जिसके वजह से गांव में हाहाकार मच गया था। इस पर गांव वालों ने ओझा सोखा से गणना कराया तो सोखाओं ने बताया कि होली के एक दिन या दो दिन पहले ही होली मना लें। इससे गांव में कोई घटना नहीं होगी, तभी से हम लोगों के पूर्वजों ने होली का त्योहार दो दिन पहले ही मनाते रहे। उसी परंपरा का हम लोग निर्वहन करते चले आ रहे हैं।
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पूर्वजों के बनाए गए परंपरा का अब भी लोग निर्वहन करते चले आ रहे हैं। इस आठ गांवों के आदिवासी होली का त्योहार दो दिन पहले ही मनाने की परंपरा चली आ रही है। सोमवार को कनवा और सेवढीटोला के आदिवासी भाई मानर बजा बजाकर घर घर जाकर होली खेले और जमकर अबीर-गुलाल उडाए। महिलाओं ने भी मानर पर झूमकर नाचते हुए होली गीत गाई। शांति ब्यवस्था कायम रखने के लिए क्षेत्राधिकारी दुद्धी संजय कुमार वर्मा तथा प्रभारी निरीक्षक अविनाश चंद्र सिन्हा मयफोर्स के साथ क्षेत्र में भ्रमण करते रहे। बता दें कि आदिवासी समाज में अब भी कुछ गांवों के लोग अपने पूर्वजों के बनाए गए परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। होली का त्योहार एक ऐसा त्योहार है, जिसे यहां की आदिवासी समाज बड़े ही सौहार्द पूर्ण ढंग से दो दिन पहले ही मना लेते हैं। सभी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। बताया जाता है कि होली के दिन गांव में कुछ बड़ी घटना हो गई थी, जिसके वजह से गांव में हाहाकार मच गया था। इस पर गांव वालों ने ओझा सोखा से गणना कराया तो सोखाओं ने बताया कि होली के एक दिन या दो दिन पहले ही होली मना लें। इससे गांव में कोई घटना नहीं होगी, तभी से हम लोगों के पूर्वजों ने होली का त्योहार दो दिन पहले ही मनाते रहे। उसी परंपरा का हम लोग निर्वहन करते चले आ रहे हैं।
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