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आधुनिकता में गुम हुए फाग, गूंज रहे चुनावी राग
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सोनभद्र। एकता और भाईचारा के प्रतीक होली के त्योहार में अब पौराणिक प्रथाएं पूरी तरह गौण हो चुकी हैं। इसके स्वरूप और मायने भी बदल चुके हैं। महाशिवरात्रि के बाद से ही फाग गायन की परंपरा रही है। इस बार शिवरात्रि बीतने के बाद भी यह गीत कहीं सुनाई नहीं दे रहे। अलबत्ता चुनावी गीतों की गूंज देर रात तक हो रही है। फागुनी लय में ही इन गीतों को स्थानीय गायकों के सुर में गाया जा रहा है। बुजुर्गों का कहना है कि पूर्वी भारत का सबसे बड़ा त्योहार होली भी आधुनिकता में अब सिमटता जा रहा है।
सदर ब्लॉक के ऊंचडीह के सेवानिवृत्त शिक्षक ओमप्रकाश त्रिपाठी का कहना है कि पहले बसंत पंचमी से ही लोग ढोल मजीरा की थाप पर पारंपरिक फाग गीत के साथ देर रात तक उत्सव मनाया करते थे लेकिन अब आधुनिकता की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान भारतीय लोक परंपराओं को उठाना पड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण होली का त्योहार है। होली अब महज औपचारिकता के रूप में मनाई जा रही है। एक समय था जब होली के हफ्तों बाद बुढ़वा मंगल पर चैता गीत के साथ त्यौहार का समापन माना जाता था।
बेठिगांव के तपेश्वर त्रिपाठी का कहना है कि होली पर पारंपरिक गीत गाने की प्रथा अब लगभग समाप्त हो रही है। इसकी जगह अब द्विअर्थी और फूहड़ गीतों ने ले ली है। एक जमाना था जब होली के माहौल में ऊंच-नीच छोटे-बड़े का भेद मिट जाता था। गांव के चौक के सहन में एक साथ बैठकर झाल मजीरा ढोल के साथ होली गीत का आनंद लिया जाता था। खास बात यह कि गांव की महिलाएं भी प्रेमपूर्वक बैठ कर गीत सुना करती थीं। आज तो होली के नाम पर महिलाओं का घरों से निकलना भी दुरूह हो गया है। युवा पीढ़ी अपनी परंपरा से विमुख होती जा रही है। वहीं इस बार होली से पहले विधानसभा चुनाव होने के नाते फाग गीत कम चुनावी गीत ज्यादा सुनाई दे रहे हैं।
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सदर ब्लॉक के ऊंचडीह के सेवानिवृत्त शिक्षक ओमप्रकाश त्रिपाठी का कहना है कि पहले बसंत पंचमी से ही लोग ढोल मजीरा की थाप पर पारंपरिक फाग गीत के साथ देर रात तक उत्सव मनाया करते थे लेकिन अब आधुनिकता की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान भारतीय लोक परंपराओं को उठाना पड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण होली का त्योहार है। होली अब महज औपचारिकता के रूप में मनाई जा रही है। एक समय था जब होली के हफ्तों बाद बुढ़वा मंगल पर चैता गीत के साथ त्यौहार का समापन माना जाता था।
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बेठिगांव के तपेश्वर त्रिपाठी का कहना है कि होली पर पारंपरिक गीत गाने की प्रथा अब लगभग समाप्त हो रही है। इसकी जगह अब द्विअर्थी और फूहड़ गीतों ने ले ली है। एक जमाना था जब होली के माहौल में ऊंच-नीच छोटे-बड़े का भेद मिट जाता था। गांव के चौक के सहन में एक साथ बैठकर झाल मजीरा ढोल के साथ होली गीत का आनंद लिया जाता था। खास बात यह कि गांव की महिलाएं भी प्रेमपूर्वक बैठ कर गीत सुना करती थीं। आज तो होली के नाम पर महिलाओं का घरों से निकलना भी दुरूह हो गया है। युवा पीढ़ी अपनी परंपरा से विमुख होती जा रही है। वहीं इस बार होली से पहले विधानसभा चुनाव होने के नाते फाग गीत कम चुनावी गीत ज्यादा सुनाई दे रहे हैं।
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