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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sonebhadra News ›   Ajab Gajab news These six villages of UP are on ground but not in paper villagers living life like refugees in sonebhadra

गजब मामला: यूपी के ये छह गांव धरातल पर तो हैं लेकिन कागज में नहीं, शरणार्थियों की तरह जीवन जी रहे ग्रामीण

Wed, 23 Mar 2022 02:47 PM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र
अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र Published by: उत्पल कांत Updated Wed, 23 Mar 2022 02:47 PM IST
सार

यूपी के सोनभद्र जिले के टंगापाथर, पुनर्वास महुअरिया, चकचैनपुर, बड़होर, झिल्लीमहुआ, चकचइरी के ग्रामीण आज भी शरणार्थियों की तरह अपना जीवन बीता रहे हैं। राजस्व विभाग की मेहरबानी से जमीनी हकीकत यही है।

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Ajab Gajab news These six villages of UP are on ground but not in paper villagers living life like refugees in sonebhadra
दुद्धी तहसील के छह गांवों का अजब मामला - फोटो : सोशल मीडिया।

विस्तार

यह सुनकर किसी का भी चौंकना लाजिमी है, मगर राजस्व विभाग की मेहरबानी से जमीनी हकीकत ही ऐसी है। हम बात कर रहे हैं यूपी के सोनभद्र जिले में स्थित दुद्धी तहसील के छह गांव की जो धरातल पर तो हैं लेकिन कागज में उनका कहीं अस्तित्व नहीं है। इन छह गांवों का सर्वे ही नहीं हुआ।

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मजेदार बात है कि इन गांवों के ग्रामीणों को गवर्नमेंट ग्रांट के तहत पट्टा दिया गया है। इसके बावजूद इन्हें जमीन पर भौमिक अधिकार नहीं मिल सका है। इस कारण समस्या से जूझ रहे गांव के ग्रामीण रोजाना तहसील का चक्कर लगा रहे हैं। दुद्धी तहसील के छह गांवों का सर्वे न होना इस गांव में बसे ग्रामीणों के लिए सिरदर्द बना हुआ है।

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जमीनों पर नहीं मिला भौमिक अधिकार

रिहंद जलाशय से डूब के बाद 1961 व 62 में इन गांवों में आकर बसे ग्रामीण आज भी शरणार्थियों की तरह अपना जीवन बीता रहे हैं। कहने को इन्हें तहसील की ओर से गवर्नमेंट ग्रांट का पट्टा दे दिया गया है लेकिन इन जमीनों पर भौमिक अधिकार न होने से विवाद की स्थिति बनी रहती है।

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इन गांवों की बात करें तो टंगापाथर, पुनर्वास महुअरिया, चकचैनपुर, बड़होर, झिल्लीमहुआ, चकचइरी ने ग्रामीणों को रिहंद जलाशय की स्थापना के तुरंत बाद बसा तो दिया गया लेकिन इन्हें जमीनों पर भौमिक अधिकार नहीं दिया गया। स्थिति यह है कि इन जमीनों पर कब्जा दखल होने के बावजूद खतौनी न होने की वजह से यहां के ग्रामीण न तो किसी की जमानत करा पाते हैं, और न ही इन जमीनों पर ऋण ले सकते हैं। रोजाना होने वाले विवाद का भी निपटारा नहीं हो पाता है।

बीते वर्षों में झिल्ली महुआ गांव में अनुसूचित जाति के परिवार ने जबरदस्ती कुछ लोगों की जमीन जोत दी। इस पर पुलिस ने विवाद के बाद चार लोगों के खिलाफ दलित उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर लिया। जमीनों पर मिले पट्टे के बावजूद वे मुकदमा लड़ रहे हैं और परेशान हैं। अनसर्वेड गांव होने की वजह से राजस्व कर्मियों की ओर से भी विवाद का निपटारा नहीं किया जाता है। 

13 साल पहले सरकार को दी रिपोर्ट, फिर भी नतीजा सिफर

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दुद्धी कोतवाली - फोटो : फाइल

वनवासी सेवा आश्रम के कार्यकर्ता रहे डॉ. ब्रह्मजीत सिंह ने बताया कि 2009 में भारत सरकार की पहल पर मानवाधिकार आयोग की ओर से प्रो. के गोपाल अय्यर ने इन अनसर्वेड गांवों की मौके पर पड़ताल की और उसकी विस्तृत रिपोर्ट भारत सरकार को दी गई। इसके बावजूद अभी तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर तिवारी ने बताया कि रिहंद जलाशय की स्थापना के बाद वन विभाग द्वारा इन जमीनों का स्थानांतरण राजस्व विभाग को तो कर दिया गया लेकिन वह कागज पर नहीं हो सका। राजस्व विभाग ने भी इन जमीनों को अपना मानते हुए गवर्नमेंट ग्रांट का पट्टा बांट दिया।

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