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Sonebhadra News: घर-खेत और भरा-पूरा परिवार, फिर भी वृद्धाश्रम में कट रही जिंदगी

Thu, 01 Oct 2026 12:33 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 01 Oct 2026 12:33 AM IST
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A home, farmland, and a large, complete family yet spending life in an old-age home
छपका स्थित वृद्धाश्रम में एकत्रित वृद्ध।
सोनभद्र। पांच बीघा खेत, दो बेटे और भरा-पूरा परिवार... अमौली गांव के 80 वर्षीय रामू के पास जीवन की जरूरतें पूरी करने के साधन थे। जिंदगीभर खेत में पसीना बहाया और बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी। उम्मीद थी कि बुढ़ापे में अपनों का सहारा मिलेगा लेकिन घर में गाली-गलौज और रोज के झगड़ों ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। आखिरकार दो साल पहले उन्होंने वृद्धाश्रम की राह पकड़ ली। अब छपका स्थित वृद्धाश्रम ही उनका ठिकाना है। रामू की कहानी अकेली नहीं है। समाज कल्याण विभाग की देखरेख में संचालित वृद्धाश्रम में ऐसे कई बुजुर्ग हैं, जिनके बच्चे और परिवार होने के बावजूद जिंदगी अपनों से दूर कट रही है। किसी ने उपेक्षा और प्रताड़ना से आहत होकर आश्रम का रुख किया तो किसी को परिजन यहां छोड़ गए। वृद्धाश्रम के संचालक नवीन कुमार शुक्ला के अनुसार, ज्यादातर बुजुर्ग संतान के व्यवहार से दुखी होकर यहां पहुंचे हैं। झगड़े, मारपीट, उपेक्षा और सम्मान न मिलने की शिकायतें सामने आती हैं। आश्रम में उन्हें भोजन, आवास और जरूरी सुविधाएं मिलती हैं। बुजुर्ग एक-दूसरे के साथ सुख-दुख बांट लेते हैं लेकिन अपनों की कमी से पैदा हुआ खालीपन फिर भी बना रहता है। वर्ष 2025 में वृद्धाश्रम में करीब 90 बुजुर्ग रह रहे थे। अब यह संख्या बढ़कर 110 हो गई है। इस दौरान चार-पांच बुजुर्गों की मौत हो चुकी है या वे अन्यत्र चले गए। इसके बावजूद संख्या में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। 2024 में यहां बुजुर्गों की संख्या 83 थी। गौरतलब है कि वृद्धाश्रम की कुल क्षमता 150 बुजुर्गों को रखने की है। अमौली गांव के रामू कहते हैं कि वे परिवार के साथ रहना चाहते हैं लेकिन वहां न कोई बात सुनता है और न सम्मान देता है। रोज के झगड़ों से परेशान होकर यहां आए। कम से कम यहां शांति है। पिपराही निवासी कबूतरी देवी ने कहा कि एक बेटा है और दस विस्वा जमीन है। बेटा खुद रोजगार के लिए भटकता रहता है। कई वर्षों से आश्रम में हूं। खाना, पानी और दवा समय से मिल जाती है। अब बाकी जिंदगी यहीं कटेगी। उमरी कला के राजेंद्र सिंह ने बताया कि परिवार में बेटा-बहू, पौत्र और प्रपौत्र हैं लेकिन सम्मान नहीं मिला। पौत्र का परिवार देखभाल करता है। बीच-बीच में घर जाता हूं। यहां अपने जैसे लोगों के साथ सुख-दुख बांट लेता हूं।
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