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भक्ति है आनंद की चरममयी सीमा
Updated Tue, 13 Nov 2018 11:39 PM IST
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सोनभद्र। राबर्टसगंज के इमरती कालोनी में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ सप्ताह के पांचवें दिन मंगलवार को कृष्ण के प्रति यशोदा के भक्ति भाव की महिमा बखानी गई। काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने बताया कि, भगवान की जितनी भी लीलाएँ गाई जाती हैं, उनका उद्देश्य उनसे संबंध जोड़ने का होता है। परमात्मा अपने भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं। भक्तों में अनंत शक्ति होती है। यशोदा ने इसी भक्ति भाव से भगवान कृष्ण को बांध लिया था।
कहा कि ज्ञान के प्रतीक नंदबाबा उस बंधन को छोड़ते हैं। केवल अपनी सुख-सुविधाओं को चाहने वालों को जड़ कहा जाता है। जड़ता ही दु:ख प्रदान करती है। वत्सासुर, वृषभासुर, अघासुर, व्योमासुर, केशी और कालिका नाग दमन की कथाएं अपनी प्रतीकात्मकता एवं आध्यात्मिकता के लिए सदैव स्मरणीय हैं। गोपियाँ चित्त वृत्तियाँ हैं। चित्त-वृत्ति हमेशा आत्मा के साथ रहना चाहती है। रास हृदय का उल्लास विचार है। रासलीला में भक्ति आनंद की चरम सीमा है। यह भगवान की चिन्मयी आनंद लीला है। कहा कि भगवत तत्व को चाहने वालों को बुराइयों से लड़ना ही पड़ेगा। नारायणानंद महाराज ने कहा, श्रीकृष्ण भगवान ने भौमासुर की बंदी स्त्रियों को कारागार से मुक्त करा दिया यह कृष्ण की क्रांतिकारी प्रक्रिया है। उन्होंने स्त्रियों को मुक्त कर उनके प्रति समता का भाव प्रदर्शित किया। सुदामा-श्रीकृष्ण की कथा भगवान की अनुपम व्यावहारिक लीला है। इससे पूर्व गुरु पीठ परंपरानुसार काशी से आये आचार्य पं. महेश पाण्डेय, हिमांशु शुक्ल, राजू मिश्र एवं अजय अवस्थी ने पादुका पूजन किया। आयोजक शिव प्रसाद पांडेय, पारस नाथ पांडेय, ओम प्रकाश पांडेय, राममणि सारस्वत समेत सैकड़ों लोगों ने सत्संग का लाभ उठाया।
कहा कि ज्ञान के प्रतीक नंदबाबा उस बंधन को छोड़ते हैं। केवल अपनी सुख-सुविधाओं को चाहने वालों को जड़ कहा जाता है। जड़ता ही दु:ख प्रदान करती है। वत्सासुर, वृषभासुर, अघासुर, व्योमासुर, केशी और कालिका नाग दमन की कथाएं अपनी प्रतीकात्मकता एवं आध्यात्मिकता के लिए सदैव स्मरणीय हैं। गोपियाँ चित्त वृत्तियाँ हैं। चित्त-वृत्ति हमेशा आत्मा के साथ रहना चाहती है। रास हृदय का उल्लास विचार है। रासलीला में भक्ति आनंद की चरम सीमा है। यह भगवान की चिन्मयी आनंद लीला है। कहा कि भगवत तत्व को चाहने वालों को बुराइयों से लड़ना ही पड़ेगा। नारायणानंद महाराज ने कहा, श्रीकृष्ण भगवान ने भौमासुर की बंदी स्त्रियों को कारागार से मुक्त करा दिया यह कृष्ण की क्रांतिकारी प्रक्रिया है। उन्होंने स्त्रियों को मुक्त कर उनके प्रति समता का भाव प्रदर्शित किया। सुदामा-श्रीकृष्ण की कथा भगवान की अनुपम व्यावहारिक लीला है। इससे पूर्व गुरु पीठ परंपरानुसार काशी से आये आचार्य पं. महेश पाण्डेय, हिमांशु शुक्ल, राजू मिश्र एवं अजय अवस्थी ने पादुका पूजन किया। आयोजक शिव प्रसाद पांडेय, पारस नाथ पांडेय, ओम प्रकाश पांडेय, राममणि सारस्वत समेत सैकड़ों लोगों ने सत्संग का लाभ उठाया।
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