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किसानों ने कटान के डर से छोड़ी खेती
अमर उजाला सीतापुर
Updated Thu, 23 Jul 2015 12:02 AM IST
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बारिश हुई, जमीन नम हो गई, खेती के योग्य भूमि तैयार करने के लिए मौसम बना हुआ है। बावजूद इसके किसान इस बार खेती से तौबा करते नजर आ रहे हैं। कुछ ऐसा ही माहौल इन दिनों जिले के गांजरी क्षेत्र में बना हुआ है। जहां पर खेत तो हैं, लेकिन किसान इस खेत मेें बीज बोने से परहेज कर रहे हैं।
इन किसानों को भय है कि अगर घाघरा नदी ने कहर बरपाया तो खेत कटकर नदी में समा जाएगा। इससे फसल का बर्बाद होना तय है। ऐसे में किसानों की जमा पूंजी भी जाने का भय बना हुआ है। इसी कारण किसान इस बार खेती से दूरी बना रहे हैं।
टिब्भा गांव निवासी मैकू यादव इन दिनों ठेकेदार पुरवा में घर बनाकर परिवार के साथ रह रहे हैं। बताने लगे कि पिछली बार बाढ़ व कटान से आबादी नदी में समा गई। खेती के नाम पर पांच बीघा जमीन ही बची थी। बीते वर्ष बाढ़ से पहले पांच हजार रुपये कर्ज लेकर खेत की जोताई कराई थी और कुछ खेत में गन्ना तो कुछ में अरहर व कुछ में धान की रोपाई की थी। पहले घाघरा नदी ने कटान किया, उसके बाद बाढ़ आ गई थी।
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कुछ खेती कटकर बही, बाकी की फसल डूबने से बर्बाद हो गई। हालत यह है कि अब भी कर्ज उतारने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है। निर्मल पुरवा गांव के गुमानी कहते हैं कि कटान के बावजूद किसी तरह से 8 बीघा भूमि बच गई है। बीते दो वर्षों में इस मौसम में बहुत कुछ बर्बाद हुआ है। यहां तक कि खेत में लगाई गई पूंजी भी नहीं बच सकी। इससे इस बार खेत में हल चलाने की हिम्मत ही नहीं हो रही है।
पचीसा गांव के राम भूखन कहते हैं कि बीते चार वर्षों से वे बर्बादी का दंश झेलते आ रहे हैं। हर बार यही होता है कि खेत जोतो, बीज बोओ, उसके बाद घाघरा नदी खेत को काटना शुरू कर देती है। जो फसल किसी तरह से बचती है, उस पर घाघरा नदी की बाढ़ का कहर टूटता है। इससे बर्बादी का दंश झेलना पड़ता है। इस बार महज चार बीघा खेती बची है। इतनी पूंजी भी नही है कि खेत को जोतकर बीज बोएं। इस बार खेती से तौबा, अब तो बरसात का मौसम जाने के बाद ही खेत मेें हल चलेगा।
गोड़ियन पुरवा गांव के बांकेलाल कहते हैं कि कभी 15 बीघा खेत था, घाघरा नदी ने इस कदर कटान किया कि अब महज ढाई बीघा खेती ही बची है। इस बार खेती करने का मन नहीं था, पर पत्नी के बार- बार जोर देने पर खेत में धान बोया है। यह फसल इस उम्मीद से बोई है कि फसल पैदा होगी तो ठीक, अगर नहीं भी हुई तो कोई गम नहीं करेंगे। पौध लगाने के बाद खेत को उसके हाल पर छोड़ दिया है। परिवार का पेट भरने के लिए मजदूरी पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।
घाघरा नदी के तट पर बसे इन किसानों का दर्द बानगी भर है। इस पूरे क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत किसान इसी तरह का मन बनाए बैठे हैं। ये किसान इस बार खेती से तौबा कर रहे हैं। किसान खेत में हल तक चलाने से परहेज कर रहे हैं। वे बारिश का मौसम जाने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि बारिश का मौसम जाने के बाद नदियों के उफनाने का खतरा टल जाता है। तब माहौल खेती योग्य हो जाता है। फिलहाल किसान इस बार खेती करने से तौबा कर रहे हैं।
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इन किसानों को भय है कि अगर घाघरा नदी ने कहर बरपाया तो खेत कटकर नदी में समा जाएगा। इससे फसल का बर्बाद होना तय है। ऐसे में किसानों की जमा पूंजी भी जाने का भय बना हुआ है। इसी कारण किसान इस बार खेती से दूरी बना रहे हैं।
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टिब्भा गांव निवासी मैकू यादव इन दिनों ठेकेदार पुरवा में घर बनाकर परिवार के साथ रह रहे हैं। बताने लगे कि पिछली बार बाढ़ व कटान से आबादी नदी में समा गई। खेती के नाम पर पांच बीघा जमीन ही बची थी। बीते वर्ष बाढ़ से पहले पांच हजार रुपये कर्ज लेकर खेत की जोताई कराई थी और कुछ खेत में गन्ना तो कुछ में अरहर व कुछ में धान की रोपाई की थी। पहले घाघरा नदी ने कटान किया, उसके बाद बाढ़ आ गई थी।
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कुछ खेती कटकर बही, बाकी की फसल डूबने से बर्बाद हो गई। हालत यह है कि अब भी कर्ज उतारने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है। निर्मल पुरवा गांव के गुमानी कहते हैं कि कटान के बावजूद किसी तरह से 8 बीघा भूमि बच गई है। बीते दो वर्षों में इस मौसम में बहुत कुछ बर्बाद हुआ है। यहां तक कि खेत में लगाई गई पूंजी भी नहीं बच सकी। इससे इस बार खेत में हल चलाने की हिम्मत ही नहीं हो रही है।
पचीसा गांव के राम भूखन कहते हैं कि बीते चार वर्षों से वे बर्बादी का दंश झेलते आ रहे हैं। हर बार यही होता है कि खेत जोतो, बीज बोओ, उसके बाद घाघरा नदी खेत को काटना शुरू कर देती है। जो फसल किसी तरह से बचती है, उस पर घाघरा नदी की बाढ़ का कहर टूटता है। इससे बर्बादी का दंश झेलना पड़ता है। इस बार महज चार बीघा खेती बची है। इतनी पूंजी भी नही है कि खेत को जोतकर बीज बोएं। इस बार खेती से तौबा, अब तो बरसात का मौसम जाने के बाद ही खेत मेें हल चलेगा।
गोड़ियन पुरवा गांव के बांकेलाल कहते हैं कि कभी 15 बीघा खेत था, घाघरा नदी ने इस कदर कटान किया कि अब महज ढाई बीघा खेती ही बची है। इस बार खेती करने का मन नहीं था, पर पत्नी के बार- बार जोर देने पर खेत में धान बोया है। यह फसल इस उम्मीद से बोई है कि फसल पैदा होगी तो ठीक, अगर नहीं भी हुई तो कोई गम नहीं करेंगे। पौध लगाने के बाद खेत को उसके हाल पर छोड़ दिया है। परिवार का पेट भरने के लिए मजदूरी पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।
घाघरा नदी के तट पर बसे इन किसानों का दर्द बानगी भर है। इस पूरे क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत किसान इसी तरह का मन बनाए बैठे हैं। ये किसान इस बार खेती से तौबा कर रहे हैं। किसान खेत में हल तक चलाने से परहेज कर रहे हैं। वे बारिश का मौसम जाने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि बारिश का मौसम जाने के बाद नदियों के उफनाने का खतरा टल जाता है। तब माहौल खेती योग्य हो जाता है। फिलहाल किसान इस बार खेती करने से तौबा कर रहे हैं।