फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sitapur News ›   Since Pitru Paksha 17, the condition of Kashikund is in bad shape.

Sitapur News: पितृपक्ष 17 से, काशीकुंड की सूरत बदहाल

Mon, 16 Sep 2024 12:48 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर Updated Mon, 16 Sep 2024 12:48 AM IST
विज्ञापन
Since Pitru Paksha 17, the condition of Kashikund is in bad shape.
नैमिषारण्य (सीतापुर)। पितृपक्ष शुरू होने में एक सप्ताह का समय बचा है, लेकिन नैमिषारण्य का काशी कुंड अब तक बदहाल है। जल आचमन करने लायक भी नहीं है। परिसर में गंदगी फैली है। ऐसे में यहां पुरखों के श्राद्ध व तर्पण के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हर साल प्रशासन दावे करता है लेकिन काशीकुंड को उद्धार की दरकार है।
विज्ञापन

नैमिषारण्य का काशीकुंड प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य स्थित शांत व पौराणिक तीर्थ है। मान्यता है, कि जब तक मनुष्य इस स्थान पर पिंडदान नहीं करता है तब तक उसके पितृ तृप्त नहीं होते हैं। देश के जिन तीन स्थानों पर गया पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म किया जाता है, उनमें नैमिष का काशी कुंड भी शामिल है। यह नाभि गया के नाम से विख्यात है। काशीकुंड में श्राद्ध के दौरान पिंड दान कर स्नान किया जाता है।
विज्ञापन

पितृ पक्ष में यहां श्राद्ध की महत्ता कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए पितृों की तृप्ति को लेकर पितृ पक्ष में यहां देशभर से श्रद्धालु आते हैं। नेपाल व भूटान आदि देशों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। पिंड दान की क्रिया में सर्वप्रथम सिर मुड़वाकर तीर्थ में स्नान करना आवश्यक होता है। इसके बाद अन्य क्रियाएं की जाती हैं। इस बार 17 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो रहे हैं। लेकिन काशीकुंड अब तक उपेक्षित है। तीर्थ के जल में इस कदर काई लगी है कि स्नान तो दूर श्रद्धालु आचमन करने तक से कतराते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

श्रद्धालुओं को परिसर में लगे हैंडपंप से स्नान करने पर मजबूर होना पड़ता है। दरअसल, यहां तीर्थ में स्वच्छ जल की उपलब्धता के स्थायी इंतजाम नहीं हैं। तीर्थ के दूषित जलनिकासी के लिए भी कोई व्यवस्था न होने की वजह से दूषित जल निकल नहीं पाता है। तीर्थ के आसपास साफ-सफाई के अभाव में झाड़ी व घास-फूस उग आई है। इन समस्याओं के बीच आधे अधूरे भाव से श्रद्धालुओं को पितृ कार्य करना पड़ेगा।

नेपाल व श्रीलंका से भी आते हैं श्रद्धालु



पितृपक्ष में राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु के अलावा पड़ोसी देश नेपाल व श्रीलंका से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों के तर्पण के लिए आते हैं।



नैमिषारण्य के नाभिगया का पौराणिक महत्व



हनुमान गढ़ी के महंत बजरंग दास ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों में तीन ही गया बताई गईं हैं। नैमिषारण्य में नाभि गया, बद्रीनाथ में कृपाल गया, बिहार में चरण गया। नैमिषारण्य में 33 कोटि देवता 88 हजार ऋषि विराजमान रहते हैं, जिससे यहां पितरों का कार्य करने वालों को देवता और ऋषिगण आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार सतयुग में भगवान नारायण ने गयासुर दैत्य का वध किया। सुदर्शन चक्र से उसके शरीर के तीन भाग कर दिए। जहां-जहां उसके अंग गिरे वहां वहां पितरों की मुक्ति के लिए स्थान बने। बद्रीनाथ में उसका सिर गिरा, नैमिषारण्य में उसकी नाभि व बिहार के गया जी में उसके चरण गिरे। नैमिष में नाभि अंग गिरने के कारण जब तक वंशज अपने पितरों के लिए यहां पिंडदान नहीं करते तब तक उनका पेट नहीं भरता। उनकी तृप्ति नहीं होती। इसलिए नैमिषारण्य को प्रधान गया बताया गया है।



ऐसे करें तर्पण



आचार्य रमेश चंद्र शास्त्री ने बताया तर्पण करने वाले को सर्वप्रथम देवताओं के लिए तर्पण करना चाहिए। यह तर्पण पूरब दिशा में मुख करके करना चाहिए। तर्पण करते समय यज्ञोपवीत व गमछा कंधे पर रहना चाहिए। जल में हाथ डालकर हाथों के अग्रभाग से जल गिराना चाहिए। इसके बाद ऋषियों के निमित्त तर्पण करना चाहिए। ऋषियों को चावल डालकर कंठी की तरह यज्ञोपवित करने के बाद उत्तर दिशा की तरफ मुख करके तर्पण करें। पितरों को अंगूठा व तर्जनी के मध्य से जौं डालकर तर्पण किया जाना चाहिए। तर्पण के समय दक्षिण की ओर मुख होना चाहिए और यज्ञोपवीत व गमछा दाहिने कंधे पर होना चाहिए। इसके बाद एक अजंलि जल भीष्म पितामह के निमित्त देना उत्तम होता है।



पितृ पक्ष में दान करने का महत्व



पितृ पक्ष में दान-पुण्य पितरों की संतुष्टि के लिए किया जाता है। मान्यता है कि ब्राह्मण के माध्यम से दान की गई वस्तु पितरों तक पहुंचती है। पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन के साथ तिल, फल, वस्त्र, आभूषण आदि श्रद्धा के अनुसार दान करना चाहिए। पितृपक्ष के समय इनका विशेष महत्व है।




काशीकुंड तीर्थ पर वंशजों के लिए यह काम होते

कर्मकांड कराने वाले राजेंद्र शर्मा ने बताया कि जिस व्यक्ति के परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है और वह उस समय धनाभाव य समयाभाव के कारण उनका कार्य नहीं कर पाते वह पितृपक्ष में यहां आकर उनका कार्य करते हैं। प्राणी की मुक्ति के लिए गात्र, खोडसी श्राद्ध, नारायणबलि, सहपिंडी, दसवां आदि कार्य करवाए जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed