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खेतों में दरारें तो किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें

Tue, 19 Jul 2022 11:42 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 19 Jul 2022 11:42 PM IST
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cracks in the fields
लहरपुर इलाके में बारिश न होने से सूखा पड़ा खेत व चिंतित बैठा किसान। -संवाद - फोटो : SITAPUR
सीतापुर। सावन का पहला सप्ताह बीत जाने के बाद भी किसान आसमान पर टकटकी लगाए हैं। बरसात की आस में फसलें सूख रही हैं। कृषि विभाग की माने तो जिले में सिंचाई के अभाव में करीब 70 फीसदी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ा है। कहीं धान की नर्सरी मुरझा रही है, तो कहीं गन्ने की फसल सूखने की कगार पर पहुंच गई है। यही हाल दलहनी फसलों का भी है। माइनरों में पानी नहीं आ रहा है तो नलकूप बंद पड़े है। पंपिंग सेट से महंगी सिंचाई किसानों की कमर तोड़ रही है। इससे किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए जूझना पड़ रहा है।
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जुलाई में बारिश न होने से सभी फसलों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। जिन खेतों में धान की रोपाई की गई है, उनमें पानी के अभाव में दरारें पड़ गई हैं। पौध मुरझाने लगे हैं। जल्द पानी न मिलने पर पौधे सूखने लगेंगे। पुरवाई हवा चलने और पानी न बरसने से गन्ने की फसल में कीटों का प्रकोप फैल हो रहा है। पत्तियां सूख रही हैं। जानकारों के अनुसार किसानों की 70 फीसदी फसल बारिश पर आधारित है। अब पानी के अभाव में इनके उत्पादन पर संकट खड़ा हो रहा है। महज 30 फीसदी फसल को अन्य साधनों से सिंचाई करने से लागत बढ़ रही है। जिसकी भरपाई संभव नहीं है। इन मुसीबतों के चलते किसान परेशान हैं।
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जेठ चले पुरवाई, सावन सूखा जाई
पर्यावरण प्रेमी ज्ञान प्रकाश सिंह प्रतीक बताते हैं कि पुरातन कहावतें व अनुभवी ज्ञान वर्तमान को चरितार्थ कर रहा है। जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ने मानो ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि हमें पुन: पर्यावरण को समझने की अत्यंत आवश्यकता है। इस साल टिटहरी ने भी मौसम को पहले से भांपकर 2-3 अंडे ही दिए हैं। माना जाता है कि टिटिहरी जितने अंडे देती है, वर्षा उतने माह होती है। किसान जहां एक ओर फसलों के उचित मूल्य न मिलने से परेशान हैं वहीं दूसरी ओर बारिश न होने से फसल लागत में वृद्धि किसानों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है।
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बारिश न होने से घटेगा धान का क्षेत्रफल
कृषि विज्ञान केन्द्र कटिया के वैज्ञानिकों ने बताया कि बारिश जुलाई महीने में मानक से कम हुई है। अगर यही हाल रहा तो खरीफ फसलों की बढ़ी लागत किसानों की मुसीबत बढ़ाएगी। कृषि विज्ञान केन्द्र कटिया के वैज्ञानिकों के अनुसार वर्षा ऋतु में मुख्य रूप से क्षेत्र के किसान धान की खेती करते हैं। इसकी पौध मई के अंत से व जून के मध्य में डालते हैं।
जुलाई में धान की रोपाई का कार्य अपने चरम पर रहता है। इस वर्ष वर्षा कम होने से बहुत से किसान धान की पौध नहीं डाल पाए हैं। जिससे धान की फसल का क्षेत्रफल घटने की आशंका है। जिस वर्ष मई जून माह में वर्षा अच्छी हो जाती है, तो किसान ऐसा समझते हैं कि जुलाई से अक्टूबर तक भी वर्षा अच्छी होगी। उसी अनुसार वह यह तय करते हैं कि धान का क्षेत्रफल कितना रखना है। धान का क्षेत्रफल कम होते देखकर किसान अरहर, मूंग, उर्द जैसी दलहनी व तिल व मूंगफली जैसी तिलहन फसल की बुवाई पर ध्यान देने लगे हैं।
हवा में घटा का नमी का स्तर
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष मौसम का मिजाज ऐसा रहा है कि हवा में नमी भी 45 से 50 फीसदी तक आ गई है। अत्यधिक गर्मी व उमस से किसान परेशान रहे। मई और जून माह में किसानों को ट्यूबवेेल से पानी लगाने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। उनकी फसलों की लागत में वृद्धि रही। जुलाई महीना पूर्ण वर्षा काल माना जाता है।
इस बार जुलाई के प्रथम सप्ताह में भी वर्षा न होने से किसान चिंतित हैं। वह पंपिंग सेट चलाकर बुवाई व रोपाई कार्य पूरा कर रहे हैं। गन्ना के किसानों को सलाह दी जाती है की खेत में उचित नमी बनाए रखें। किसान नया बाग लगाने के लिए जून में गड्ढों की खुदाई करते हैं। बारिश न होने से बागों के रोपण के कार्य भी प्रभावित हुए।
कम दिनों वाली लगाएं धान की फसल
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन किसानों ने पानी के अभाव में नर्सरी अभी नहीं लगाई है, वह ड्रम सीडर के माध्यम से धान की सीधी बिजाई करें। यदि अब धान की फसल लगाना चाहते हैं तो 90 से 100 दिन की अवधि वाली धान की प्रजातियों का ही चयन करें। कम वर्षा को देखते हुए या जिन किसानों की जमीनें ऊंची हैं, जहां पानी कम रुकता है। वहां दलहनी फसल अरहर, उड़द, मूंग या तिलहनी फसल तिल, सूरजमुखी, मूंगफली की बुआई कर सकते हैं।
किसानों को अपनाना होगा फसल विविधीकरण
किसानों को सलाह है कि कम पानी वाली फसलें जैसे सावां, कोदो, मडुंवा, मक्का, ज्वार, बाजरा, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली, फूलों की खेती, सब्जियों या चारा वाली फसलों की खेती का चुनाव भी कर सकते हैं। मौसम विभाग के अनुसार 20 जुलाई से बारिश का अनुमान है। पानी की बचत अत्यंत आवश्यक है।
सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों जैसे ड्रिप, स्प्रिंकलर, रेन गन का प्रयोग करें। सरकार बौछारी सिंचाई पर 65 से 75 फीसदी और टपक सिंचाई या सूक्ष्म सिंचाई पर 80 से 90 प्रतिशत तक अलग-अलग वर्ग के किसानों को अनुदान प्रदान कर रही है।
- डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव, प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र कटिया
बन रही सूखे जैसी स्थिति
ब्लॉक मिश्रिख के ग्राम सरसई निवासी राजेश कुमार शुक्ल ने बताया कि बरसात न होने से गन्ने की फसल चौपट हो गई है। धान की फसल को पंपिंग सेट के सहारे कुछ किसान सिंचाई तो कर लेंगे। लेकिन जिनके पास सिंचाई के साधन नहीं है उनके खेतों में रोपे गए धान सूख गए हैं। तिल्ली, ज्वार, बाजरा की बुआई भी किसान नहीं कर पा रहे है।
बरसात न होने से सूखा जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। खैराबाद क्षेत्र के आमखेरा गांव के किसान भगत का कहना है कि गन्ना, ज्वार आदि फसलें पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। लो वोल्टेज से सरकारी नलकूप हो या प्राइवेट चल नहीं रहे है। नहर में पानी नहीं आ रहा है।

महोली तहसील क्षेत्र के मढ़िया निवासी किसान रामनाथ यादव ने बताया कि एक एकड़ में गन्ने की फसल तैयार कर रहे हैं। तेज धूप की वजह से गन्ने की फसल में दस दिन बाद एक बार पानी की आवश्यकता पड़ रही है। खेत से 500 मीटर की दूरी पर एक निजी ट्यूबवेल है, जहां से सिंचाई करने के लिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। आधे गन्ने की फसल सूखकर नष्ट हो गई है।
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