{"_id":"60c8e9738ebc3e2d931446fc","slug":"battle-with-corona-won-by-imposing-curfew-in-the-village-sitapur-news-lko5826150110","type":"story","status":"publish","title_hn":"गांव में कर्फ्यू लगाकर जीती कोरोना से जंग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गांव में कर्फ्यू लगाकर जीती कोरोना से जंग
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिसावां (सीतापुर)। कोरोना की बेकाबू दूसरी लहर ने बरखेरवा गांव के ग्रामीणों को नजरबंदी जैसे कठिन दिनों की याद दिला दी। 41 लोग एक साथ कोरोना से संक्रमित मिलने से गांव में कर्फ्यू जैसे हालात हो गए थे। गलियों में सन्नाटा पसरा था। लोगों के घरों के दरवाजे बंद थे। घर के सदस्य न तो किसी से मिलते और न ही बाहर निकलते। बहुत जरूरी हुआ तो खेत की तरफ जरूर गए। लेकिन बिना किसी से मिले जुलेे वापस लौट आते। यहां तक की घर में सब्जी नहीं हुई तो वह भी खरीदने के बजाए खेतों से ही ले आते।
ग्रामीणों की इस कठिन मेहनत करीब एक माह बाद रंग लाई। जब गांव के सभी 41 लोगों निगेटिव हो गए। आज गांव की गलियां लोगों से फिर गुलजार हैं। चौपाल भी लग रही है। पिसावां विकासखंड के बरखेरवा गांव की आबादी करीब तीन हजार है। यह ब्राम्हण बाहुल्य गांवों में गिना जाता है। जब कोरोना की लहर बेकाबू होने लगी तो अप्रैल माह में गांव के तमाम लोग सर्दी, जुखाम व बुखार से पीड़ित हो गए। इस पर गांव वालों ने कोरोना की जांच कराई। अगले दिन जब रिपोर्ट आई तो सब दंग रह गए।
गांव में 41 लोग एक साथ कोरोना से संक्रमित हुए। यह जिले का सबसे प्रभावित गांव था। जहां पर एक साथ इतने अधिक लोग संक्रमित हुए थे। इससे पूरे गांव में कोरोना का हडक़ंप मच गया। लेकिन गांव के प्रबुद्व लोगों ने हिम्मत नहीं आई। वह इस कोरोना से लडने के लिए खुद ही आगे आ गए।
विज्ञापन
ग्रामीणों ने मेहनत व प्लानिंग करके गांव में कफ्र्यू लगा दिया। गांव के बाहर न तो किसी को जाने देते न ही बाहर से किसी को आने देते। संक्रमित लोगों ने अपने आप को परिवार से अलग करके होम क्वारंटीन कर लिया। कोई कमरें में रहा तो कोई झोपड़ी में ही 14 दिन का वनवास काट लिया। दूर से ही भोजन करना फोन से घर के सदस्यों से बात करना अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया।
स्वास्थ्य विभाग का भी अहम योगदान रहा। सीएचसी के चिकित्सक बराबर फोन से मरीजों का हालचाल लेते रहे। ग्रामीणों की इस कठिन परिश्रम का फल भी बेहतर मिला। 15 दिन बाद जब लोगों ने कोरोना की जांच कराई। जिसमे वह सब निगेटिव हो गए। इससे गांव में खुशियां दौड़ गई। उसके बाद न तो कोई संक्रमित हुआ न ही किसी की हालत गंभीर हुई। सभी लोग होम क्वांरटीन में ही ठीक हो गए।
अब यहां के ग्रामीण बहुत राहत महसूस कर रहे है। गांव की गलियों लोगों से गुलजार है। हर आने जाने के रास्ते खुल चुके है। बस चौपालों में उन दिनों की भी चर्चाएं हो जाती है जब लोग मिलना जुलना तक बंद कर दिया था। इन दिनों की याद करके हर कोई उस समय को गांव के सबसे बुरे दिन बता रहा है।
एक दूसरे का बढाया हौसला
डॉक्टर सुरेश शुक्ल बताते हैं कि गांव में उनके अलावा 40 अन्य लोग संक्रमित हो गए थे। एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए सभी को जागरूक किया गया। गांव के बाहर जाने के सभी रास्ते को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। एकदम कफ्र्यू लगा दिया। इसी वजह से जल्द सफलता मिली। संक्रमण बढ़ नहीं पाया।
चिकित्सक के परामर्श से दवाओं का किया सेवन
रामनाथ ने बताया परिवार के सभी संक्रमित लोगों का लगातार उत्साह बढ़ाते रहे। कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे परिवार में सभी ने चिकित्सक के परामर्श से दवाओं का सेवन किया। इसके साथ ही नियमित रूप से योग, भाप, काढ़ा और हल्दी वाला दूध भी पिया। जिससे सभी की रिपोर्ट जल्द निगेटिव आ गई।
खेतों पर की कड़ी मेहनत
मिथिलेश शुक्ला कहते हैं कि संक्रमित होने के बाद खेतों पर जमकर मेहनत करते हुए पसीना बहाया। उस दौरान किसी से मिलना जुलना बंद था। केवल अकेले में खेतों में खूब काम किया। धूप भी परेशान करती रही। लेकिन हिम्मत नहीं हारे और खुद ही कोरोना हार गया।
पंचायत के अमले के साथ बनाया समन्वय
मालती देवी बताती है घनी आबादी का गांव होने के कारण संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा था। 22 अप्रैल से मरीजों के मिलने का सिलसिला शुरू हुआ था। पंचायत के अमले के साथ समन्वय स्थापित कर मरीजों को मेडिकल किट उपलब्ध कराते हुए दवाईयां दी। जिससे लोग जल्द स्वस्थ्य हो गए।
विज्ञापन
ग्रामीणों की इस कठिन मेहनत करीब एक माह बाद रंग लाई। जब गांव के सभी 41 लोगों निगेटिव हो गए। आज गांव की गलियां लोगों से फिर गुलजार हैं। चौपाल भी लग रही है। पिसावां विकासखंड के बरखेरवा गांव की आबादी करीब तीन हजार है। यह ब्राम्हण बाहुल्य गांवों में गिना जाता है। जब कोरोना की लहर बेकाबू होने लगी तो अप्रैल माह में गांव के तमाम लोग सर्दी, जुखाम व बुखार से पीड़ित हो गए। इस पर गांव वालों ने कोरोना की जांच कराई। अगले दिन जब रिपोर्ट आई तो सब दंग रह गए।
विज्ञापन
गांव में 41 लोग एक साथ कोरोना से संक्रमित हुए। यह जिले का सबसे प्रभावित गांव था। जहां पर एक साथ इतने अधिक लोग संक्रमित हुए थे। इससे पूरे गांव में कोरोना का हडक़ंप मच गया। लेकिन गांव के प्रबुद्व लोगों ने हिम्मत नहीं आई। वह इस कोरोना से लडने के लिए खुद ही आगे आ गए।
विज्ञापन
ग्रामीणों ने मेहनत व प्लानिंग करके गांव में कफ्र्यू लगा दिया। गांव के बाहर न तो किसी को जाने देते न ही बाहर से किसी को आने देते। संक्रमित लोगों ने अपने आप को परिवार से अलग करके होम क्वारंटीन कर लिया। कोई कमरें में रहा तो कोई झोपड़ी में ही 14 दिन का वनवास काट लिया। दूर से ही भोजन करना फोन से घर के सदस्यों से बात करना अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया।
स्वास्थ्य विभाग का भी अहम योगदान रहा। सीएचसी के चिकित्सक बराबर फोन से मरीजों का हालचाल लेते रहे। ग्रामीणों की इस कठिन परिश्रम का फल भी बेहतर मिला। 15 दिन बाद जब लोगों ने कोरोना की जांच कराई। जिसमे वह सब निगेटिव हो गए। इससे गांव में खुशियां दौड़ गई। उसके बाद न तो कोई संक्रमित हुआ न ही किसी की हालत गंभीर हुई। सभी लोग होम क्वांरटीन में ही ठीक हो गए।
अब यहां के ग्रामीण बहुत राहत महसूस कर रहे है। गांव की गलियों लोगों से गुलजार है। हर आने जाने के रास्ते खुल चुके है। बस चौपालों में उन दिनों की भी चर्चाएं हो जाती है जब लोग मिलना जुलना तक बंद कर दिया था। इन दिनों की याद करके हर कोई उस समय को गांव के सबसे बुरे दिन बता रहा है।
एक दूसरे का बढाया हौसला
डॉक्टर सुरेश शुक्ल बताते हैं कि गांव में उनके अलावा 40 अन्य लोग संक्रमित हो गए थे। एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए सभी को जागरूक किया गया। गांव के बाहर जाने के सभी रास्ते को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। एकदम कफ्र्यू लगा दिया। इसी वजह से जल्द सफलता मिली। संक्रमण बढ़ नहीं पाया।
चिकित्सक के परामर्श से दवाओं का किया सेवन
रामनाथ ने बताया परिवार के सभी संक्रमित लोगों का लगातार उत्साह बढ़ाते रहे। कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे परिवार में सभी ने चिकित्सक के परामर्श से दवाओं का सेवन किया। इसके साथ ही नियमित रूप से योग, भाप, काढ़ा और हल्दी वाला दूध भी पिया। जिससे सभी की रिपोर्ट जल्द निगेटिव आ गई।
खेतों पर की कड़ी मेहनत
मिथिलेश शुक्ला कहते हैं कि संक्रमित होने के बाद खेतों पर जमकर मेहनत करते हुए पसीना बहाया। उस दौरान किसी से मिलना जुलना बंद था। केवल अकेले में खेतों में खूब काम किया। धूप भी परेशान करती रही। लेकिन हिम्मत नहीं हारे और खुद ही कोरोना हार गया।
पंचायत के अमले के साथ बनाया समन्वय
मालती देवी बताती है घनी आबादी का गांव होने के कारण संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा था। 22 अप्रैल से मरीजों के मिलने का सिलसिला शुरू हुआ था। पंचायत के अमले के साथ समन्वय स्थापित कर मरीजों को मेडिकल किट उपलब्ध कराते हुए दवाईयां दी। जिससे लोग जल्द स्वस्थ्य हो गए।