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यूक्रेन संकट : भूखे पेट एक दिन में 31 किमी पैदल चले, तब मौत पीछे छूटी
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यूक्रेन संकट : भूखे पेट एक दिन में 31 किमी पैदल चले, तब मौत पीछे छूटी
बिस्कोहर(सिद्धार्थनगर)। यूक्रेन के खार्कीव शहर से जान बचाकर वतन वापसी करने वाले बिस्कोहर निवासी मकसूद अहमद के पुत्र शहाबुद्दीन बुधवार सुबह घर पहुंचे तो अपनों की आंखें खुशी से नम हो गईं। जब उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध की दास्तां सुनाई तो हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए। एक-एक घटना को सुनने और जानने के लिए उनके घर लोगों को तांता लगा रहा। कुछ घटनाओं को सुनकर लोग युद्ध समाप्ति की दुआ करने लगे। वे भूखे पेट एक दिन में 31 किमी पैदल चले। रास्ते में कदम बढ़ते जा रहे थे, क्योंकि मौत पीछा कर रही थी।
यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई करने गए शहाबुद्दीन सबसे जोखिम वाले शहर खार्कीव में फंसे थे, जहां सबसे अधिक तबाही हुई है। बातचीत में शहाबुद्दीन ने बताया कि 24 मार्च को युद्ध शुरू हुआ और हॉस्टल में खाने का सामान खत्म हो गया। करीब 1200 छात्र-छात्राएं नहाने-धोने के पानी से प्यास बुझा रहे थे। कहीं से कोई मदद की उम्मीद नहीं नजर आई तो वे अपने जोखिम पर पैदल चल पड़े। बर्फबारी के बीच माइनस चार डिग्री तापमान के बीच बमबारी में 14 किमी दूरी तय करनी थी। जेब में मुद्रा थी, लेकिन दुकानें नहीं खुली थीं। बिस्कुट खाकर चले थे, भूख को कम करने के लिए पानी का ही सहारा था। सुबह 6 बजे चले थे। भारतीय छात्र-छात्राएं तिरंगा लेकर चल रहे थे और उनके पीछे बचते हुए पाकिस्तानी छात्र-छात्राएं भी चल रहे थे। करीब साढ़े तीन घंटे में वे 9:30 बजे गोकजाल रेलवे स्टेशन पहुंच गए।
ऐसा कोई घर नहीं, जो ध्वस्त न हुआ हो
शहाबुद्दीन ने बताया कि खार्कीव शहर में 24 घंटे बमबारी हो रही है। मेडिकल यूनिवर्सिटी के एजेंट के सहयोग से जिस रास्ते वे रेलवे स्टेशन पहुंचे, वहां कोई ऐसा घर नहीं दिखा, जिसका कोई न कोई हिस्सा ध्वस्त न हुआ हो। कई स्थानों पर वाहन जले मिले। मौत पीछा कर रही थी, लेकिन हिम्मत करके रोमानिया बार्डर पहुंच गए।
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रेलवे स्टेशन से 200 मीटर दूरी पर गिरा बम
शहाबुद्दीन ने बताया कि यूक्रेन से बाहर निकलने का एक-एक मंजर उनकी आंखों के सामने घूम रहा है। वे रेलवे स्टेशन पहुंचे थे कि 200 मीटर दूरी पर बम गिरा और सभी छात्र रेलवे स्टेशन के अंदर घुस गए। ट्रेन आई तो लाइन में लगे थे लेकिन यूक्रेन की आर्मी पहले अपने नागरिकों को प्राथमिकता दे रही थी। यूक्रेनियों से सीट बचती थी तो भारतीय छात्राओं को बैठाया जा रहा था। साढ़े तीन घंटे में तीन ट्रेनें गई, लेकिन 40-50 छात्राएं ही जा सकीं। यूक्रेन आर्मी हवाई फायरिंग करके भारतीय छात्र-छात्राओं को डरा और भगा रही थी कि यूक्रेन के नागरिक पहले सुरक्षित हो जाएं। उसी फायरिंग में एक यूक्रेनी नागरिक को गोली लग गई।
एयर स्ट्राइक के बाद बेसमेंट में भागे
शहाबुद्दीन के अनुसार, दोपहर एक बजे रेलवे स्टेशन के पास हवा में मिसाइल दगी तो भगदड़ मच गई। उसी दौरान एजेंट हम लोगों को लेकर कुछ दूर स्थित मेट्रो स्टेशन के बेसमेंट में चले गए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। दोपहर तीन बजे भारतीय दूतावास की एडवाइजरी आ गई कि खार्कीव रेड जोन है। भारतीय नागरिक वहां से हट जाएं। रुक-रुककर बमबारी हो रही थी और निकलना जोखिम पूर्ण था। आधे घंटे बाद वहीं एडवाइजरी दोबारा आ गई और वे चल फिर पड़े।
बम गिरा और तितर-बितर हो गया छात्रों का दल
शहाबुद्दीन बताते हैं कि भारतीय एडवाइजरी में खार्कीव छोड़ने के साथ तीन सुरक्षित स्थान बताए गए थे। उसमें एक स्थान पेसोचीन वहां से 16-17 किमी दूर था। न टैक्सी मिल रही थी, न बस। मोबाइल में मैप लगाकर वे पैदल ही चल पड़े। एक साथ सैकड़ों छात्र-छात्राएं चल रहे थे। रास्ते में एक बिल्डिंग पर बम गिरा तो आगे के छात्र-छात्राएं भाग निकले और पीछे वाले पीछे छूट गए। वे भी पीछे थे, छात्रों ने जोखिम उठाते हुए आगे जाने का निर्णय किया। भागने में किसी के सामान छूट गए तो कुछ लोग चोटिल हो गए। गनीमत रही कि उनके साथियों में किसी के हताहत होने की खबर नहीं मिली। शाम 7 बजे पेसोचीन पहुंच गए। वहां से रोमानियां बार्डर पहुंचे।
आर्मी के जवान के बिस्कुट से मिली बहुत राहत
शहाबद्दीन के अनुसार, रोमानिया बार्डर छह किमी दूर था तो भूख लग चुकी थी। वे पूरी तरह थक चुके थे। चलने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन मौत पीछा कर रही थी, इसलिए कदम बढ़ते जा रहे थे। यूक्रेन आर्मी के एक जवान में उन्हें बिस्कुट के पैकैट दिए तो उन्हें कुछ राहत मिली। जब साथ चले थे तो 1200 छात्र-छात्राएं थे, लेकिन अंतिम दौर में उनके पांच छात्र ही थे। उस रात में भोजन नहीं मिला। जब रोमानिया पहुंचे तो भारतीय दूतावास ने बहुत मदद की।
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बिस्कोहर(सिद्धार्थनगर)। यूक्रेन के खार्कीव शहर से जान बचाकर वतन वापसी करने वाले बिस्कोहर निवासी मकसूद अहमद के पुत्र शहाबुद्दीन बुधवार सुबह घर पहुंचे तो अपनों की आंखें खुशी से नम हो गईं। जब उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध की दास्तां सुनाई तो हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए। एक-एक घटना को सुनने और जानने के लिए उनके घर लोगों को तांता लगा रहा। कुछ घटनाओं को सुनकर लोग युद्ध समाप्ति की दुआ करने लगे। वे भूखे पेट एक दिन में 31 किमी पैदल चले। रास्ते में कदम बढ़ते जा रहे थे, क्योंकि मौत पीछा कर रही थी।
यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई करने गए शहाबुद्दीन सबसे जोखिम वाले शहर खार्कीव में फंसे थे, जहां सबसे अधिक तबाही हुई है। बातचीत में शहाबुद्दीन ने बताया कि 24 मार्च को युद्ध शुरू हुआ और हॉस्टल में खाने का सामान खत्म हो गया। करीब 1200 छात्र-छात्राएं नहाने-धोने के पानी से प्यास बुझा रहे थे। कहीं से कोई मदद की उम्मीद नहीं नजर आई तो वे अपने जोखिम पर पैदल चल पड़े। बर्फबारी के बीच माइनस चार डिग्री तापमान के बीच बमबारी में 14 किमी दूरी तय करनी थी। जेब में मुद्रा थी, लेकिन दुकानें नहीं खुली थीं। बिस्कुट खाकर चले थे, भूख को कम करने के लिए पानी का ही सहारा था। सुबह 6 बजे चले थे। भारतीय छात्र-छात्राएं तिरंगा लेकर चल रहे थे और उनके पीछे बचते हुए पाकिस्तानी छात्र-छात्राएं भी चल रहे थे। करीब साढ़े तीन घंटे में वे 9:30 बजे गोकजाल रेलवे स्टेशन पहुंच गए।
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ऐसा कोई घर नहीं, जो ध्वस्त न हुआ हो
शहाबुद्दीन ने बताया कि खार्कीव शहर में 24 घंटे बमबारी हो रही है। मेडिकल यूनिवर्सिटी के एजेंट के सहयोग से जिस रास्ते वे रेलवे स्टेशन पहुंचे, वहां कोई ऐसा घर नहीं दिखा, जिसका कोई न कोई हिस्सा ध्वस्त न हुआ हो। कई स्थानों पर वाहन जले मिले। मौत पीछा कर रही थी, लेकिन हिम्मत करके रोमानिया बार्डर पहुंच गए।
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रेलवे स्टेशन से 200 मीटर दूरी पर गिरा बम
शहाबुद्दीन ने बताया कि यूक्रेन से बाहर निकलने का एक-एक मंजर उनकी आंखों के सामने घूम रहा है। वे रेलवे स्टेशन पहुंचे थे कि 200 मीटर दूरी पर बम गिरा और सभी छात्र रेलवे स्टेशन के अंदर घुस गए। ट्रेन आई तो लाइन में लगे थे लेकिन यूक्रेन की आर्मी पहले अपने नागरिकों को प्राथमिकता दे रही थी। यूक्रेनियों से सीट बचती थी तो भारतीय छात्राओं को बैठाया जा रहा था। साढ़े तीन घंटे में तीन ट्रेनें गई, लेकिन 40-50 छात्राएं ही जा सकीं। यूक्रेन आर्मी हवाई फायरिंग करके भारतीय छात्र-छात्राओं को डरा और भगा रही थी कि यूक्रेन के नागरिक पहले सुरक्षित हो जाएं। उसी फायरिंग में एक यूक्रेनी नागरिक को गोली लग गई।
एयर स्ट्राइक के बाद बेसमेंट में भागे
शहाबुद्दीन के अनुसार, दोपहर एक बजे रेलवे स्टेशन के पास हवा में मिसाइल दगी तो भगदड़ मच गई। उसी दौरान एजेंट हम लोगों को लेकर कुछ दूर स्थित मेट्रो स्टेशन के बेसमेंट में चले गए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। दोपहर तीन बजे भारतीय दूतावास की एडवाइजरी आ गई कि खार्कीव रेड जोन है। भारतीय नागरिक वहां से हट जाएं। रुक-रुककर बमबारी हो रही थी और निकलना जोखिम पूर्ण था। आधे घंटे बाद वहीं एडवाइजरी दोबारा आ गई और वे चल फिर पड़े।
बम गिरा और तितर-बितर हो गया छात्रों का दल
शहाबुद्दीन बताते हैं कि भारतीय एडवाइजरी में खार्कीव छोड़ने के साथ तीन सुरक्षित स्थान बताए गए थे। उसमें एक स्थान पेसोचीन वहां से 16-17 किमी दूर था। न टैक्सी मिल रही थी, न बस। मोबाइल में मैप लगाकर वे पैदल ही चल पड़े। एक साथ सैकड़ों छात्र-छात्राएं चल रहे थे। रास्ते में एक बिल्डिंग पर बम गिरा तो आगे के छात्र-छात्राएं भाग निकले और पीछे वाले पीछे छूट गए। वे भी पीछे थे, छात्रों ने जोखिम उठाते हुए आगे जाने का निर्णय किया। भागने में किसी के सामान छूट गए तो कुछ लोग चोटिल हो गए। गनीमत रही कि उनके साथियों में किसी के हताहत होने की खबर नहीं मिली। शाम 7 बजे पेसोचीन पहुंच गए। वहां से रोमानियां बार्डर पहुंचे।
आर्मी के जवान के बिस्कुट से मिली बहुत राहत
शहाबद्दीन के अनुसार, रोमानिया बार्डर छह किमी दूर था तो भूख लग चुकी थी। वे पूरी तरह थक चुके थे। चलने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन मौत पीछा कर रही थी, इसलिए कदम बढ़ते जा रहे थे। यूक्रेन आर्मी के एक जवान में उन्हें बिस्कुट के पैकैट दिए तो उन्हें कुछ राहत मिली। जब साथ चले थे तो 1200 छात्र-छात्राएं थे, लेकिन अंतिम दौर में उनके पांच छात्र ही थे। उस रात में भोजन नहीं मिला। जब रोमानिया पहुंचे तो भारतीय दूतावास ने बहुत मदद की।