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Siddharthnagar News: राष्ट्रीय जलवायु नीति की प्रयोगशाला बनी तराई
Sat, 03 Jan 2026 12:09 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 03 Jan 2026 12:09 AM IST
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शाम पांच बजे से छाया कोहरा व अंधेरा होने से अशोक मार्ग पर लाइट जलाकर चलते बाइक सवार। संवाद
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सिद्धार्थनगर। भीषण ठंड तो कभी बेमौसम जोरदार बारिश, कभी बरसात में पानी की किल्लत तो सर्दी में ओस न होने से फसलों को काफी नुकसान हो रहा है। तराई क्षेत्रों में कृषि के हालात और जलवायु में लगातार बदलाव से गेहूं, धान और मक्का के साथ आम, अमरूद, आलू जैसी फसलों पर मौसम का सीधा असर पड़ रहा है। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
ऐसे में आईसीएआर और कृषि मंत्रालय ने सिद्धार्थनगर को हाल ही में ‘सेंसिटिव क्लाइमेट जोन’ के रूप में चिह्नित किया है। अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और सूखे की मार झेल रहे किसानों को बेहतर नुकसान न हो और उन्हें अच्छी पैदावार मिले, इसके लिए तराई को जलवायु नीति की प्रयोगशाला बनाया गया है, जहां से निकलने वाले आंकड़ों पर मंथन कर समाधान निकाला जाएगा।
तराई बेल्ट के सीमांत जिले अब सिर्फ ऐतिहासिक, पौराणिक, कृषि या भौगोलिक पहचान तक सीमित नहीं रह गए हैं। 2025 में यहां दर्ज हुए मौसमी उतार-चढ़ाव, फसल पैटर्न में बदलाव और किसानों की बदलती रणनीतियां देश की राष्ट्रीय जलवायु नीति के लिए अहम संकेत बनकर उभरी हैं। विषय के जानकारों की मानें तो तराई बेल्ट के मौसम के चौकाने वाले आंकड़े और प्राकृतिक आपदाओं के बीच कृषि के सामंजस्य के पैटर्न को नीति का आधार बनाया जा रहा है।
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मौसम विशेषज्ञ बताते हैं कि सिद्धार्थनगर, महराजगंज, कुशीनगर जैसे तराई जिलों से जुटाया गया माइक्रो-लेवल डाटा अब एनएपीसीसी, हरित भारत मिशन और जलवायु-स्मार्ट कृषि योजनाओं में जोड़ा जा रहा है।
बीज पैटर्न परिवर्तन, सूखा-प्रतिरोधी किस्में, मौसम चेतावनी एप और जल प्रबंधन मॉडल को नीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के जलवायु और पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि पूरे साल असामयिक बारिश, लंबी शीतलहर, घना कोहरा और अचानक बढ़ते तापमान ने खेती की पारंपरिक समझ को तगड़ी चुनौती दी है। गेहूं, धान और मक्का जैसी प्रमुख नकदी फसलें कभी बेमौसमी वर्षा तो कभी नमी और सूखे की दोहरी मार से लगातार प्रभावित होती रहीं। ऐसे में स्थानीय किसानों ने खेती में नए नए प्रयोग किए। यह सब डाटा बहुत ही बारीकी से जुटाए जा रहे हैं, जिससे जल्द से जल्द इसका समाधान निकाला जा सके।
क्या है प्रयोगशाला का आधार : कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में औसत वर्षा 1250 से 1500 मिमी के बीच दर्ज की गई जबकि औसत तापमान में करीब 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई। इसका सीधा असर फसल चक्र और उत्पादकता पर पड़ा। जनवरी-फरवरी में लंबी शीतलहर और कोहरे ने गेहूं की बढ़वार रोकी, मार्च-अप्रैल की असामान्य गर्मी से फसल समय से पहले पक गई जबकि मई-जून में आए तूफान और बेमौसमी बारिश से कई इलाकों में 15 से 25 प्रतिशत तक फसल नुकसान हुआ।
इन हालात में किसान भी धीरे-धीरे रणनीति बदलते दिखे। बीज चयन, सिंचाई पैटर्न और फसल विविधीकरण पर प्रयोग शुरू हुए। जिले के युवा किसान मौसम पूर्वानुमान एप, ड्रिप सिंचाई और जलवायु-स्मार्ट तकनीकों की ओर बढ़े हैं।
इसलिए बढ़ी अहमियत : एसिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवीन सोनी मानते हैं कि मध्य गैंगेटिक मैदान का हिस्सा होने के कारण सिद्धार्थनगर कृषि-जलवायु मॉडल के तौर पर उभर सकता है। आम, अमरूद, आलू और धान जैसी फसलों पर मौसम का सीधा असर इस जिले को एक लाइव केस स्टडी बनाता है। यही वजह है कि यहां से जुटाया गया स्थानीय डाटा, अब एनपीसीसी और ‘हरित भारत मिशन’ जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। संवाद
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ऐसे में आईसीएआर और कृषि मंत्रालय ने सिद्धार्थनगर को हाल ही में ‘सेंसिटिव क्लाइमेट जोन’ के रूप में चिह्नित किया है। अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और सूखे की मार झेल रहे किसानों को बेहतर नुकसान न हो और उन्हें अच्छी पैदावार मिले, इसके लिए तराई को जलवायु नीति की प्रयोगशाला बनाया गया है, जहां से निकलने वाले आंकड़ों पर मंथन कर समाधान निकाला जाएगा।
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तराई बेल्ट के सीमांत जिले अब सिर्फ ऐतिहासिक, पौराणिक, कृषि या भौगोलिक पहचान तक सीमित नहीं रह गए हैं। 2025 में यहां दर्ज हुए मौसमी उतार-चढ़ाव, फसल पैटर्न में बदलाव और किसानों की बदलती रणनीतियां देश की राष्ट्रीय जलवायु नीति के लिए अहम संकेत बनकर उभरी हैं। विषय के जानकारों की मानें तो तराई बेल्ट के मौसम के चौकाने वाले आंकड़े और प्राकृतिक आपदाओं के बीच कृषि के सामंजस्य के पैटर्न को नीति का आधार बनाया जा रहा है।
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मौसम विशेषज्ञ बताते हैं कि सिद्धार्थनगर, महराजगंज, कुशीनगर जैसे तराई जिलों से जुटाया गया माइक्रो-लेवल डाटा अब एनएपीसीसी, हरित भारत मिशन और जलवायु-स्मार्ट कृषि योजनाओं में जोड़ा जा रहा है।
बीज पैटर्न परिवर्तन, सूखा-प्रतिरोधी किस्में, मौसम चेतावनी एप और जल प्रबंधन मॉडल को नीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के जलवायु और पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि पूरे साल असामयिक बारिश, लंबी शीतलहर, घना कोहरा और अचानक बढ़ते तापमान ने खेती की पारंपरिक समझ को तगड़ी चुनौती दी है। गेहूं, धान और मक्का जैसी प्रमुख नकदी फसलें कभी बेमौसमी वर्षा तो कभी नमी और सूखे की दोहरी मार से लगातार प्रभावित होती रहीं। ऐसे में स्थानीय किसानों ने खेती में नए नए प्रयोग किए। यह सब डाटा बहुत ही बारीकी से जुटाए जा रहे हैं, जिससे जल्द से जल्द इसका समाधान निकाला जा सके।
क्या है प्रयोगशाला का आधार : कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में औसत वर्षा 1250 से 1500 मिमी के बीच दर्ज की गई जबकि औसत तापमान में करीब 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई। इसका सीधा असर फसल चक्र और उत्पादकता पर पड़ा। जनवरी-फरवरी में लंबी शीतलहर और कोहरे ने गेहूं की बढ़वार रोकी, मार्च-अप्रैल की असामान्य गर्मी से फसल समय से पहले पक गई जबकि मई-जून में आए तूफान और बेमौसमी बारिश से कई इलाकों में 15 से 25 प्रतिशत तक फसल नुकसान हुआ।
इन हालात में किसान भी धीरे-धीरे रणनीति बदलते दिखे। बीज चयन, सिंचाई पैटर्न और फसल विविधीकरण पर प्रयोग शुरू हुए। जिले के युवा किसान मौसम पूर्वानुमान एप, ड्रिप सिंचाई और जलवायु-स्मार्ट तकनीकों की ओर बढ़े हैं।
इसलिए बढ़ी अहमियत : एसिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवीन सोनी मानते हैं कि मध्य गैंगेटिक मैदान का हिस्सा होने के कारण सिद्धार्थनगर कृषि-जलवायु मॉडल के तौर पर उभर सकता है। आम, अमरूद, आलू और धान जैसी फसलों पर मौसम का सीधा असर इस जिले को एक लाइव केस स्टडी बनाता है। यही वजह है कि यहां से जुटाया गया स्थानीय डाटा, अब एनपीसीसी और ‘हरित भारत मिशन’ जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। संवाद