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Siddharthnagar News: राखी का धागा बचा, मिलने का वक्त घटा
Wed, 26 Aug 2026 12:07 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Wed, 26 Aug 2026 12:07 AM IST
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- नौकरी, पढ़ाई और पलायन ने बदला रक्षाबंधन का स्वरूप; नेग में नकद की जगह यूपीआई का बढ़ा चलन
- सिद्धार्थनगर 20-30 परिवारों से बातचीत पर आधारित सामाजिक ट्रेंड रिपोर्ट
सिद्धार्थनगर। रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का सबसे आत्मीय पर्व माना जाता है लेकिन बीते एक दशक में इसके स्वरूप में बड़ा बदलाव आया है। राखी का धागा आज भी उतनी ही श्रद्धा से बंध रहा है, मगर साथ बैठकर बिताए जाने वाले समय में लगातार कमी आई है। नौकरी, उच्च शिक्षा और दूसरे शहरों की ओर बढ़ते पलायन ने पारिवारिक मेल-मिलाप को कुछ घंटों तक समेट दिया है।
संवाद टीम ने सिद्धार्थनगर शहर, बांसी, इटवा, शोहरतगढ़ और बढ़नी क्षेत्र के 20-30 परिवारों से बातचीत की। अधिकांश परिवारों ने माना कि वर्ष 2016 की तुलना में अब भाई-बहन का आमने-सामने मिलना कम हुआ है। कई परिवारों में इस बार भी राखी वीडियो कॉल पर मनाई जाएगी क्योंकि कोई दिल्ली, लखनऊ, नोएडा या बंगलूरू में नौकरी कर रहा है तो कोई उच्च शिक्षा के लिए बाहर रह रहा है।
डुमरियागंज की नेहा श्रीवास्तव कहती हैं पहले राखी पर दो-तीन दिन मायके में रुकती थी। अब नौकरी और बच्चों की जिम्मेदारी के कारण एक दिन से ज्यादा रुकना संभव नहीं होता। त्योहार की खुशी वही है लेकिन साथ बिताने का समय कम हो गया है।
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इटवा के राहुल वर्मा बताते हैं कि बहन लखनऊ में नौकरी करती है। इस बार छुट्टी नहीं मिली तो वीडियो कॉल से ही राखी मनाएंगे। नेग अब नकद देने के बजाय यूपीआई से भेजना आसान लगता है।
बांसी की सुनीता देवी के परिवार में तीन बेटियां अलग-अलग शहरों में रहती हैं। वह कहती हैं कि पहले राखी पर घर में कई दिनों तक चहल-पहल रहती थी। अब बेटियां आती भी हैं तो अगले दिन लौटने की चिंता रहती है।
शोहरतगढ़ के अमित चौधरी कहते हैं कि मैं दिल्ली में काम करता हूं। हर साल घर आना संभव नहीं होता। पहले बहन को नेग लिफाफे में देते थे, अब ऑनलाइन भेज देते हैं। सुविधा बढ़ी है, लेकिन सामने बैठकर राखी बंधवाने का आनंद अलग है।
बढ़नी की पूजा मिश्रा बताती हैं कि पढ़ाई और नौकरी के कारण परिवार के सदस्य अलग-अलग शहरों में हैं। वीडियो कॉल ने दूरी जरूर कम की है लेकिन त्योहार पर परिवार का एक साथ बैठना अब पहले जैसा नहीं रहा।
समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय कहते हैं कि रक्षाबंधन पर घर लौटने की परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस वर्ष रोडवेज बसों में महिलाओं के लिए निशुल्क यात्रा सुविधा से बड़ी संख्या में बहनों के मायके आने की संभावना है। अधिकतर के पास एक दिन से अधिक रुकने का समय नहीं होगा।
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मायके में तीन दिन से घटकर कुछ घंटे
- बातचीत में सामने आया कि दस वर्ष पहले विवाहित बहनें तीन से चार दिन मायके में रुकती थीं। परिवार के सभी सदस्यों के साथ समय बिताना, रिश्तेदारों से मिलना और त्योहार के बाद लौटना सामान्य बात थी। अब निजी नौकरियों, बच्चों के स्कूल और सीमित अवकाश के कारण कई बहनें सुबह आती हैं और शाम तक वापस लौट जाती हैं। जो दूर महानगरों में रहती हैं, वे यात्रा की कठिनाई के कारण हर वर्ष आ भी नहीं पातीं।
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रिश्ते वही, माध्यम बदल गया
- राखी के साथ नेग देने की परंपरा भी बदल रही है। पहले भाई जेब से नकद निकालकर बहन के हाथ में रखता था। अब मोबाइल फोन पर यूपीआई, बैंक ट्रांसफर और ऑनलाइन गिफ्ट वाउचर सामान्य होते जा रहे हैं। कई परिवारों ने बताया कि बाहर रहने वाले भाई पहले ही डिजिटल भुगतान कर देते हैं और राखी वीडियो कॉल के माध्यम से बंधती है। डिजिटल सुविधा ने दूरी कम की है लेकिन व्यक्तिगत उपस्थिति का स्थान पूरी तरह नहीं ले सकी है।
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बदलती सामाजिक संरचना का असर
- समाजशास्त्रियों के अनुसार संयुक्त परिवारों के विखंडन, रोजगार के शहरी केंद्रीकरण और शिक्षा के लिए बढ़ते प्रवास ने पारिवारिक त्योहारों की प्रकृति बदल दी है। रक्षाबंधन आज भी भावनात्मक रूप से उतना ही महत्वपूर्ण है लेकिन उसका सामाजिक प्रारूप अधिक व्यावहारिक और समय-सीमित होता जा रहा है।
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इसलिए बदला रक्षाबंधन
- रोजगार के लिए महानगरों की ओर बढ़ता पलायन
- निजी क्षेत्र में सीमित अवकाश
- उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में रह रहे छात्र-छात्राएं
- लंबी दूरी की यात्रा और बढ़ती व्यस्त जीवनशैली
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राखी का इंतजार आज भी उतना ही रहता है लेकिन छुट्टी सिर्फ एक दिन मिलती है। अब मायके की तीन दिन की रौनक कुछ घंटों में सिमट गई है।
- पूजा, शास्त्रीनगर
बहन दूसरे शहर में रहती है, इसलिए कई बार वीडियो कॉल पर ही राखी बंधती है। नेग मोबाइल से भेज देते हैं लेकिन आमने-सामने मिलने की खुशी अलग होती है।
- सुंदर गुप्ता, मिश्रौलिया
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ऑनलाइन नेग का बदलता चलन
- यूपीआई से सीधे खाते में नेग : बाहर रहने वाले भाई अब राखी के दिन नकद देने के बजाय बहन के खाते में यूपीआई से राशि भेज रहे हैं।
- लिफाफे की जगह मोबाइल स्क्रीन : पहले राखी बांधने के बाद हाथ में नकद या लिफाफा दिया जाता था, अब मोबाइल पर भुगतान का मैसेज ही नेग का प्रमाण बन गया है।
- पहले से भेज रहे नेग : कई भाई राखी से एक-दो दिन पहले ही ऑनलाइन नेग भेज देते हैं ताकि बहन अपनी पसंद का सामान खरीद सके।
- ऑनलाइन गिफ्ट का विकल्प : कुछ परिवारों में नकद नेग की जगह कपड़े, कॉस्मेटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक सामान या गिफ्ट वाउचर ऑनलाइन भेजने का चलन बढ़ा है।
- भावना वही, तरीका बदला : परिवारों का कहना है कि डिजिटल भुगतान सुविधाजनक है लेकिन हाथ में नेग देने और साथ बैठकर त्योहार मनाने की आत्मीयता अलग होती है।
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- सिद्धार्थनगर 20-30 परिवारों से बातचीत पर आधारित सामाजिक ट्रेंड रिपोर्ट
सिद्धार्थनगर। रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का सबसे आत्मीय पर्व माना जाता है लेकिन बीते एक दशक में इसके स्वरूप में बड़ा बदलाव आया है। राखी का धागा आज भी उतनी ही श्रद्धा से बंध रहा है, मगर साथ बैठकर बिताए जाने वाले समय में लगातार कमी आई है। नौकरी, उच्च शिक्षा और दूसरे शहरों की ओर बढ़ते पलायन ने पारिवारिक मेल-मिलाप को कुछ घंटों तक समेट दिया है।
संवाद टीम ने सिद्धार्थनगर शहर, बांसी, इटवा, शोहरतगढ़ और बढ़नी क्षेत्र के 20-30 परिवारों से बातचीत की। अधिकांश परिवारों ने माना कि वर्ष 2016 की तुलना में अब भाई-बहन का आमने-सामने मिलना कम हुआ है। कई परिवारों में इस बार भी राखी वीडियो कॉल पर मनाई जाएगी क्योंकि कोई दिल्ली, लखनऊ, नोएडा या बंगलूरू में नौकरी कर रहा है तो कोई उच्च शिक्षा के लिए बाहर रह रहा है।
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डुमरियागंज की नेहा श्रीवास्तव कहती हैं पहले राखी पर दो-तीन दिन मायके में रुकती थी। अब नौकरी और बच्चों की जिम्मेदारी के कारण एक दिन से ज्यादा रुकना संभव नहीं होता। त्योहार की खुशी वही है लेकिन साथ बिताने का समय कम हो गया है।
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इटवा के राहुल वर्मा बताते हैं कि बहन लखनऊ में नौकरी करती है। इस बार छुट्टी नहीं मिली तो वीडियो कॉल से ही राखी मनाएंगे। नेग अब नकद देने के बजाय यूपीआई से भेजना आसान लगता है।
बांसी की सुनीता देवी के परिवार में तीन बेटियां अलग-अलग शहरों में रहती हैं। वह कहती हैं कि पहले राखी पर घर में कई दिनों तक चहल-पहल रहती थी। अब बेटियां आती भी हैं तो अगले दिन लौटने की चिंता रहती है।
शोहरतगढ़ के अमित चौधरी कहते हैं कि मैं दिल्ली में काम करता हूं। हर साल घर आना संभव नहीं होता। पहले बहन को नेग लिफाफे में देते थे, अब ऑनलाइन भेज देते हैं। सुविधा बढ़ी है, लेकिन सामने बैठकर राखी बंधवाने का आनंद अलग है।
बढ़नी की पूजा मिश्रा बताती हैं कि पढ़ाई और नौकरी के कारण परिवार के सदस्य अलग-अलग शहरों में हैं। वीडियो कॉल ने दूरी जरूर कम की है लेकिन त्योहार पर परिवार का एक साथ बैठना अब पहले जैसा नहीं रहा।
समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय कहते हैं कि रक्षाबंधन पर घर लौटने की परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस वर्ष रोडवेज बसों में महिलाओं के लिए निशुल्क यात्रा सुविधा से बड़ी संख्या में बहनों के मायके आने की संभावना है। अधिकतर के पास एक दिन से अधिक रुकने का समय नहीं होगा।
मायके में तीन दिन से घटकर कुछ घंटे
- बातचीत में सामने आया कि दस वर्ष पहले विवाहित बहनें तीन से चार दिन मायके में रुकती थीं। परिवार के सभी सदस्यों के साथ समय बिताना, रिश्तेदारों से मिलना और त्योहार के बाद लौटना सामान्य बात थी। अब निजी नौकरियों, बच्चों के स्कूल और सीमित अवकाश के कारण कई बहनें सुबह आती हैं और शाम तक वापस लौट जाती हैं। जो दूर महानगरों में रहती हैं, वे यात्रा की कठिनाई के कारण हर वर्ष आ भी नहीं पातीं।
रिश्ते वही, माध्यम बदल गया
- राखी के साथ नेग देने की परंपरा भी बदल रही है। पहले भाई जेब से नकद निकालकर बहन के हाथ में रखता था। अब मोबाइल फोन पर यूपीआई, बैंक ट्रांसफर और ऑनलाइन गिफ्ट वाउचर सामान्य होते जा रहे हैं। कई परिवारों ने बताया कि बाहर रहने वाले भाई पहले ही डिजिटल भुगतान कर देते हैं और राखी वीडियो कॉल के माध्यम से बंधती है। डिजिटल सुविधा ने दूरी कम की है लेकिन व्यक्तिगत उपस्थिति का स्थान पूरी तरह नहीं ले सकी है।
बदलती सामाजिक संरचना का असर
- समाजशास्त्रियों के अनुसार संयुक्त परिवारों के विखंडन, रोजगार के शहरी केंद्रीकरण और शिक्षा के लिए बढ़ते प्रवास ने पारिवारिक त्योहारों की प्रकृति बदल दी है। रक्षाबंधन आज भी भावनात्मक रूप से उतना ही महत्वपूर्ण है लेकिन उसका सामाजिक प्रारूप अधिक व्यावहारिक और समय-सीमित होता जा रहा है।
इसलिए बदला रक्षाबंधन
- रोजगार के लिए महानगरों की ओर बढ़ता पलायन
- निजी क्षेत्र में सीमित अवकाश
- उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में रह रहे छात्र-छात्राएं
- लंबी दूरी की यात्रा और बढ़ती व्यस्त जीवनशैली
राखी का इंतजार आज भी उतना ही रहता है लेकिन छुट्टी सिर्फ एक दिन मिलती है। अब मायके की तीन दिन की रौनक कुछ घंटों में सिमट गई है।
- पूजा, शास्त्रीनगर
बहन दूसरे शहर में रहती है, इसलिए कई बार वीडियो कॉल पर ही राखी बंधती है। नेग मोबाइल से भेज देते हैं लेकिन आमने-सामने मिलने की खुशी अलग होती है।
- सुंदर गुप्ता, मिश्रौलिया
ऑनलाइन नेग का बदलता चलन
- यूपीआई से सीधे खाते में नेग : बाहर रहने वाले भाई अब राखी के दिन नकद देने के बजाय बहन के खाते में यूपीआई से राशि भेज रहे हैं।
- लिफाफे की जगह मोबाइल स्क्रीन : पहले राखी बांधने के बाद हाथ में नकद या लिफाफा दिया जाता था, अब मोबाइल पर भुगतान का मैसेज ही नेग का प्रमाण बन गया है।
- पहले से भेज रहे नेग : कई भाई राखी से एक-दो दिन पहले ही ऑनलाइन नेग भेज देते हैं ताकि बहन अपनी पसंद का सामान खरीद सके।
- ऑनलाइन गिफ्ट का विकल्प : कुछ परिवारों में नकद नेग की जगह कपड़े, कॉस्मेटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक सामान या गिफ्ट वाउचर ऑनलाइन भेजने का चलन बढ़ा है।
- भावना वही, तरीका बदला : परिवारों का कहना है कि डिजिटल भुगतान सुविधाजनक है लेकिन हाथ में नेग देने और साथ बैठकर त्योहार मनाने की आत्मीयता अलग होती है।