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Siddharthnagar News: अभिभावकों को लगा मोबाइल का चस्का... कीमत चुका रहे मासूम

Wed, 10 Dec 2025 11:38 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Wed, 10 Dec 2025 11:38 PM IST
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Siddharthnagar News: Parents are addicted to mobile phones...innocent children are paying the price
- माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के न्यूरो विभाग में हर माह इलाज के लिए आ रहे 40 से 45 बच्चे
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- छत, बिस्तर और अन्य जगहों से गिरने वाले अधिकांश घायल बच्चों की उम्र 5 से 12 वर्ष के बीच

सिद्धार्थनगर। अभिभावकों की गैर जिम्मेदारी और लापरवाही से बच्चों के साथ हादसा होने का खतरा बढ़ गया है। मेडिकल काॅलेज में छत, सीढ़ी व अन्य ऊंची जगह से गिरकर घायल हो रहे मासूम इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। अकेले में घर में चहलकदमी कर रहे मासूमों पर ध्यान नहीं दिया गया तो बड़ी अनहोनी से इन्कार नहीं किया जा सकता है। मेडिकल कॉलेज के चिकित्सों के अनुसार अभिभावकों के मोबाइल पर रील और सीरियल में व्यस्त हो जाने से ऐसे मामले बढ़ रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज के न्यूरो विभाग की ओपीडी व इमरजेंसी में मिलाकर हर महीने करीब 40 से 45 मासूम गहरी चोट लगने की वजह से इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। कोई छत पर दौड़ते समय तो कोई सीढ़ी से फिसल कर गिरने के घायल हो रहा है। ऐसे मामलाें की संख्या सबसे अधिक है जबकि परिजनों के व्यवस्त होने और बच्चों को छूट मिलने से भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। चिकित्सकों ने बताया कि इसमें अधिकतर बच्चे 5 से 12 वर्ष की उम्र के बीच के हैं। बिना रेलिंग वाली छत, कच्ची या ढीली मुंडेर, ऊंचाई पर खेलने की आदत और अभिभावकों की निगरानी के अभाव में वह हादसे का शिकार हो रहे हैं।
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कई मामलों में अभिभावक मोबाइल फोन पर रील देखने में व्यस्त रहते हैं और बच्चे छत पर अकेले खेलते हुए अचानक फिसल कर गिर जाते हैं। मेडिकल कॉलेज में आने वाले बच्चों को सिर पर गहरी चोट, हाथ-पैर में फ्रैक्चर और रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें की समस्या हो रही हैं। यहां तक कि सर्जरी करने की भी नौबत बन जा रही है।
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विदेशों में कड़ा नियम
डॉ. आशुतोष शुक्ला ने बताया कि बच्चों की देखभाल को लेकर विदेशों में सख्त नियम हैं। वहां मां नवजात बच्चे के गोद में लेकर बाहर नहीं जा सकती। इतना ही नहीं लापरवाही या अनदेखी सामने आने पर अभिभावक पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। बच्चे को अकेले छोड़ने की इजाजत नहीं है, लेकिन भारत में ऐसा कोई नियम-कानून नहीं है। अनजाने में ही सही लेकिन माता-पिता द्वारा की गई जरा सी अनदेखी बच्चे की जान जोखिम में डाल रही है।

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इस तरह बरतें सावधानी

-बच्चों की पहुंच से बाहर लॉक या कैच (कुंडी) का इस्तेमाल करें
-बालकनी और छत की रेलिंग (मुंडेर) पर ध्यान दें
-रेलिंग की ऊंचाई पर्याप्त होनी चाहिए (कम से कम 3.5 फीट)

-रेलिंग के बीच की दूरी कम हो ताकि बच्चे उसमें से न निकल सकें
-पलंग, सोफा या अन्य फर्नीचर को खिड़कियों या बालकनी से दूर रखें

-छोटे बच्चों को कभी भी ऊंची जगहों पर, जैसे छत या बालकनी में, अकेला न छोड़ें
-बच्चों को सिखाएं कि ऊंची जगहों पर खेलना या रेलिंग पर झुकना खतरनाक हो सकता है

केस नंबर एक

शनिवार को इटवा क्षेत्र का एक पांच वर्ष का बच्चा छत की सीढि़यों से गिर गया। उसके सिर के पिछले हिस्से में चोट लगी है। बच्चा खेलते समय अचानक नीचे उतरने लगा, जिससे वह फिसल कर गिर गया। मौके पर मौजूद इमरजेंसी इंचार्ज डॉ. आशुतोष शुक्ला उसे भर्ती कर न्यूरो विभाग में इलाज के लिए भेज दिए। घर के लोगाें ने बताया कि छत की सीढि़यों से उतरते समय गिर गया, जिससे सर पर चोट आई हैं।

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केस नंबर दो

शहर के भीमापार मोहल्ले में बीते सोमवार को खेलते समय छत पर दौड़ते समय एक छोटा बच्चा गिर गया। इससे परिजन उसे मेडिकल कॉलेज लाए। मेडिकल कॉलेज में उसको सर व रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की बात सामने आई। डॉक्टर ने बताया कि गिरने पर अक्सर बच्चों को सर में चोट लगती है, इससे उन्हें आगे समस्या का सामना करना पड़ सकता है।


लोग बच्चों को बाइक पेट्रोल की टंकी पर बैठाने में भी नहीं घबराते। स्कूटर पर पीछे बैठाकर तेज रफ्तार में सफर करते हैं जबकि माताएं दोपहर के समय टीवी सीरियल देखते समय या खाना बनाते समय बच्चों को कमरे या आंगन में छोड़ देतीं हैं। ऐसे घरों में ज्यादातर छोटे बच्चे बिस्तर, सीढि़यों, बालकनी और छत से गिरते हैं। ऐसी चोटें इलाज के बावजूद उनके मस्तिष्क पर दूरगामी प्रभाव छोड़ती हैं। इसके कारण ऐसे बच्चों का परफारमेंस लगातार खराब होती चली जाती है।

डॉ. आशुतोष शुक्ला, विभागाध्यक्ष, न्यूरोसर्जरी, माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज
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