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Siddharthnagar News: पराली न जलाएं, मिट्टी की उर्वरता बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने बताए तरीके
Fri, 30 Oct 2026 11:28 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 30 Oct 2026 11:28 PM IST
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- हिजुरा गांव में खेत बचाओ अभियान के तहत जागरूकता कार्यक्रम, सुपर सीडर और हैप्पी सीडर से बुवाई की दी जानकारी
भनवापुर। खेतों में पराली जलाने से होने वाले नुकसान और मिट्टी की उर्वरता बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र सोहना के वैज्ञानिकों ने बृहस्पतिवार को हिजुरा गांव में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। खेत बचाओ अभियान के तहत किसानों को पराली जलाने के बजाय फसल अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने की सलाह दी गई।
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया कि कंबाइन से धान की कटाई के बाद सुपर सीडर और हैप्पी सीडर की मदद से पराली जलाए बिना गेहूं की बुवाई की जा सकती है। मल्चर और स्ट्रॉ रीपर से पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिलाने से वह जैविक खाद बन जाती है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार देहाती ने बताया कि पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता और फसल उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। लगातार पराली जलाने से मिट्टी कठोर होने के साथ उसकी जलधारण क्षमता भी घटती है।
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उन्होंने किसानों को स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम, रोटावेटर, डिस्क हैरो और कल्टीवेटर की मदद से फसल अवशेषों का प्रबंधन करने की सलाह दी। वैज्ञानिकों ने बताया कि धान की पराली का उपयोग पशुचारे के रूप में भी किया जा सकता है। बेलर मशीन से गांठें बनाकर इन्हें पशुचारे और बायोगैस प्लांट के लिए बेचकर किसान अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने किसानों से पराली नहीं जलाने और वैज्ञानिक विधियों से उसका प्रबंधन करने की अपील की, ताकि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रह सकें।
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भनवापुर। खेतों में पराली जलाने से होने वाले नुकसान और मिट्टी की उर्वरता बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र सोहना के वैज्ञानिकों ने बृहस्पतिवार को हिजुरा गांव में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। खेत बचाओ अभियान के तहत किसानों को पराली जलाने के बजाय फसल अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने की सलाह दी गई।
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया कि कंबाइन से धान की कटाई के बाद सुपर सीडर और हैप्पी सीडर की मदद से पराली जलाए बिना गेहूं की बुवाई की जा सकती है। मल्चर और स्ट्रॉ रीपर से पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिलाने से वह जैविक खाद बन जाती है।
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कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार देहाती ने बताया कि पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता और फसल उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। लगातार पराली जलाने से मिट्टी कठोर होने के साथ उसकी जलधारण क्षमता भी घटती है।
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उन्होंने किसानों को स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम, रोटावेटर, डिस्क हैरो और कल्टीवेटर की मदद से फसल अवशेषों का प्रबंधन करने की सलाह दी। वैज्ञानिकों ने बताया कि धान की पराली का उपयोग पशुचारे के रूप में भी किया जा सकता है। बेलर मशीन से गांठें बनाकर इन्हें पशुचारे और बायोगैस प्लांट के लिए बेचकर किसान अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने किसानों से पराली नहीं जलाने और वैज्ञानिक विधियों से उसका प्रबंधन करने की अपील की, ताकि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रह सकें।