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पाइप की जगह सिलिंडर से ऑक्सीजन
अमर उजाला ब्यूरो/सिद्धार्थनगर
Updated Tue, 09 Feb 2016 11:19 PM IST
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मौत से संघर्ष करते मरीजों को जीवन देने के लिए जिला अस्पताल में बिछाई गई ऑक्सीजन पाइप भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। दो साल पहले करीब तीन करोड़ रुपये खर्च कर बिछाई गई इस पाइप में अब तक ऑक्सीजन नहीं दौड़ पाया है। मरीजों को अब भी मैनुअली व्यवस्था के तहत सिलेंडर से ऑक्सीजन दिया जा रहा है।
नियमों को दरकिनार कर बगैर टेंडर कराए गए इस कार्य में मनमानी खूब हुई है। दो दिन में ही तीन करोड़ रुपये खर्च कर भुगतान भी कर दिया गया। बावजूद ऑक्सीजन पाइप शोपीस ही बनी हुई है।
जिला अस्पताल को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने के मकसद से ऑक्सीजन पाइप की व्यवस्था की गई थी। इस मद में दो करोड़ 90 लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई है।
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रिकार्ड के मुताबिक यह कार्य वर्ष 2014 में ही पूरा हो चुका है। बावजूद दो वर्ष से मरीजों को ऑक्सीजन सिलेंडर से ही दिया जा रहा है। जिम्मेदारों की दलील है कि सिलेंडर की उपलब्धता सिर्फ वैकल्पिक है, मगर न जाने क्यों यह विकल्प उन्हें इतना रास आता है कि ऑक्सीजन पाइप की तरह देखते भी नहीं।
सूत्रों के मुताबिक बजट खपाने के चक्कर में ऑक्सीजन पाइप लगाने का कार्य इतनी तेजी के साथ हुआ कि नियम-कानून भी गौण हो गए। मनमाने ढंग से कार्य का ही असर है कि दो साल बाद भी यह व्यवस्था चालू नहीं हो पाई है। अस्पताल प्रबंधन मनमानी करते हुए सिलेंडर की पुरानी व्यवस्था से ही काम चला रहा है।
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नियमों को दरकिनार कर बगैर टेंडर कराए गए इस कार्य में मनमानी खूब हुई है। दो दिन में ही तीन करोड़ रुपये खर्च कर भुगतान भी कर दिया गया। बावजूद ऑक्सीजन पाइप शोपीस ही बनी हुई है।
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जिला अस्पताल को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने के मकसद से ऑक्सीजन पाइप की व्यवस्था की गई थी। इस मद में दो करोड़ 90 लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई है।
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रिकार्ड के मुताबिक यह कार्य वर्ष 2014 में ही पूरा हो चुका है। बावजूद दो वर्ष से मरीजों को ऑक्सीजन सिलेंडर से ही दिया जा रहा है। जिम्मेदारों की दलील है कि सिलेंडर की उपलब्धता सिर्फ वैकल्पिक है, मगर न जाने क्यों यह विकल्प उन्हें इतना रास आता है कि ऑक्सीजन पाइप की तरह देखते भी नहीं।
सूत्रों के मुताबिक बजट खपाने के चक्कर में ऑक्सीजन पाइप लगाने का कार्य इतनी तेजी के साथ हुआ कि नियम-कानून भी गौण हो गए। मनमाने ढंग से कार्य का ही असर है कि दो साल बाद भी यह व्यवस्था चालू नहीं हो पाई है। अस्पताल प्रबंधन मनमानी करते हुए सिलेंडर की पुरानी व्यवस्था से ही काम चला रहा है।