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गन्ने की खेती में घाटा, युवा हो गए परदेसी

Wed, 19 Jan 2022 09:57 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 19 Jan 2022 09:57 PM IST
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Loss in sugarcane cultivation, youth turned foreigner
गन्ने की खेती में घाटा, युवा हो गए परदेसी
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भनवापुर। गन्ने की खेती से जरूरतें पूरी नहीं हो पाने के कारण, डुमरियागंज व इटवा क्षेत्र में किसानों का इसकी खेती से मोहभंग हो रहा है। इससे क्षेत्र में गन्ने की खेती का रकबा तो घटा ही, कई किसानों के परिवार के युवाओं को परदेसी होने के लिए भी मजबूर होना पड़ा। कई ऐसे खेतिहर हैं, जिनके बेटे अब महानगरों में जाकर श्रमिक बन गए हैं। जिले में चीनी मिल नहीं होने और बस्ती की मिल से भुगतान समय से नहीं होने के कारण इस क्षेत्र के किसानों के लिए गन्ने की खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है।
जिले में चीनी मिल नहीं होने की वजह से किसान बस्ती में रूधौली की चीनी मिल को अपना गन्ना बेचते हैं। चीनी मिल प्रबंधन पर समय से भुगतान न करने का आरोप लगाकर किसान अब गन्ने की खेती छोड़ रहे हैं। इससे क्षेत्र में गन्ने का रकबा कम हो रहा है। किसान राम सेवक का कहना है कि पांच वर्ष पहले हिजुरा, सोहना तथा चौखड़ा गन्ना क्रय केंद्रों पर पेराई सत्र में हिजुरा से करीब 60 से 70 हजार क्विंटल तथा चौखड़ा से भी 55 से 60 हजार क्विंटल गन्ने की खरीद की जाती थी। गन्ना क्रय केंद्रों पर भीड़ तथा किसानों के गन्ने की जल्दी खरीद करने के लिए चीनी मिल प्रबंधन की ओर से हिजुरा के अतिरिक्त तरहर में तथा चौखड़ा से अलग हथियवा में क्रय केंद्र को स्थापित किया गया था। गन्ने का रकबा घटा तो ये केंद्र बंद हो गए।
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क्षेत्र के राम कुमार, शिवशंकर, हरिश्चंद्र, लालता प्रसाद, राम अनुज आदि ने बताया कि धीरे-धीरे मिल प्रबंधन की मनमानी के कारण गन्ना खरीदने के बाद उसके मूल्य का भुगतान समय पर नहीं करने के कारण क्षेत्र में गन्ने का रकबा कम होता चला गया। गन्ने की खेती के कारण गांव के कई लोगों को घर पर ही रोजगार मिलता था। चार से छह माह तक किसान अपने गन्ने की खेती और उसे बेचने के लिए मेहनत करता था। भुगतान नहीं होने के कारण किसान के परिवार में दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं हो पाता है। यहीं कारण है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में खेती से नुकसान होने के कारण युवाओं ने रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर रुख कर लिया। स्थिति ऐसी हो गई है कि गांवों में युवाओं की संख्या कम हो गई है। हालांकि, वे महानगर में जाकर यहां की अपेक्षा अधिक श्रम और त्याग करने के लिए मजबूर हैं। इन किसानों का कहना है कि जिले में भी चीनी मिल होनी चाहिए।
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