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श्रीलंका से आए उपासकों ने गंध कुटि पर की विशेष प्रार्थना
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बौद्ध तपोस्थली में बौद्ध संदेश सुनते अनुयायी।
- फोटो : SRAWASTI
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कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शनिवार को श्रीलंकाई अनुयायियों से गुलजार रही। तपोस्थली पहुंचे उपासकों ने गंध कुटि पर विशेष प्रार्थना की। इस दौरान बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो ने उन्हें तथागत भगवान बुद्ध का उपदेश सुनाया। कहा कि बुद्ध की बातें सुनकर अंगुलिमाल भी हिंसा छोड़ कर भिक्षु बन गया था।
बौद्ध भिक्षु ने कहा कि बुद्ध के समय में कौशल राज्य में अंगुलिमाल नाम का एक डाकू रहता था। वह लोगों की हत्या कर उनकी अंगुली काट कर उसे अपनी माला में पिरो लिया करता था। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा था। वह बहुत ही क्रूर था। जिधर उसका इलाका था, लोग उस तरफ जाने से भी डरते थे। राजा ने उसे पकड़ने के लिए कई बार अपनी सेना भेजी, लेकिन तमाम प्रयास के बाद भी वह असफल रहे। बुद्ध ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह समझा कि अंगुलिमाल के मन में कहीं दया व करुणा की भावना सोई हुई है। बस उसे जगाने की आवश्यकता है।
यह सोच बुद्ध उस ओर चल दिए, जिस ओर अंगुलिमाल रहता था। लोगों ने बुद्ध को जाने से बहुत मना किया, लेकिन वह नहीं रुके। अंगुलिमाल बुद्ध को अपनी ओर आता देख अपनी तलवार लेकर दौड़ा, लेकिन बुद्ध अपनी स्वाभाविक गति से चलते रहे। जब अंगुलिमाल निकट आया तो उन्होंने कहा मैं तो रुक गया, लेकिन तू कब रुकेगा। तू भी पाप कर्म करने से रुक। मैं इसलिए यहां आया हूं कि तू भी सत्य पथ का अनुगामी बन जाए। बुद्ध के वचनों का उस पर प्रभाव पड़ा।
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अंगुलिमाल ने कहा आखिर मुनि ने मुझे जीत ही लिया। आपकी दिव्य वाणी मुझे हमेशा के लिए पाप से विरत होने को कह रही है। मैं इस अनुशासन को स्वीकार करने को तैयार हूं। उसने अंगुलियों की माला उतार कर दूर फेंक दी और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। वह उसी समय से भिक्षु हो गया। कुछ समय के बाद उसे अर्हत पद भी प्राप्त हो गया। इस मौके पर कई अन्य बौद्ध भिक्षु व अनुयायी मौजूद रहे।
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बौद्ध भिक्षु ने कहा कि बुद्ध के समय में कौशल राज्य में अंगुलिमाल नाम का एक डाकू रहता था। वह लोगों की हत्या कर उनकी अंगुली काट कर उसे अपनी माला में पिरो लिया करता था। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा था। वह बहुत ही क्रूर था। जिधर उसका इलाका था, लोग उस तरफ जाने से भी डरते थे। राजा ने उसे पकड़ने के लिए कई बार अपनी सेना भेजी, लेकिन तमाम प्रयास के बाद भी वह असफल रहे। बुद्ध ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह समझा कि अंगुलिमाल के मन में कहीं दया व करुणा की भावना सोई हुई है। बस उसे जगाने की आवश्यकता है।
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यह सोच बुद्ध उस ओर चल दिए, जिस ओर अंगुलिमाल रहता था। लोगों ने बुद्ध को जाने से बहुत मना किया, लेकिन वह नहीं रुके। अंगुलिमाल बुद्ध को अपनी ओर आता देख अपनी तलवार लेकर दौड़ा, लेकिन बुद्ध अपनी स्वाभाविक गति से चलते रहे। जब अंगुलिमाल निकट आया तो उन्होंने कहा मैं तो रुक गया, लेकिन तू कब रुकेगा। तू भी पाप कर्म करने से रुक। मैं इसलिए यहां आया हूं कि तू भी सत्य पथ का अनुगामी बन जाए। बुद्ध के वचनों का उस पर प्रभाव पड़ा।
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अंगुलिमाल ने कहा आखिर मुनि ने मुझे जीत ही लिया। आपकी दिव्य वाणी मुझे हमेशा के लिए पाप से विरत होने को कह रही है। मैं इस अनुशासन को स्वीकार करने को तैयार हूं। उसने अंगुलियों की माला उतार कर दूर फेंक दी और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। वह उसी समय से भिक्षु हो गया। कुछ समय के बाद उसे अर्हत पद भी प्राप्त हो गया। इस मौके पर कई अन्य बौद्ध भिक्षु व अनुयायी मौजूद रहे।