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सीताद्वार झील के घाट पर होगी माता सीता की आरती
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श्रावस्ती। लवकुश की जन्म स्थली व वाल्मीकि आश्रम के लिए विख्यात सीताद्वार को फिर जीवंत किया जाएगा। इसके लिए सीताद्वार कायाकल्प योजना मंगलवार यानी अक्षय तृतीया के दिन शाम चार बजे प्रारंभ होगी। अभियान के तहत गंगा आरती की तर्ज पर सीताद्वार झील के मुख्य घाट पर माता सीता की आरती होगी।
पौराणिक श्रुतियों की मानें तो इकौना के टंड़वा महंथ स्थित सीताद्वार झील के किनारे ही लवकुश का जन्म हुआ था। यहीं वाल्मीकि आश्रम भी होना बताया जाता है। इसी स्थान पर आज माता सीता का मंदिर व वाल्मीकि आश्रम बना है। यहीं सीताद्वार झील है। हालांकि, गंदगी व शैवाल की वजह से यह अपना वजूद खो रही है। अब इस पौराणिकता को एक बार फिर विश्व पटल पर लाने के लिए प्रशासन पहल कर रहा है।
प्रशासन ने जन सहयोग, सांसद निधि, विधायक निधि, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत, मनरेगा सहित अन्य तमाम माध्यमों से इसके पौराणिक महत्व को वापस लाने की तैयारी की है। अक्षय तृतीया के दिन शाम चार बजे सीताद्वार झील उद्धार कार्यक्रम का शुभारंभ होगा। पहले चरण में झील की पौराणिकता वापस आएगी। तो दूसरे चरण में मंदिर को आकर्षक बनाया जाएगा। डीएम नेहा प्रकाश ने बताया कि इस स्थान की पौराणिकता को वापस लाते हुए पर्यटन का केंद्र बिंदु बनाने का प्रयास किया जाएगा।
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झील का क्षेत्रफल 154.5 हेक्टेयर है। पहले चरण में झील के पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में बोट क्लब की स्थापना होगी। बीस हेक्टेयर क्षेत्रफल में लोटस गार्डेन बनाया जाएगा। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में फिश ऐक्वेरियम बनेगा। पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में वाटर पार्क बनाने के साथ ही हैंगिंग रेस्टोरेंट की स्थापना की जायेगी। झील के शेष भाग पर मत्स्य पालन को बढ़ावा दिया जायेगा।
वाराणसी में होने वाली गंगा आरती की तर्ज पर सीताद्वार मुख्य घाट पर प्रतिदिन शाम को सीता आरती का आयोजन होगा। इस स्थान से जुड़ी पौराणिक कथाओं के आधार पर लाइट एंड साउंड कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। झील के दोनो ओर जॉगिंग ट्रैक का निर्माण कराने का भी प्रस्ताव है। पत्थर लगाकर घाटों को सुसज्जित किया जाएगा तथा सभी घाटों पर महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम की व्यवस्था कराई जाएगी।
सीताद्वार की पौराणिकता सभी लोग जानते है। सीताद्वार झील अपने आप में पौराणिक होने के साथ साथ पर्यटन का केंद्र बिंदु बन सकता है। इसीलिए इस स्थान की पौराणिकता को वापस लाते हुए इसे पर्यटन का कंद्र बिंदु बनाने का प्रयास किया जाएगा।
नेहा प्रकाश डीएम
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पौराणिक श्रुतियों की मानें तो इकौना के टंड़वा महंथ स्थित सीताद्वार झील के किनारे ही लवकुश का जन्म हुआ था। यहीं वाल्मीकि आश्रम भी होना बताया जाता है। इसी स्थान पर आज माता सीता का मंदिर व वाल्मीकि आश्रम बना है। यहीं सीताद्वार झील है। हालांकि, गंदगी व शैवाल की वजह से यह अपना वजूद खो रही है। अब इस पौराणिकता को एक बार फिर विश्व पटल पर लाने के लिए प्रशासन पहल कर रहा है।
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प्रशासन ने जन सहयोग, सांसद निधि, विधायक निधि, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत, मनरेगा सहित अन्य तमाम माध्यमों से इसके पौराणिक महत्व को वापस लाने की तैयारी की है। अक्षय तृतीया के दिन शाम चार बजे सीताद्वार झील उद्धार कार्यक्रम का शुभारंभ होगा। पहले चरण में झील की पौराणिकता वापस आएगी। तो दूसरे चरण में मंदिर को आकर्षक बनाया जाएगा। डीएम नेहा प्रकाश ने बताया कि इस स्थान की पौराणिकता को वापस लाते हुए पर्यटन का केंद्र बिंदु बनाने का प्रयास किया जाएगा।
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झील का क्षेत्रफल 154.5 हेक्टेयर है। पहले चरण में झील के पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में बोट क्लब की स्थापना होगी। बीस हेक्टेयर क्षेत्रफल में लोटस गार्डेन बनाया जाएगा। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में फिश ऐक्वेरियम बनेगा। पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में वाटर पार्क बनाने के साथ ही हैंगिंग रेस्टोरेंट की स्थापना की जायेगी। झील के शेष भाग पर मत्स्य पालन को बढ़ावा दिया जायेगा।
वाराणसी में होने वाली गंगा आरती की तर्ज पर सीताद्वार मुख्य घाट पर प्रतिदिन शाम को सीता आरती का आयोजन होगा। इस स्थान से जुड़ी पौराणिक कथाओं के आधार पर लाइट एंड साउंड कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। झील के दोनो ओर जॉगिंग ट्रैक का निर्माण कराने का भी प्रस्ताव है। पत्थर लगाकर घाटों को सुसज्जित किया जाएगा तथा सभी घाटों पर महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम की व्यवस्था कराई जाएगी।
सीताद्वार की पौराणिकता सभी लोग जानते है। सीताद्वार झील अपने आप में पौराणिक होने के साथ साथ पर्यटन का केंद्र बिंदु बन सकता है। इसीलिए इस स्थान की पौराणिकता को वापस लाते हुए इसे पर्यटन का कंद्र बिंदु बनाने का प्रयास किया जाएगा।
नेहा प्रकाश डीएम