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राष्ट्रीय नहर परियोजना के लिए साढ़े नौ हजार पेड़ों की कुर्बानी

Tue, 09 Nov 2021 11:33 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 09 Nov 2021 11:33 PM IST
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Nine and a half thousand trees sacrificed for the National Canal Project
श्रावस्ती। आजादी के बाद की सिंचित क्षेत्र बनाने को देश की सबसे बड़ी सरयू योजक राष्ट्रीय नहर परियोजना का कार्य अब पूरा हो चुका है। इससे पूर्वांचल के आठ जिलों सहित आस पास के कुछ अन्य राज्यों की कुल 14.04 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित क्षेत्र बनने से विकास की गाड़ी सरपट दौड़ सकेगी। हालांकि इसके लिए पर्यावरण संतुलन को दांव पर लगाना पड़ा। परियोजना कार्य पूरा कराने के लिए साढ़े नौ हजार हरे भरे पेड़ों की कुर्बानी देना पड़ी। इसका सर्वाधिक नुकसान भी श्रावस्ती को उठाना पड़ा। इसके चलते 6.5 किमी लंबे व सौ मीटर चौड़े जंगल पर आरा चलाना पड़ा। इसकी चपेट में जंगल में लगे सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ों को भी आना पड़ा।
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कृषि, सिंचाई, जल संरक्षण व बाढ़ आपदा को नियंत्रित करने के लिए 1978 में शुरू हुई एक छोटी सी परियोजना धीरे धीरे सरयू योजक राष्ट्रीय नहर परियोजना में परिवर्तित हो गई। इस राष्ट्रीय परियोजना को पूरा करने में लगभग 43 वर्ष लगे। इस परियोजना से 14.04 लाख हेक्टेअर भूमि को सिंचित बनाने के साथ ही पूर्वांचल में हर साल कहर ढाने वाली बाढ़ की आपदा से भी राहत मिलेगी। इसका सीधा फायदा पूर्वांचल के आठ जिलों में रहने वाली एक बड़े आबादी क्षेत्र को मिलेगा।
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इसके माध्यम से ही भारत सरकार की नदी घाटी जोड़ो परियोजना के तहत घाघरा, सरयू, राप्ती, बाणगंगा व रोहिणी नदी को नहरों के माध्यम से आपस में जोड़ा गया है। इससे आने वाले समय में इन इलाकों में होने वाली बाढ़ की विभीषिका से क्षेत्रीय लोगों को छुटकारा भी मिलेगा।
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सरयू नहर निर्माण के लिए श्रावस्ती के 6.5 किलोमीटर लंबे व सौ मीटर चौड़े जंगल पर आरा चलाया गया। काटे जाने वाले पेड़ों में सागौन, साखू की प्रजातियां सबसे ज्यादा रही ताकि ताकि एक नदी को दूसरी नदी से जमीन अधिग्रहण के झंझट में फंसे बिना नहरों के माध्यम से जोड़ा जा सके। इस परियोजना का मुख्य अंग राप्ती नहर परियोजना है। यह नहर श्रावस्ती के जमुनहा स्थित राप्ती बैराज से निकलती है। राप्ती बैराज से 6.5 किलोमीटर ककरदरी रेंज के जंगल के साथ आधा किलोमीटर का हिस्सा भिनगा वन क्षेत्र में पड़ता है। इस क्षेत्र में नहर निर्माण के लिए पहले जंगल में लगे प्राचीन पेड़ों को काटा गया। बाद में नहर का निर्माण हुआ। (संवाद)
पहले 16,800 पेड़ काटने की थी योजना
भिनगा व ककरदरी रेंज में सात किलोमीटर क्षेत्र में पहले नहर को 180 मीटर चौड़ाई में बनाया जाना था। इस कार्य को पूरा कराने के लिए करीब 16,800 पेड़ काटने का प्रस्ताव सिंचाई विभाग ने वन विभाग को दिया था। इतनी भारी मात्रा में पेड़ काटने की सहमति वन विभाग ने देने से मना कर दिया। इसी कारण पूरा मामला लगभग तीन साल तक केंद्रीय वन मंत्रालय व सिंचाई विभाग के बीच निस्तारण को अटका रहा। बाद में वन विभाग ने जंगल के अंदर 180 के बजाय 100 मीटर चौड़ाई में नहर खोदने की सहमति जताते हुए पेड़ काटने की अनुमति देने पर सहमति जतायी। चौड़ाई घटने के बाद भी ककरदरी क्षेत्र के 6.50 किलोमीटर परिक्षेत्र के 95 सौ पेड़ों पर आरा चलाना पड़ा।
पटरियों पर पौध रोपण की शर्त पर अनुमति
वन विभाग से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि इस परियोजना के लिए काटे गए जंगल की भरपाई के लिए नहर की पटरियों पर पौध रोपण की शर्त शुरू से ही शामिल रखी गई ताकि काटे गए जंगल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान की कुछ हद तक भरपाई करायी जा सके। अब परियोजना पूरी हो चुका है। ऐसे में उम्मीद है कि सिंचाई विभाग इस शर्त के तहत जल्दी ही नहर पटरियों पर सघन पौध रोपण अभियान संचालित करेगा।

पटरियों पर पौधरोपण से होगी भरपाई
विकास के लिए कुछ न कुछ कीमत सभी को चुकानी पड़ती है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने के लिए पेड़ काटना जरूरी था। लेकिन इसकी भरपाई पटरियों पर पौधरोपण करके होगी। -अजय कुमार, अधिशासी अभियंता सरयू नहर खंड/नोडल
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