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बीज प्रबंधन न होने से धान में बढ़ा झुलसे का प्रकोप
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गिलौला क्षेत्र के खेतों में धान में लगा झुलसा
- फोटो : SRAWASTI
श्रावस्ती। उचित बीज प्रबंधन न होने के कारण गिलौला क्षेत्र के गांवों में धान की फसल में झुलसा रोग लग रहा है। वहीं किसान मेला व प्रदर्शनी का आयोजन न होने व जानकारी के अभाव में किसान अपनी फसलों को रोग से बचाने का उचित प्रबंध नहीं कर पा रहे हैं। जिससे किसान परेशान हैं। जिससे उनकी फसलें बर्बाद हो रही हैं। गिलौला विकास क्षेत्र के गांवों में खेतों में पर्याप्त पानी होने के बावजूद धान की फसलों पर झुलसा रोग का प्रकोप देखा जा रहा है।
राजकीय कृषि गोदाम पर दवा उपलब्ध न होने के कारण किसान परेशान हैं। यदि समय रहते इसका उपचार न हुआ तो धान की पैदावार घट कर आधा हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक झुलसा रोग में धान की पत्तियों की नोक व किनारे एकदम सूखने लगती है। सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढ़े मेढ़े होने लगते हैं।
कुछ खेतों में पत्तियों पर धब्बे बनते हैं। जिनका किनारा गहरा भूरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का हो जाता है। साथ ही पत्तियों में धब्बे बन जाते हैं। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वह बीज बोने से पूर्व बीजोपचार उपयुक्त विधि से करें। रोग के लक्षण दिखाई देते ही यथासंभव खेत का पानी निकाल कर 15 ग्राम स्ट्रापटोसाइकलिन व कापर आक्सीप्रोलाइट के-500 ग्राम प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करें। साथ ही नाइट्रजन की टाप ड्रेसिंग बाकी है तो उसे रोक देना चाहिए। (संवाद)
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राजकीय कृषि गोदाम पर दवा उपलब्ध न होने के कारण किसान परेशान हैं। यदि समय रहते इसका उपचार न हुआ तो धान की पैदावार घट कर आधा हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक झुलसा रोग में धान की पत्तियों की नोक व किनारे एकदम सूखने लगती है। सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढ़े मेढ़े होने लगते हैं।
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कुछ खेतों में पत्तियों पर धब्बे बनते हैं। जिनका किनारा गहरा भूरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का हो जाता है। साथ ही पत्तियों में धब्बे बन जाते हैं। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वह बीज बोने से पूर्व बीजोपचार उपयुक्त विधि से करें। रोग के लक्षण दिखाई देते ही यथासंभव खेत का पानी निकाल कर 15 ग्राम स्ट्रापटोसाइकलिन व कापर आक्सीप्रोलाइट के-500 ग्राम प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करें। साथ ही नाइट्रजन की टाप ड्रेसिंग बाकी है तो उसे रोक देना चाहिए। (संवाद)
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