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बौद्ध अनुयायियों ने तपोस्थली में की विशेष पूजा
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बौद्ध तपोस्थली में पूजा अर्चन करते अनुयायी।
- फोटो : SRAWASTI
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कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शनिवार को अनुयायियों से गुलजार रही। श्रीलंका व वियतनाम से आए अनुयायियों ने श्रद्धालोक महाथेरो के नेतृत्व में गंध कुटि पर विशेष वर्षावास पूजा की। इस दौरान अनुयायियों को बुद्ध के जीवन चरित्र के बारे में जानकारी दी गई। बौद्ध अनुयायियों ने तपोस्थली में पूजा कर विश्व शांति की कामना की।
विशेष वर्षावास पूजा के दौरान भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो ने कहा कि 35 वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने सुजाता नामक महिला के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा।
मान्यता है कि समीपवर्ती गांव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ। वह बेटे के लिए पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर लेकर पहुंची। सिद्धार्थ वहां बैठ कर ध्यान कर रहे थे। सुजाता को लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं।
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सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा कि जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उन्हें सच्चा बोध हुआ और तभी से सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया।
चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वह काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुंचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया। इस मौके पर धम्म सागर, सुख सागर, नाग सागर, नाग ज्योति, माता विद्यावती आदि मौजूद रही।
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विशेष वर्षावास पूजा के दौरान भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो ने कहा कि 35 वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने सुजाता नामक महिला के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा।
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मान्यता है कि समीपवर्ती गांव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ। वह बेटे के लिए पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर लेकर पहुंची। सिद्धार्थ वहां बैठ कर ध्यान कर रहे थे। सुजाता को लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं।
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सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा कि जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उन्हें सच्चा बोध हुआ और तभी से सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया।
चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वह काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुंचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया। इस मौके पर धम्म सागर, सुख सागर, नाग सागर, नाग ज्योति, माता विद्यावती आदि मौजूद रही।