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चीन के प्रभाव में पहले भी आ चुकी तल्खी
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श्रावस्ती। नेपाल पर जब-जब चीन हावी हुआ, श्रावस्ती से रिश्ते खराब हुए। इससे कभी माओवादियों ने नो मैंसलैंड पर पिलर को तोड़ अपना झंडा भारतीय क्षेत्र में फहरा दिया तो कभी जमुनहा के राप्ती बैराज को तोड़ने की धमकी दी। यहां तक कि एक समय वह भी आया जब माओवादी रॉकेट लांचर से लैस होकर बैराज तोड़ने के लिए सीमा तक पहुंच गये। लेकिन भारतीय क्षेत्र में पुलिस की तैनाती देख लौट गये। इन तल्खियों के बीच भी आम लोगों के रिश्तों में कभी खटास नहीं आई।
भारत-नेपाल के बीच रिश्तों में तल्खी पहली बार नहीं है। जब-जब नेपाल पर चीन का प्रभाव बढ़ा, नेपाल वाले भारत को अपना दुश्मन बताने लगे। इसका प्रभाव श्रावस्ती पर भी पड़ा। श्रावस्ती की लगभग 62 किमी. सीमा नेपाल से मिलती है। नेपाल का बांके व डांग जिला श्रावस्ती से सटा हुआ है। नेपाल स्थित हिमालय की दक्षिण पहाड़ियों से निकलने वाली नदियां व पहाड़ी नाले इस तल्खी का हमेशा कारण बने।
जिसके चलते माओवादी आंदोलनकारियों के 25 सूत्रीय एजेंडे में यह तटबंध प्रमुख स्थान रखता था। यही नहीं जब-जब चीन के बहकावे में वहां के युवा आए उन्होंने सीमा क्षेत्र में उपद्रव भी किया। वर्ष 2009 में भारतीय क्षेत्र में घुस कर नोमैंस लैंड पर लगे पिलर संख्या 625 व उसके आसपास लगे पिलर तोड़ कर क्षतिग्रस्त कर दिए। पिलर 625 के बगल एक पेड़ पर माओवादियों ने अपने संगठन का झंडा फहरा कर इसे नेपाली क्षेत्र घोषित कर दिया था। बाद में एसएसबी की कार्रवाई के बाद स्थिति पुन: पहले जैसे ही बहाल हो गई।
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नेपाल व श्रावस्ती के बीच मूल समस्या
राप्ती नदी नेपाल के दक्षिण हिमालय से निकलती है। यह नदी नेपाल में लगभग 152 किलोमीटर का सफर तय करके श्रावस्ती के भोजपुर गांव से यह नदी जिले में प्रवेश करती है। वर्ष 1996-97 में इस नदी की विभीषिका को रोकने के लिए भारत सरकार ने जमुनहा में कलकलवा तटबंध का निर्माण कराया था।
यह तटबंध पर बने बैराज की लंबाई 284 मीटर है। इसमें 14 गेट हैं। कलकलवा मार्जिनल तटबंध की लंबाई यूं तो 19 किमी. है लेकिन इसमें से 14 किमी श्रावस्ती में है। बाकी हिस्सा लखीमपुर क्षेत्र में है। निर्माण के ही समय नेपाली नागरिकों का आरोप था कि तटबंध के कारण उनके क्षेत्र मे बाढ़ की स्थिति आएगी। इन आरोप प्रत्यारोप के बीच में तटबंध का निर्माण रोक दिया गया। तटबंध आज भी अधूरा है।
माओवादी कामरेड ने बताया था अपना संकल्प
माओवादी आंदोलन समाप्ति के बाद आंदोलन को सशस्त्र रूप से चलाने वाले कामरेड प्रकाश ने श्रावस्ती सीमा के निकट नेपाली क्षेत्र भगवानपुर में एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया था। इस दौरान उन्होंने अपने संकल्प को दोहराते हुए भारत से अच्छे संबंध की वकालत की थी। लेकिन श्रावस्ती के राप्ती बैराज स्थित कलकलवा तटबंध को नेपाल के लिए मुसीबत बताते हुए इस समस्या के निदान के लिए भारत सरकार से मांग की थी।
राप्ती बैराज का हल निकाले भारत
माओवादी आंदोलन के समय भी हम लोग चाहते थे कि भारत के साथ हमारा अच्छा तालमेल रहे। इसके लिए उच्च कमान से निर्देश थे कि किसी भी हाल में भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण न किया जाए। लेकिन 2009 में कम्युनिस्ट छात्र विंग के कुछ कार्यकर्ताओं ने अतिक्रमण का प्रयास किया था। इसके बाद कोई भी ऐसी घटना नहीं घटी जिससे बांके व डांग जिले के सीमा क्षेत्र में कोई गतिरोध आया हो। लेकिन जहां तक राप्ती बैराज का सवाल है तो वह आज भी नेपाल के लिए एक समस्या है। हम लोगों की मांग हमेशा से यह रही है कि भारत इस समस्या का समाधान निकाले। ताकि डुबान क्षेत्र के लोग बाढ़ आपदा से बच सकें। - कामरेड शशि कुलश्रेष्ठ, (माओवादी चिंतक)
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भारत-नेपाल के बीच रिश्तों में तल्खी पहली बार नहीं है। जब-जब नेपाल पर चीन का प्रभाव बढ़ा, नेपाल वाले भारत को अपना दुश्मन बताने लगे। इसका प्रभाव श्रावस्ती पर भी पड़ा। श्रावस्ती की लगभग 62 किमी. सीमा नेपाल से मिलती है। नेपाल का बांके व डांग जिला श्रावस्ती से सटा हुआ है। नेपाल स्थित हिमालय की दक्षिण पहाड़ियों से निकलने वाली नदियां व पहाड़ी नाले इस तल्खी का हमेशा कारण बने।
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जिसके चलते माओवादी आंदोलनकारियों के 25 सूत्रीय एजेंडे में यह तटबंध प्रमुख स्थान रखता था। यही नहीं जब-जब चीन के बहकावे में वहां के युवा आए उन्होंने सीमा क्षेत्र में उपद्रव भी किया। वर्ष 2009 में भारतीय क्षेत्र में घुस कर नोमैंस लैंड पर लगे पिलर संख्या 625 व उसके आसपास लगे पिलर तोड़ कर क्षतिग्रस्त कर दिए। पिलर 625 के बगल एक पेड़ पर माओवादियों ने अपने संगठन का झंडा फहरा कर इसे नेपाली क्षेत्र घोषित कर दिया था। बाद में एसएसबी की कार्रवाई के बाद स्थिति पुन: पहले जैसे ही बहाल हो गई।
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नेपाल व श्रावस्ती के बीच मूल समस्या
राप्ती नदी नेपाल के दक्षिण हिमालय से निकलती है। यह नदी नेपाल में लगभग 152 किलोमीटर का सफर तय करके श्रावस्ती के भोजपुर गांव से यह नदी जिले में प्रवेश करती है। वर्ष 1996-97 में इस नदी की विभीषिका को रोकने के लिए भारत सरकार ने जमुनहा में कलकलवा तटबंध का निर्माण कराया था।
यह तटबंध पर बने बैराज की लंबाई 284 मीटर है। इसमें 14 गेट हैं। कलकलवा मार्जिनल तटबंध की लंबाई यूं तो 19 किमी. है लेकिन इसमें से 14 किमी श्रावस्ती में है। बाकी हिस्सा लखीमपुर क्षेत्र में है। निर्माण के ही समय नेपाली नागरिकों का आरोप था कि तटबंध के कारण उनके क्षेत्र मे बाढ़ की स्थिति आएगी। इन आरोप प्रत्यारोप के बीच में तटबंध का निर्माण रोक दिया गया। तटबंध आज भी अधूरा है।
माओवादी कामरेड ने बताया था अपना संकल्प
माओवादी आंदोलन समाप्ति के बाद आंदोलन को सशस्त्र रूप से चलाने वाले कामरेड प्रकाश ने श्रावस्ती सीमा के निकट नेपाली क्षेत्र भगवानपुर में एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया था। इस दौरान उन्होंने अपने संकल्प को दोहराते हुए भारत से अच्छे संबंध की वकालत की थी। लेकिन श्रावस्ती के राप्ती बैराज स्थित कलकलवा तटबंध को नेपाल के लिए मुसीबत बताते हुए इस समस्या के निदान के लिए भारत सरकार से मांग की थी।
राप्ती बैराज का हल निकाले भारत
माओवादी आंदोलन के समय भी हम लोग चाहते थे कि भारत के साथ हमारा अच्छा तालमेल रहे। इसके लिए उच्च कमान से निर्देश थे कि किसी भी हाल में भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण न किया जाए। लेकिन 2009 में कम्युनिस्ट छात्र विंग के कुछ कार्यकर्ताओं ने अतिक्रमण का प्रयास किया था। इसके बाद कोई भी ऐसी घटना नहीं घटी जिससे बांके व डांग जिले के सीमा क्षेत्र में कोई गतिरोध आया हो। लेकिन जहां तक राप्ती बैराज का सवाल है तो वह आज भी नेपाल के लिए एक समस्या है। हम लोगों की मांग हमेशा से यह रही है कि भारत इस समस्या का समाधान निकाले। ताकि डुबान क्षेत्र के लोग बाढ़ आपदा से बच सकें। - कामरेड शशि कुलश्रेष्ठ, (माओवादी चिंतक)