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Shamli News: पोस्टकार्ड का चलन घटा, यादों में रह गया चिट्ठियों का दौर
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पोस्टकार्ड खबर से संबंधित फोटो- ग्रामीण दयानंद गोयल।
अमित गोयल
ऊन। कभी गांव की गलियों में खाकी वर्दी वाले डाकिये की साइकिल की घंटी सुनते ही पूरे मोहल्ले में हलचल मच जाती थी। बच्चे दौड़कर कहते थे-‘डाकिया आया।’ किसी चिट्ठी में बेटे की नौकरी की खबर होती थी तो किसी में बेटी की शादी का न्योता। किसी फौजी भाई की सलामती का संदेश होता था तो किसी के घर मनीऑर्डर पहुंचने की खुशी। करीब डेढ़ सदी तक अपनों के सुख-दुख का साथी रहा पोस्टकार्ड अब धीरे-धीरे चलन से बाहर होता जा रहा है।
जुलाई 1879 में हुई थी शुरुआत
डाक विभाग के इतिहास के अनुसार देश में पोस्टकार्ड की शुरुआत जुलाई 1879 में ब्रिटिश शासनकाल में हुई थी। उस समय इसकी कीमत एक पैसे से भी कम थी। अत्र कुशलं तत्रास्तु से शुरू होने वाली चिट्ठियों में थोड़े शब्दों में अपनों का पूरा हाल समा जाता था। एक ही चिट्ठी को परिवार के कई लोग मिलकर पढ़ते थे और उसे वर्षों तक संभालकर रखते थे।
मोबाइल ने बदल दिया चिट्ठियों का संसार
डाक विभाग में 30 साल से सेवा दे रहे पोस्टमैन साजिद ने बताया कि पहले दिनभर में 200 से ज्यादा चिट्ठियां बांटते थे। थैला भर जाता था और कंधे दुखने लगते थे। अब पूरे दिन में 10-15 चिट्ठियां निकलना भी मुश्किल है।
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उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 के बाद मोबाइल और 2010 के बाद व्हाट्सएप, ई-मेल और कुरियर सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल से पोस्टकार्ड का चलन तेजी से घट गया। शहर में लगे लाल रंग के लेटर बॉक्स भी अब पोस्टकार्ड के इंतजार में सूने पड़े रहते हैं।
- 10 साल में 80 फीसदी से ज्यादा घटी बिक्री
डाक विभाग के अधिकारी मनोज ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में पोस्टकार्ड की बिक्री में 80 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। एक समय दीपावली, होली और रक्षाबंधन पर बधाई संदेश वाले पोस्टकार्ड की अलग से बिक्री होती थी। अब यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है।
बुजुर्गों की यादों में जिंदा है चिट्ठियों का दौर
90 वर्षीय दयाराम बताते हैं कि पहले डाकिया चिट्ठी लेकर आता था तो उसके हर अक्षर में अपनों का दुख-सुख और प्यार महसूस होता था। चिट्ठी पढ़ते हुए कई बार आंखों से आंसू छलक जाते थे। 82 वर्षीय प्रकाश पाल बताते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोग डाकिये से ही चिट्ठी पढ़वाते थे। सभी लोग एक जगह बैठकर चिट्ठी में लिखी हर बात दिल से सुनते थे। अब वह दौर नहीं रहा।
इन्होंने कहा
मुख्य डाक अधिकारी मनोज कुमार ने बताया कि आज भी स्पीड पोस्ट, रजिस्ट्री और पार्सल के मामले में डाक विभाग सस्ता और विश्वसनीय माध्यम है। डाकघरों को बैंकिंग और बीमा सेवाओं से भी जोड़ा गया है। लेकिन कभी अपनों का प्यार और खुशियां लेकर आने वाला पोस्टकार्ड अब धीरे-धीरे बीती याद बनता जा रहा है।
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ऊन। कभी गांव की गलियों में खाकी वर्दी वाले डाकिये की साइकिल की घंटी सुनते ही पूरे मोहल्ले में हलचल मच जाती थी। बच्चे दौड़कर कहते थे-‘डाकिया आया।’ किसी चिट्ठी में बेटे की नौकरी की खबर होती थी तो किसी में बेटी की शादी का न्योता। किसी फौजी भाई की सलामती का संदेश होता था तो किसी के घर मनीऑर्डर पहुंचने की खुशी। करीब डेढ़ सदी तक अपनों के सुख-दुख का साथी रहा पोस्टकार्ड अब धीरे-धीरे चलन से बाहर होता जा रहा है।
जुलाई 1879 में हुई थी शुरुआत
डाक विभाग के इतिहास के अनुसार देश में पोस्टकार्ड की शुरुआत जुलाई 1879 में ब्रिटिश शासनकाल में हुई थी। उस समय इसकी कीमत एक पैसे से भी कम थी। अत्र कुशलं तत्रास्तु से शुरू होने वाली चिट्ठियों में थोड़े शब्दों में अपनों का पूरा हाल समा जाता था। एक ही चिट्ठी को परिवार के कई लोग मिलकर पढ़ते थे और उसे वर्षों तक संभालकर रखते थे।
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मोबाइल ने बदल दिया चिट्ठियों का संसार
डाक विभाग में 30 साल से सेवा दे रहे पोस्टमैन साजिद ने बताया कि पहले दिनभर में 200 से ज्यादा चिट्ठियां बांटते थे। थैला भर जाता था और कंधे दुखने लगते थे। अब पूरे दिन में 10-15 चिट्ठियां निकलना भी मुश्किल है।
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उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 के बाद मोबाइल और 2010 के बाद व्हाट्सएप, ई-मेल और कुरियर सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल से पोस्टकार्ड का चलन तेजी से घट गया। शहर में लगे लाल रंग के लेटर बॉक्स भी अब पोस्टकार्ड के इंतजार में सूने पड़े रहते हैं।
- 10 साल में 80 फीसदी से ज्यादा घटी बिक्री
डाक विभाग के अधिकारी मनोज ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में पोस्टकार्ड की बिक्री में 80 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। एक समय दीपावली, होली और रक्षाबंधन पर बधाई संदेश वाले पोस्टकार्ड की अलग से बिक्री होती थी। अब यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है।
बुजुर्गों की यादों में जिंदा है चिट्ठियों का दौर
90 वर्षीय दयाराम बताते हैं कि पहले डाकिया चिट्ठी लेकर आता था तो उसके हर अक्षर में अपनों का दुख-सुख और प्यार महसूस होता था। चिट्ठी पढ़ते हुए कई बार आंखों से आंसू छलक जाते थे। 82 वर्षीय प्रकाश पाल बताते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोग डाकिये से ही चिट्ठी पढ़वाते थे। सभी लोग एक जगह बैठकर चिट्ठी में लिखी हर बात दिल से सुनते थे। अब वह दौर नहीं रहा।
इन्होंने कहा
मुख्य डाक अधिकारी मनोज कुमार ने बताया कि आज भी स्पीड पोस्ट, रजिस्ट्री और पार्सल के मामले में डाक विभाग सस्ता और विश्वसनीय माध्यम है। डाकघरों को बैंकिंग और बीमा सेवाओं से भी जोड़ा गया है। लेकिन कभी अपनों का प्यार और खुशियां लेकर आने वाला पोस्टकार्ड अब धीरे-धीरे बीती याद बनता जा रहा है।

पोस्टकार्ड खबर से संबंधित फोटो- ग्रामीण दयानंद गोयल।

पोस्टकार्ड खबर से संबंधित फोटो- ग्रामीण दयानंद गोयल।