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लॉकडाउन में कमाई गई रकम हो गई खत्म
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शामली के रोडवेज बस स्टेंड पर घर जाने की उम्मीद में बच्चे को लेकर बैठी महिला।
- फोटो : SHAMLI
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लॉकडाउन में कमाई गई रकम हो गई खत्म
रोहित अग्रवाल
शामली। परिवार कुशीनगर में रहता है। मां और दो छोटे भाई हैं। मां बीमार रहती है। घर के खर्चे के अलावा मां की दवाई और भाइयों की पढ़ाई का खर्चा भी वहीं भेजता है। मां के शहर में इलाज के लिए रुपये की जरूरत थी। 16 घंटे काम करके 14 हजार रुपये जोड़े थे, सोचा था कुछ दिन बाद 20 हजार होने पर मां को भेजूंगा, पर लॉकडाउन में काम बंद हो गया। आर्थिक तंगी के कारण हालात इतने बिगड़ गए कि मां के इलाज को जोड़ी गई रकम भी खत्म हो गई। अब घर जाने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचा। अब तो गांव जाकर ही कुछ रोजगार देखेंगे।
शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बस के इंतजार में बैठे कुशीनगर के कविंद चतुर्वेदी ने बताया कि वह पेंटर है। वह शामली में एक ठेकेदार के मार्फत रंगाई-पुताई का काम करता है। 23 मार्च से काम बंद हो गया। मां के इलाज को कुछ जोड़ा उसमें खाने पीने का सामान, 1100 रुपये मकान का किराया जाता रहा। अब जेब खाली हो गई, तो गांव जाने के लिए निकल गए।
देवरिया जिले के गांव परसिया भवती निवासी शत्रुघ्न पांडेय भी शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बस के इंतजार में था। बताया कि वो पेंटर है। पिता की मौत हो चुकी है। घर में मां और छोटे भाई हैं। यहां पर महीने में 12000 तक कमा लेता है। हर महीने पांच हजार रुपये गांव में मां को भेजता है। घर भेजने के लिए 10 हजार रुपये जोड़े थे, लेकिन लॉकडाउन में काम बंद हो गया और जुड़ी रकम भी खत्म हो गई।
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छिन गई 10 परिवारों की रोजी-रोटी
झारखंड के जिला गदोहा निवासी हरी ने बताया कि उनके गांव के 10 लोग श्रमिक हैं। हरियाणा के भिवानी में सड़क बना रहे थे। कुछ दिन तो ठेकेदार ने मदद की, लेकिन अब उनसे भी असमर्थता जता दी है। उसके साथ गांव के ही प्रमोद, विकास आदि के परिवार के सदस्य लौट रहे थे। बताया कि गांव में हमारे बीवी बच्चे परेशान हैं और वे यहां बीच रास्ते में फंसे हैं। शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बस के इंतजार में ये बैठे थे।
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रोहित अग्रवाल
शामली। परिवार कुशीनगर में रहता है। मां और दो छोटे भाई हैं। मां बीमार रहती है। घर के खर्चे के अलावा मां की दवाई और भाइयों की पढ़ाई का खर्चा भी वहीं भेजता है। मां के शहर में इलाज के लिए रुपये की जरूरत थी। 16 घंटे काम करके 14 हजार रुपये जोड़े थे, सोचा था कुछ दिन बाद 20 हजार होने पर मां को भेजूंगा, पर लॉकडाउन में काम बंद हो गया। आर्थिक तंगी के कारण हालात इतने बिगड़ गए कि मां के इलाज को जोड़ी गई रकम भी खत्म हो गई। अब घर जाने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचा। अब तो गांव जाकर ही कुछ रोजगार देखेंगे।
शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बस के इंतजार में बैठे कुशीनगर के कविंद चतुर्वेदी ने बताया कि वह पेंटर है। वह शामली में एक ठेकेदार के मार्फत रंगाई-पुताई का काम करता है। 23 मार्च से काम बंद हो गया। मां के इलाज को कुछ जोड़ा उसमें खाने पीने का सामान, 1100 रुपये मकान का किराया जाता रहा। अब जेब खाली हो गई, तो गांव जाने के लिए निकल गए।
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देवरिया जिले के गांव परसिया भवती निवासी शत्रुघ्न पांडेय भी शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बस के इंतजार में था। बताया कि वो पेंटर है। पिता की मौत हो चुकी है। घर में मां और छोटे भाई हैं। यहां पर महीने में 12000 तक कमा लेता है। हर महीने पांच हजार रुपये गांव में मां को भेजता है। घर भेजने के लिए 10 हजार रुपये जोड़े थे, लेकिन लॉकडाउन में काम बंद हो गया और जुड़ी रकम भी खत्म हो गई।
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छिन गई 10 परिवारों की रोजी-रोटी
झारखंड के जिला गदोहा निवासी हरी ने बताया कि उनके गांव के 10 लोग श्रमिक हैं। हरियाणा के भिवानी में सड़क बना रहे थे। कुछ दिन तो ठेकेदार ने मदद की, लेकिन अब उनसे भी असमर्थता जता दी है। उसके साथ गांव के ही प्रमोद, विकास आदि के परिवार के सदस्य लौट रहे थे। बताया कि गांव में हमारे बीवी बच्चे परेशान हैं और वे यहां बीच रास्ते में फंसे हैं। शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बस के इंतजार में ये बैठे थे।

शामली रोडवेज स्टेंड पर बस की इंतजार में बैठा कामगार।- फोटो : SHAMLI

शामली बस स्टेंड पर बस की इंतजार में बैठे श्रमिक।- फोटो : SHAMLI

शामली रोडवेज बस स्टेंड पर बस की ओड लेकर छाए में बैठे श्रमिक।- फोटो : SHAMLI