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तिनका-तिनका जोड़ने फिर निकले आग से तबाह हुए ग्रामीण
ब्यूरो/ खुटार।
Updated Wed, 23 Mar 2016 11:40 PM IST
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आग
- फोटो : अमर उजाला
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अभी तक नहीं हट सकी है घरों की राख, सफाई में जुटे लोग
अग्निकांड में तबाह हुए लुकटहा के ग्रामीण तीसरे दिन सिर की छत सहेजने के लिए फिर तिनकों का जुगाड़ करने निकले। महिलाएं और बच्चे घर साफ करतीं दिखे और घर के पुरुष छप्पर के लिए घासफूस पाती लकड़ी का इंतजाम करने निकले।
बतातें चलें कि 21 मार्च को दोपहर बाद गांव लुकटहा में आग लग जाने से लगभग 113 घर जलकर खाक हो गए थे। घरों में रखी नगदी, जेवर, अनाज, कपड़े सहित कोई भी सामान बचाया नहीं जा सका। लोग आग की भयावहता को देखते हुए पहने कपड़ों में ही जान बचाकर भाग निकले थे। आग में 10 भैंसे, 100 से अधिक बकरी, पांच सौ मुर्गे-मुर्गी आदि जलकर मर गए थे। इसी दौरान गांव के किशनपाल की पांच वर्षीय पुत्री भी झुलस गई थी। उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी।
जीवन भर की कमाई आग की भेंट चढ़ जाने के बाद ग्रामीणों की मायूसी बुधवार को और बढ़ी जब आसपास के गांवों होली खेली गई और बच्चों ने रंग पुते चेहरे देखकर होली खेलने की जिद की। आग की तबाही को देख चुके बच्चे जल्दी समझ भी गए और घरों की साफ सफाई में जुट गए। बड़ों ने आसपास के इलाकों से घास फूस इकट्ठा करने का काम शुरू कर दिया ताकि घर पर छप्पर तो छा सकें। उनकी मदद के लिए पुवायां, खुटार और बंडा से भी लोग राहत सामग्री और अन्य मदद लेकर पहुंचे।
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बर्तन ही नहीं तो कैसे पके भोजन
गांव के बालकिशन, हप्पू, काशीराम, चत्रपाल, राजू, संजीव कुमार, रामसेवक, जयपाल, सत्यपाल, सोनू, धर्मपाल, कमलेश कुमार, बहादुर, रंजीत, गुजरिया, रोशनी, चांदनी, छाया, काजल आदि ने बताया कि मंगलवार को प्रशासन की ओर से राशन आदि दिया गया था। सोमवार और मंगलवार को समाजसेवियों की ओर से पका हुआ भोजन भी गांव भेजा गया था लेकिन बुधवार को कोई समाजसेवी गांव नहीं पहुंचा और किसी प्रकार की मदद भी नहीं मिली। बर्तन नहीं होने के कारण घरों में खाना नहीं बन सका, इससे बच्चे भूख से बिलबिलाते रहे। लोगों ने बच्चों को शर्बत आदि पिलाकर शांत करने का प्रयास किया। देर शाम कुछ लोगों ने बर्तन आदि की व्यवस्था कर भोजन बनाया, तब कहीं जाकर बच्चों ने चैन की सांस ली। उधर, मातृ शिशु कल्याण महिला कर्मचारी संघ की जिलाध्यक्ष रजविंदर कौर ने कहा कि बृहस्पतिवार शाम को उनकी ओर से अग्निकांड पीड़ितों के लिए भोजन की व्यवस्था और अन्य संभव मदद की जाएगी।
अग्निकांड में तबाह हुए लुकटहा के ग्रामीण तीसरे दिन सिर की छत सहेजने के लिए फिर तिनकों का जुगाड़ करने निकले। महिलाएं और बच्चे घर साफ करतीं दिखे और घर के पुरुष छप्पर के लिए घासफूस पाती लकड़ी का इंतजाम करने निकले।
बतातें चलें कि 21 मार्च को दोपहर बाद गांव लुकटहा में आग लग जाने से लगभग 113 घर जलकर खाक हो गए थे। घरों में रखी नगदी, जेवर, अनाज, कपड़े सहित कोई भी सामान बचाया नहीं जा सका। लोग आग की भयावहता को देखते हुए पहने कपड़ों में ही जान बचाकर भाग निकले थे। आग में 10 भैंसे, 100 से अधिक बकरी, पांच सौ मुर्गे-मुर्गी आदि जलकर मर गए थे। इसी दौरान गांव के किशनपाल की पांच वर्षीय पुत्री भी झुलस गई थी। उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी।
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जीवन भर की कमाई आग की भेंट चढ़ जाने के बाद ग्रामीणों की मायूसी बुधवार को और बढ़ी जब आसपास के गांवों होली खेली गई और बच्चों ने रंग पुते चेहरे देखकर होली खेलने की जिद की। आग की तबाही को देख चुके बच्चे जल्दी समझ भी गए और घरों की साफ सफाई में जुट गए। बड़ों ने आसपास के इलाकों से घास फूस इकट्ठा करने का काम शुरू कर दिया ताकि घर पर छप्पर तो छा सकें। उनकी मदद के लिए पुवायां, खुटार और बंडा से भी लोग राहत सामग्री और अन्य मदद लेकर पहुंचे।
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बर्तन ही नहीं तो कैसे पके भोजन
गांव के बालकिशन, हप्पू, काशीराम, चत्रपाल, राजू, संजीव कुमार, रामसेवक, जयपाल, सत्यपाल, सोनू, धर्मपाल, कमलेश कुमार, बहादुर, रंजीत, गुजरिया, रोशनी, चांदनी, छाया, काजल आदि ने बताया कि मंगलवार को प्रशासन की ओर से राशन आदि दिया गया था। सोमवार और मंगलवार को समाजसेवियों की ओर से पका हुआ भोजन भी गांव भेजा गया था लेकिन बुधवार को कोई समाजसेवी गांव नहीं पहुंचा और किसी प्रकार की मदद भी नहीं मिली। बर्तन नहीं होने के कारण घरों में खाना नहीं बन सका, इससे बच्चे भूख से बिलबिलाते रहे। लोगों ने बच्चों को शर्बत आदि पिलाकर शांत करने का प्रयास किया। देर शाम कुछ लोगों ने बर्तन आदि की व्यवस्था कर भोजन बनाया, तब कहीं जाकर बच्चों ने चैन की सांस ली। उधर, मातृ शिशु कल्याण महिला कर्मचारी संघ की जिलाध्यक्ष रजविंदर कौर ने कहा कि बृहस्पतिवार शाम को उनकी ओर से अग्निकांड पीड़ितों के लिए भोजन की व्यवस्था और अन्य संभव मदद की जाएगी।