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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   The Jammu & Kashmir and Ladakh High Court upheld the sentence

Jammu: गुरु का चोला, भरोसे का फायदा... 84 की उम्र में नाबालिग से बार-बार दुष्कर्म, 10 साल कठोर कारावास बरकरार

Sat, 22 Aug 2026 12:49 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 22 Aug 2026 12:49 AM IST
सार

पीड़िता के गर्भवती होने के बाद मामला सामने आया था और उसने मृत बच्ची को जन्म दिया था। डीएनए जांच में ब्रह्मानंद को मृत बच्ची का जैविक पिता पाया गया।

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The Jammu & Kashmir and Ladakh High Court upheld the sentence
सरकारी पक्ष ने सजा बढ़ाने की अपील नहीं की थी, इसलिए दस साल की सजा बरकरार रखी गई। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने नाबालिग से बार-बार दुष्कर्म के मामले में 84 वर्षीय ब्रह्मानंद सरस्वती की अपील खारिज कर दस साल की कठोर कैद की सजा बरकरार रखी है। पीड़िता के गर्भवती होने के बाद मामला सामने आया था और उसने मृत बच्ची को जन्म दिया था। डीएनए जांच में ब्रह्मानंद को मृत बच्ची का जैविक पिता पाया गया।

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हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बयान के साथ चिकित्सकीय और डीएनए साक्ष्य भी हैं और आरोपी की अधिक उम्र तथा एफआईआर में करीब आठ महीने की देरी उसे राहत देने का आधार नहीं हैं। फैसले के अनुसार आरोपी रियासी के एक गांव में रहता था और सभी उसे गुरु मानते थे। बच्ची उसे खाना-दूध आदि देने उसके पास जाती थी। एक दिन कमरे में अकेली होने पर आरोपी ने उसे चाय दी। इससे वह बेहोश हो गई और आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
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बाद में धमकी देकर उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया गया। गर्भवती होने पर पीड़िता ने मां को पूरी बात बताई। अक्तूबर 2018 में उसने एक अस्पताल में मृत बच्ची को जन्म दिया। डीएनए जांच में आरोपी को मृत बच्ची का जैविक पिता पाया गया। प्रधान सत्र न्यायाधीश, रियासी ने 29 मार्च 2024 को उसे दोषी ठहराया और दस साल की कठोर कैद की सजा सुनाई।
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आठ महीने की देरी भी नहीं बनी राहत का आधार
आरोपी ने एफआईआर में करीब आठ महीने की देरी, पीड़िता के बयान में विरोधाभास और डीएनए साक्ष्य पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग पीड़िता, आरोपी का गांव में प्रभाव और धमकी जैसी परिस्थितियों में देरी अभियोजन के लिए घातक नहीं है। पीड़िता के बयान के साथ चिकित्सकीय और डीएनए साक्ष्य भी हैं। सरकारी पक्ष ने सजा बढ़ाने की अपील नहीं की थी, इसलिए दस साल की सजा बरकरार रखी गई।

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