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Shahjahanpur News: शाहजहांपुर के रणबांकुरों ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को दिया था करारा जवाब

Sat, 26 Jul 2025 12:39 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 26 Jul 2025 12:39 AM IST
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The warriors of Shahjahanpur gave a befitting reply to Pakistan in the Kargil war
कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।
शाहजहांपुर। कठिन सामरिक परिस्थितियों में कारगिल पर दुश्मन देश पाकिस्तान को धूल चटाने वाले जांबाज आज भी भारतीय सेना के शौर्य प्रदर्शन को गर्व के साथ याद करते हैं। कारगिल युद्ध में भाग लेने वाले रणबांकुरे सिपाहियों का कहना है कि भले ही हालात विपरीत थे लेकिन हौसला और देशभक्ति कभी कमजोर नहीं पड़ी। यही वजह रही कि पाकिस्तान को युद्ध में करारी हार झेलनी पड़ी। दुश्मन सैनिक पीठ दिखाकर भाग गए।
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हेलिकॉप्टर से राशन पहुंचाते थे कैप्टन रनवीर
कारगिल युद्ध के दौरान एयर डिफेंस में तैनात था। इस दौरान सैनिकों को हेलीकाॅप्टर के माध्यम से राशन पहुंचाना होता था। अगर कोई सैनिक घायल होता था तो उसको तुरंत एयर एंबुलेंस के माध्यम से बेस मेडिकल कैंप में पहुंचाते थे। दुश्मनों की गोलाबारी से सतर्क रहना पड़ता था। किसी भी समय सायरन बज जाता था। तुरंत टीम के साथ रवाना होना पड़ता था। कारगिल युद्ध में जीत के बाद सीमा पर सैनिकों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दुश्मन पीठ दिखाकर भाग गया था।
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- कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा, चिनौर, शाहजहांपुर
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तोप से गिरा दिया था दुश्मन का विमान
कारगिल युद्ध के दौरान रेजीमेंट 46 एडी वायु रक्षा तोपखाने में पलावल सेक्टर में तैनाती थी। युद्ध के दौरान पाकिस्तान के रिमोट विमान को तोप के माध्यम से मार गिराया था। गांव को खाली करा लिया गया था। दुश्मनों ने रात में गोलाबारी की। हमारी रेजीमेंट के साथियों ने दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया। इसमें हमारे अधिकारियों का काफी सहयोग रहा। उन्होंने सभी साथियों के साथ युद्ध के मोर्चें पर दुश्मनों का सामना किया। दुश्मन को हराने तक चैन की सांस नहीं ली।
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- सूबेदार श्यामबाबू यादव, कलान
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चुन-चुनकर लिया था बदला

कारगिल युद्ध के दौरान जाट बटालियन में तैनात था। हमारी ड्यूटी तुरतुक सेक्टर में लगी थी। यह पाकिस्तान की सीमा के नजदीक था। कई बार दुश्मनों से सामना हुआ। युद्ध में हमारी रेजीमेंट ने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे। सभी साथियों को पाकिस्तान की कायराना हरकत पर काफी आक्रोश था। इसका चुन-चुन कर बदला लिया गया। दुश्मनों को खदेड़ दिया। सैनिकों की वीरता की वजह से कारगिल में विजय प्राप्त हुई। कुछ साथी शहीद भी हो गए थे।
- कैप्टन सत्यवीर सिंह भूरिया, आर्य नगर, चिनौर

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दुश्मन को हर मोर्चे पर दी मात
कारगिल से पहले ही 1998 से तुरतुक सेक्टर में हमारी रेजीमेंट की तैनाती थी। इस सेक्टर में दुश्मन अक्सर गोलीबारी और बमबारी करते रहते थे। सभी साथियों के साथ मिलकर दुश्मन को हर मोर्चे पर धूल चटाई। किसी भी सिपाही ने हिम्मत नहीं हारी। सभी डटे रहे। जब भी दुश्मन ने सीमा में घुसने की कोशिश की तो उनको खदेड़ दिया। कारगिल युद्ध की जीत का जश्न मनाया लेकिन शहीद सैनिकों का दुख भी बहुत था। 2000 तक उसी सेक्टर में तैनाती रही।

- हवलदार सुरेशपाल सिंह, चिनौर
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रमेशचंद्र ने दिया था सर्वोच्च बलिदान
मदनापुर क्षेत्र के गांव काबिलपुर निवासी सैनिक रमेश चंद्र ने कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान दिया था। गांव के प्रधान रहे चतुरी लाल के तीन बेटों में सबसे छोटे रमेश चंद्र का जन्म 20 अक्तूबर 1971 को हुआ था। वह 1991 में सेना की जाट रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। 1999 में कारगिल युद्ध में 12 जून को सुबह के समय दुश्मन की एक गोली रमेश के सीने को भेदती हुई निकल गई। महज 28 वर्ष की आयु में रमेश देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। उनकी स्मृति में प्रशासन ने एक पार्क शाहजहांपुर के आवास विकास कॉलोनी में बनवाया है। रमेश की शहादत के कुछ समय बाद उनकी पत्नी सुनीता अपने दो बेटों और तीन बेटियों को लेकर बरेली जाकर रहने लगीं। उनके एक बेटे ने तो पिता का चेहरा भी नहीं देखा था। बाकी परिवार गांव में रहता है। पत्नी सुनीता कहती हैं कि उन्हें अपने पति के बलिदान पर गर्व है। आज भी उनकी स्मृतियों को पूरा परिवार सहेजे हुए है।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

कैप्टन रनवीर सिंह कुशवाहा।

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