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Shahjahanpur News: 200 साल पुरानी परंपराओं की वाहक है जलालाबाद की रामलीला
Mon, 30 Sep 2024 01:19 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
Updated Mon, 30 Sep 2024 01:19 AM IST
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अशोक द्विवेदी
जलालाबाद। नगर की रामलीला करीब दो सौ साल पुरानी परंपराओं की वाहक बनी हुई है। अंग्रेजी शासन काल में ब्राह्मण परिवारों ने यहां रामलीला शुरू कराई थी।
हालांकि, समय के साथ तालमेल बैठाने के लिए रामलीला में कुछ बदलाव भी हुए, लेकिन पात्रों के चयन की बात हो अथवा लीला मंचन की, कई मायनों में पुरानी परंपराएं अभी तक निभाई जा रही हैं।
बुजुर्गों के अनुसार यहां रामलीला की शुरुआत सन 1836 के आसपास हुई, तब पात्रों का चयन और उन्हें विभिन्न स्वरूपों में तैयार करने का काम परशुराम मंदिर में होता था। सभी पात्र मंदिर से करीब 1.5 किमी दूर रामलीला मैदान में जाकर विभिन्न लीलाओं का मंचन करते थे। वहां से देर शाम फिर मंदिर पहुंचकर वहां से अपने घरों को जाते थे। उस दौर में वाहन नहीं होने पर पात्रों को आस्थावान लोग अपने कंधों पर बैठाकर घंटा-घड़ियाल बजाते हुए मेला मैदान तक लाते और ले जाते थे।
तब से आज तक रामलीला के दौरान सभी पात्र ब्राह्मण परिवार से ही चुने जाते हैं। बदलाव केवल पात्रों के मेला मैदान तक आने-जाने की व्यवस्था में हुआ है। कुछ साल पहले तक सभी पात्र मंदिर से हाथियों पर बैठकर मेला मैदान तक आते-जाते थे, लेकिन अब इस काम में बग्गियां प्रयोग की जाती हैं। खास यह भी है कि यहां लीलाओं का मंचन कभी बाहर से आने वाली मंडली के कलाकारों ने नहीं किया। पात्र चयन का पुराना तरीका भी कायम है। शंकर जी, नारद जी, रावण, हनुमान सहित कुछ अन्य किरदार लंबे समय के अनुभवी लोग ही निभा रहे हैं। भगवान श्रीराम, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण व सीता के पात्र लगभग हर साल नए चयनित होते हैं। इनकी उम्र 12 से 16 साल के बीच ही होती है। इसके पीछे की मंशा यह है कि भगवान राम किशोरावस्था में ही वनगमन कर गए थे। सीता और माता पार्वती अन्य स्त्री किरदार निभाने वाले पात्र महिलाओं के बजाय पुरुष ही निभाते हैं। संवाद
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लीलाधर के निर्देशन में होती हैं लीलाएं
हर दिन के हिसाब से लीला का मंचन पहले से ही तय होता है। पात्रों से अभिनय कराने वाले को लीलाधर कहा जाता है। लीलाधर रामायण के जानकार और अनुभवी होते हैं। चयनित लीलाधर ही पात्रों का चयन कर उन्हें उनकी भूमिका के अनुसार रिहर्सल व अन्य तैयारी कराते हैं। मंचन भी लीलाधर के निर्देशन में होता है।
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मंच के बजाय मैदान पर होती है लीला
-मेले की खास बात यह भी है कि सभी पात्र रामलीला का प्रदर्शन किसी मंच के बजाय मैदान पर करते हैं। मैदान के आधे हिस्से पर लीला मंचन होता है और शेष जगह खेल-तमाशों, दुकाने, रासलीला का स्टेज व अन्य कार्यक्रमों के लिए छोड़ी जाती है। बग्गियों पर सवार श्रीराम-रावण युद्ध मुख्य आकर्षण होता है। लीला स्थल के चारों ओर दर्शक मौजूद रहते हैं।
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श्रद्धा से लगाते हैं स्वरूपों को भोग
रामलीला के दौरान नगर के कई लोग विभिन्न पात्रों को सजे-धजे स्वरूपों में घर बुलाकर उन्हें श्रद्धा के साथ भोग लगाते हैं। बाद में परिवार सहित उनकी आरती उतारकर उन्हें विदा करते हैं। भोग में विभिन्न तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। घर के बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इस परंपरा का अब उनके बच्चे निर्वहन कर रहे हैं। एक दिन में कई घरों में स्वरूपों का भोग लगता है। कई श्रद्धालु रामलीला मैदान पर भी भोग लगाते हैं।
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जलालाबाद। नगर की रामलीला करीब दो सौ साल पुरानी परंपराओं की वाहक बनी हुई है। अंग्रेजी शासन काल में ब्राह्मण परिवारों ने यहां रामलीला शुरू कराई थी।
हालांकि, समय के साथ तालमेल बैठाने के लिए रामलीला में कुछ बदलाव भी हुए, लेकिन पात्रों के चयन की बात हो अथवा लीला मंचन की, कई मायनों में पुरानी परंपराएं अभी तक निभाई जा रही हैं।
बुजुर्गों के अनुसार यहां रामलीला की शुरुआत सन 1836 के आसपास हुई, तब पात्रों का चयन और उन्हें विभिन्न स्वरूपों में तैयार करने का काम परशुराम मंदिर में होता था। सभी पात्र मंदिर से करीब 1.5 किमी दूर रामलीला मैदान में जाकर विभिन्न लीलाओं का मंचन करते थे। वहां से देर शाम फिर मंदिर पहुंचकर वहां से अपने घरों को जाते थे। उस दौर में वाहन नहीं होने पर पात्रों को आस्थावान लोग अपने कंधों पर बैठाकर घंटा-घड़ियाल बजाते हुए मेला मैदान तक लाते और ले जाते थे।
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तब से आज तक रामलीला के दौरान सभी पात्र ब्राह्मण परिवार से ही चुने जाते हैं। बदलाव केवल पात्रों के मेला मैदान तक आने-जाने की व्यवस्था में हुआ है। कुछ साल पहले तक सभी पात्र मंदिर से हाथियों पर बैठकर मेला मैदान तक आते-जाते थे, लेकिन अब इस काम में बग्गियां प्रयोग की जाती हैं। खास यह भी है कि यहां लीलाओं का मंचन कभी बाहर से आने वाली मंडली के कलाकारों ने नहीं किया। पात्र चयन का पुराना तरीका भी कायम है। शंकर जी, नारद जी, रावण, हनुमान सहित कुछ अन्य किरदार लंबे समय के अनुभवी लोग ही निभा रहे हैं। भगवान श्रीराम, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण व सीता के पात्र लगभग हर साल नए चयनित होते हैं। इनकी उम्र 12 से 16 साल के बीच ही होती है। इसके पीछे की मंशा यह है कि भगवान राम किशोरावस्था में ही वनगमन कर गए थे। सीता और माता पार्वती अन्य स्त्री किरदार निभाने वाले पात्र महिलाओं के बजाय पुरुष ही निभाते हैं। संवाद
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लीलाधर के निर्देशन में होती हैं लीलाएं
हर दिन के हिसाब से लीला का मंचन पहले से ही तय होता है। पात्रों से अभिनय कराने वाले को लीलाधर कहा जाता है। लीलाधर रामायण के जानकार और अनुभवी होते हैं। चयनित लीलाधर ही पात्रों का चयन कर उन्हें उनकी भूमिका के अनुसार रिहर्सल व अन्य तैयारी कराते हैं। मंचन भी लीलाधर के निर्देशन में होता है।
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मंच के बजाय मैदान पर होती है लीला
-मेले की खास बात यह भी है कि सभी पात्र रामलीला का प्रदर्शन किसी मंच के बजाय मैदान पर करते हैं। मैदान के आधे हिस्से पर लीला मंचन होता है और शेष जगह खेल-तमाशों, दुकाने, रासलीला का स्टेज व अन्य कार्यक्रमों के लिए छोड़ी जाती है। बग्गियों पर सवार श्रीराम-रावण युद्ध मुख्य आकर्षण होता है। लीला स्थल के चारों ओर दर्शक मौजूद रहते हैं।
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श्रद्धा से लगाते हैं स्वरूपों को भोग
रामलीला के दौरान नगर के कई लोग विभिन्न पात्रों को सजे-धजे स्वरूपों में घर बुलाकर उन्हें श्रद्धा के साथ भोग लगाते हैं। बाद में परिवार सहित उनकी आरती उतारकर उन्हें विदा करते हैं। भोग में विभिन्न तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। घर के बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इस परंपरा का अब उनके बच्चे निर्वहन कर रहे हैं। एक दिन में कई घरों में स्वरूपों का भोग लगता है। कई श्रद्धालु रामलीला मैदान पर भी भोग लगाते हैं।