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सर्दी कम हुई, लेकिन बढ़ने लगी लगी चुनावी तपिश
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पुवायां (शाहजहांपुर)। मिनी पंजाब के नाम से मशहूर पुवायां विधानसभा क्षेत्र में अब चुनावी तपिश महसूस होने लगी है। दो दिन तक हुई बारिश के बाद सोमवार और मंगलवार को धूप निकलने से सर्दी कर कहर कुछ कम हुआ है। लेकिन चुनावी तपिश बढ़ने लगी है। अब तक चुप बैठकर आंकलन में जुटा वोटर धीरे-धीरे खुलता नजर आ रहा है। उम्मीदवार की शख्सियत, क्षेत्र की तरक्की के साथ गुंडागर्दी कम होने, छुट्टा पशुओं से समस्या जैसे मुद्दे इस चुनाव में कहीं-कहीं भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं।
कुल तीन लाख 86 हजार मतदाताओं वाली इस विधानसभा में अब चुनावी रंग चरम पर है। वोटरों में जाग रहे उत्साह से अब चुनावी समीकरणों पर चर्चाएं होने लगी हैं और उम्मीदवार भी चुनावी चुनौतियों से निपटने को तरकीबे लगाए हुए हैं। धुरंधरों के बीच तैयार हुए मुकाबले के आधार के अनुरूप मतदाताओं को अपने पाले में खींचा जा रहा है। प्रत्याशी तरह-तरह के शगूफों के साथ शब्द बाणों के जरिए प्रतिद्वंदी पर हमलावर हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावी मुद्दों के अनुरूप पार्टी प्रत्याशी को तौलकर टेंपो हाई हो रहे हैं।
इन सबके बावजूद यह कह पाना मुश्किल है कि वोटर किस पार्टी को ज्यादा अहमियत दे रहा है। लहर नाम की चीज स्थानीय मुद्दों में उलझी हुई है। जातीय समीकरण जरूर हावी है, परंतु किसी भी स्तर पर इनको निर्णायक मानना अभी जल्दबाजी लग रही है।
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इन सबके बीच दूसरा पक्ष यह है कि इस बार बड़ी तादाद में मतदाता उम्मीदवार की शख्सियत को तबज्जो दे रहे हैं, तो युवा मतदाताओं का बड़ा तबका क्षेत्र के विकास के मुद्दे पर बात करता दिखायी दे रहा है। प्रमुख राजनैतिक दलों के वोट बैंक माने जाने वाले लोग विभिन्न मुद्दों पर बंटे नजर आ रहे हैं। गली मोहल्लों के अलावा देहात क्षेत्रों में होने वाली चुनावी चर्चाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि इस मर्तबा वोटर ढर्रे पर वोट देने की आदत से बाहर निकल रहा है।
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कुल तीन लाख 86 हजार मतदाताओं वाली इस विधानसभा में अब चुनावी रंग चरम पर है। वोटरों में जाग रहे उत्साह से अब चुनावी समीकरणों पर चर्चाएं होने लगी हैं और उम्मीदवार भी चुनावी चुनौतियों से निपटने को तरकीबे लगाए हुए हैं। धुरंधरों के बीच तैयार हुए मुकाबले के आधार के अनुरूप मतदाताओं को अपने पाले में खींचा जा रहा है। प्रत्याशी तरह-तरह के शगूफों के साथ शब्द बाणों के जरिए प्रतिद्वंदी पर हमलावर हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावी मुद्दों के अनुरूप पार्टी प्रत्याशी को तौलकर टेंपो हाई हो रहे हैं।
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इन सबके बावजूद यह कह पाना मुश्किल है कि वोटर किस पार्टी को ज्यादा अहमियत दे रहा है। लहर नाम की चीज स्थानीय मुद्दों में उलझी हुई है। जातीय समीकरण जरूर हावी है, परंतु किसी भी स्तर पर इनको निर्णायक मानना अभी जल्दबाजी लग रही है।
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इन सबके बीच दूसरा पक्ष यह है कि इस बार बड़ी तादाद में मतदाता उम्मीदवार की शख्सियत को तबज्जो दे रहे हैं, तो युवा मतदाताओं का बड़ा तबका क्षेत्र के विकास के मुद्दे पर बात करता दिखायी दे रहा है। प्रमुख राजनैतिक दलों के वोट बैंक माने जाने वाले लोग विभिन्न मुद्दों पर बंटे नजर आ रहे हैं। गली मोहल्लों के अलावा देहात क्षेत्रों में होने वाली चुनावी चर्चाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि इस मर्तबा वोटर ढर्रे पर वोट देने की आदत से बाहर निकल रहा है।