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आजादी पर हावी अंग्रेजों के कानून

Mon, 12 Aug 2013 05:37 AM IST
Shahjahanpur
Shahjahanpur Updated Mon, 12 Aug 2013 05:37 AM IST
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- ब्रितानी हुकूमत के कानूनों पर अदालतें आज भी निर्भर
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अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। आधी सदी से भी अधिक वक्त बीतने के बाद भी हम गुलामी की आदत नहीं छोड़ सके। इस बीच देश में बहुत कुछ बदल गया, लेकिन हम अंग्रेजों के बनाए तमाम कानूनों से पल्ला झाड़ने में नाकाम साबित हुए। पुलिस और राजस्व महकमों का भी यही हाल है। यही कारण है कि विभिन्न अदालतों में लाखों याचिकाएं कानूनी दांवपेंच की गुत्थी में उलझी पड़ी हैं। लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। खास बात यह है कि सरकारें भी अंग्रेजों के सुर में सुर मिलाकर सिर्फ अपना भला सोचने में मशगूल रहती हैं। आम जनता के बारे में सोचने और समझने की फुरसत किसी को नहीं।
15 अगस्त 1947 को हमने अंग्रेजों को सरहद पार घसीट दिया, लेकिन उनके नासूर जैसे कानून आज भी हमारा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं। उस समय मैकाले ने जो सीआरपीसी और आईपीसी की धाराएं भारतीयों को फंसाने और दंडित करने को अपने हक में गढ़ी थीं, वे आज भी बदस्तूर हमारी पीठ पर चाबुक की मार की तरह अपने निशान छोड़ रही हैं। तमाम आरोपियों को उनका दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ रहा है, लेकिन मजाल है कि कोई सरकार इन अप्रासंगिक धाराओं को खत्म कर आज के माहौल के हिसाब से नए कानून बना दे।
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बदलने चाहिए अंग्रेजों
के कानून: बसंत
इस संबंध में स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ अधिवक्ता बसंतलाल खन्ना का कहना है कि अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत को देखते हुए और भारतीयों को प्रताड़ित करने के लिए कानून बनाए थे, उन कानूनों की आज कोई जरूरत नहीं है, लेकिन फिर भी हम उन्हीं कानूनों को संज्ञान में लेकर मुकदमेबाजी करते रहते हैं। बहुमत वाली सरकारों को चाहिए कि वह संसद में विधेयक लाकर ऐेसे नए कानून बनाएं, जो आज के माहौल में प्रासंगिक हो सकें।
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आमूलचूल परिवर्तन
की जरूरत: द्विवेदी
वरिष्ठ अधिवक्ता महेश चंद्र द्विवेदी का कहना है कि उस समय अंग्रेजों की कलम थी और वही शासक भी थे, इसलिए उन्होंने जैसा चाहा वैसा कानून लागू कर दिया। दफा 25 जैसे आरोपी को भी आज अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन उसे समय पर न्याय नहीं मिल पाता। कोर्ट भी अपने को असहाय पाती है। यही कारण है कि मामले लंबित होते जा रहे हैं। कहा: लॉ में आमूलचूल परिवर्तन की बहुत आवश्यकता है। इस ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए।




बदल जाना चाहिए
था कानून: बरनवाल
स्वामी शुकदेवानंद विधि महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. संजय बरनवाल का मानना है कि अंग्रेजों के काले कानून तो बहुत पहले ही बदल जाने चाहिए थे। खास तौर पर जेल एक्ट और जेल मैनुअल। सीआरपीसी की दफा 129 हो या फिर दूसरी कोई, हर कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। समाज में इसका दुष्प्रभाव साफ देखा जा सकता है। बताया: जेल एक्ट 1861 में बना था, तब की परिस्थितियां अलग थीं, आज बहुत कुछ बदला है। हर एक्ट अलग माहौल के हिसाब से बनाया जाता है।
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