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तिकोला गांव में मां काली देवी मंदिर पर लगा भक्तों का तांता
Updated Sun, 02 Jul 2017 06:27 PM IST
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फोटो-17,जलालाबाद के गांव तिकोला स्थित मां काली का मंदिर
फोटो-18, मंदिर प्रांगण में लगी दुकानों पर खरीददारी करती महिलाएं
जलालाबाद (शाहजहांपुर)। देवी जात के दौरान गांव तिकोला के सुप्रसिद्ध मां काली देवी एवं गांव ढकियाइन के मां रेणुका मंदिर पर सोमवार से चल रहे मेले में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। मंदिरों में दूरदराज स्थानों से आकर भक्त मत्था टेककर मनौती मांगते है।
मेले में लकड़ी से बने और घरेलू सामान की दुकानों के अलावा खाने-पीने का सामान भी मिलता है। बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले आदि भी लगाए गए हैं। मेले में बच्चों के मुंडन संस्कार के अलावा कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। बताते है कि द्वापर युग में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस इलाके में काफ ी समय गुजारा था। उस दौरान यहां घना जंगल था। अर्जुन ने ही यहां मां काली की प्रतिमा स्थापित कर उनकी तपस्या की थी। तब काली मां ने प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। यहां से जाने के दौरान पांडवों ने कच्ची मिट्टी का मंदिर भी बना दिया था। मंदिर तो समय के अनुसार बनता बिगड़ता रहा पर मूर्ति वही है। मां रेणुका के मंदिर का भी अपना विशिष्ट स्थान है।
जुआ भी धार्मिक आस्था से जुड़ गया
अज्ञातवास के दौरान जब पांडवों ने अपना समय व्यतीत करने को चौपड़ खेला था। पंद्रह दिन लगने वाले मेले के दौरान चौपड़ खेलने की परंपरा रही है। इस परंपरा ने धीरे-धीरे जुआ का रूप ले लिया। अब यहां लाखों रुपये का जुआ खेला जाता है। पंद्रह दिनों तक दूर दूर से जुआरी आकर आस्था के नाम पर लाखों रुपये का जुआ खेलते हैं।
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फोटो-18, मंदिर प्रांगण में लगी दुकानों पर खरीददारी करती महिलाएं
जलालाबाद (शाहजहांपुर)। देवी जात के दौरान गांव तिकोला के सुप्रसिद्ध मां काली देवी एवं गांव ढकियाइन के मां रेणुका मंदिर पर सोमवार से चल रहे मेले में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। मंदिरों में दूरदराज स्थानों से आकर भक्त मत्था टेककर मनौती मांगते है।
मेले में लकड़ी से बने और घरेलू सामान की दुकानों के अलावा खाने-पीने का सामान भी मिलता है। बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले आदि भी लगाए गए हैं। मेले में बच्चों के मुंडन संस्कार के अलावा कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। बताते है कि द्वापर युग में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस इलाके में काफ ी समय गुजारा था। उस दौरान यहां घना जंगल था। अर्जुन ने ही यहां मां काली की प्रतिमा स्थापित कर उनकी तपस्या की थी। तब काली मां ने प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। यहां से जाने के दौरान पांडवों ने कच्ची मिट्टी का मंदिर भी बना दिया था। मंदिर तो समय के अनुसार बनता बिगड़ता रहा पर मूर्ति वही है। मां रेणुका के मंदिर का भी अपना विशिष्ट स्थान है।
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जुआ भी धार्मिक आस्था से जुड़ गया
अज्ञातवास के दौरान जब पांडवों ने अपना समय व्यतीत करने को चौपड़ खेला था। पंद्रह दिन लगने वाले मेले के दौरान चौपड़ खेलने की परंपरा रही है। इस परंपरा ने धीरे-धीरे जुआ का रूप ले लिया। अब यहां लाखों रुपये का जुआ खेला जाता है। पंद्रह दिनों तक दूर दूर से जुआरी आकर आस्था के नाम पर लाखों रुपये का जुआ खेलते हैं।
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