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नाटक से पहले गांधी भवन में जमकर हुआ तमाशा
Updated Sun, 29 Jul 2018 12:10 AM IST
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नाटक से पहले गांधी भवन में जमकर हुआ तमाशा
नाटक से पहले गांधी भवन में जमकर हुआ तमाशा
कुछ लोगों के आगे असहाय दिखा प्रशासन और पुलिस
हिंदू संगठन के सदस्यों ने नाटक के नाम औरंगजेब पर की आपत्ति, मंचन में डाली खलल
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। जिले में अब रंगमंच के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा होने लगा है। पूरे देश में जिले को नई पहचान देने वाले थिएटर कर्मियों के लिए इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता। अब कुछ लोगों की बजह से पुलिस और प्रशासन स्वयं को असहाय समझने लगा है। खास बात यह है कि ऐसे मामलों में सिर्फ विरोधियों की ही सुनी जा रही है। इसके लिए लॉ एंड आर्डर का हवाला देने में भी संकोच नहीं किया जा रहा है। यह दूसरा मौका है जब गांधी भवन में नाटक पर ग्रहण लगा है।
बतादें कि शुक्रवार को गांधी भवन में औरंगजेब नामक नाटक के दो शो होने थे। शाम चार बजे पहला शो होने से पहले कुछ लोग अपने को हिंदू संगठन का बताते हुए गांधी भवन पहुंच गए और उन्होंने नाटक के नाम पर आपत्ति जताते हुए मंचन रोकने की हिदायत दी। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचे सिटी मजिस्ट्रेट अतुल कुमार, सीओ सिटी सुमित शुक्ला और थाना प्रभारी सदर बाजार डीसी शर्मा ने इन लोगों को समझाकर नाटक शुरू कराया। इसके बाद नाटक का पहला शो शांतिपूर्वक चला। रात में करीब साढ़े सात बजे दूसरा शो होने के दौरान एक बार फिर थाना सदर बाजार की पुलिस गांधी भवन पहुंच गई और नाटक को जनभावनाओं के विपरीत बताते हुए मंचन रुकवा दिया गया।
इस बीच वहां मौजूद रंगकर्मियों और अन्य दर्शकों ने भी मंचन रोकने के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन सिटी मजिस्ट्रेट तथा पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी। रात करीब सवा नौ बजे तक नाटक का दूसरा शो शुरू ही नहीं हो पाया था। इस संबंध में सिटी मजिस्ट्रेट अतुल कुमार से कई बार बात करने की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो पाई। एक बार संपर्क भी हुआ तो उन्होंने कुछ समय बाद बात करने को कहकर टाल दिया। यहां बता दें कि इससे पहले नाटक गाय को लेकर भी बवाल मचा था, जिसे प्रशासन ने बाद में रुकवा दिया था।
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नाटक रोकना बेहद शर्मनाक
पूर्व कृषि वैज्ञानिक एवं नाट्य प्रेमी डॉ. सुरेश चंद्र मिश्र का कहना है कि प्रशासन से अनुमति मिलने के बाद नाटक को इस तरह रोकना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अगर नाटक का मंचन रोकना ही था तो समय रहते रोक देना चाहिए था। इस तरह प्रशासन चंद हिंदू संगठनों के हाथों बंधक बनकर काम कर रहा है, यह बेहद शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि अगर इतना ही विरोध है तो सबसे पहले शाहजहांपुर का नाम बदलना चाहिए। कल को अगर हिंदू संस्कृति पर आधारित नाटक होता है और उस पर दूसरे पक्ष के लोग एतराज करने लगें तो क्या होगा।
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रंगमंच के लिए यह उचित नहीं
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली से पास आउट नाटक के निर्देशक तारिक खान का कहना है कि उनकी समझ में नहीं आ रहा कि विरोध किस बात का हो रहा है। पहले कुछ लोगों ने नाटक का नाम बदलने को कहा। बाद में दूसरे शो को इसलिए रुकवा दिया कि इसमें जय सिंह नामक किरदार को गद्दार बताया गया। तारिक ने कहा कि नाटक में कुछ मुसलमानों को भी गद्दार लिखा गया है। अब यदि दूसरे पक्ष के लोग इस बात पर विरोध करें तो यह कहां तक सही है। वह बोले कि फिलहाल उन्हें नाटक के सिलसिले में ही मलेशिया निकलना है, यदि संभव हुआ तो नाटक का मंचन जरूर किया जाएगा। नाट्य लेखक के पास कॉपी राइट का अधिकार होता है, इसलिए वह नाम भी नहीं बदल सकते।
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नाटक से पहले गांधी भवन में जमकर हुआ तमाशा
नाटक से पहले गांधी भवन में जमकर हुआ तमाशा
कुछ लोगों के आगे असहाय दिखा प्रशासन और पुलिस
हिंदू संगठन के सदस्यों ने नाटक के नाम औरंगजेब पर की आपत्ति, मंचन में डाली खलल
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। जिले में अब रंगमंच के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा होने लगा है। पूरे देश में जिले को नई पहचान देने वाले थिएटर कर्मियों के लिए इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता। अब कुछ लोगों की बजह से पुलिस और प्रशासन स्वयं को असहाय समझने लगा है। खास बात यह है कि ऐसे मामलों में सिर्फ विरोधियों की ही सुनी जा रही है। इसके लिए लॉ एंड आर्डर का हवाला देने में भी संकोच नहीं किया जा रहा है। यह दूसरा मौका है जब गांधी भवन में नाटक पर ग्रहण लगा है।
बतादें कि शुक्रवार को गांधी भवन में औरंगजेब नामक नाटक के दो शो होने थे। शाम चार बजे पहला शो होने से पहले कुछ लोग अपने को हिंदू संगठन का बताते हुए गांधी भवन पहुंच गए और उन्होंने नाटक के नाम पर आपत्ति जताते हुए मंचन रोकने की हिदायत दी। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचे सिटी मजिस्ट्रेट अतुल कुमार, सीओ सिटी सुमित शुक्ला और थाना प्रभारी सदर बाजार डीसी शर्मा ने इन लोगों को समझाकर नाटक शुरू कराया। इसके बाद नाटक का पहला शो शांतिपूर्वक चला। रात में करीब साढ़े सात बजे दूसरा शो होने के दौरान एक बार फिर थाना सदर बाजार की पुलिस गांधी भवन पहुंच गई और नाटक को जनभावनाओं के विपरीत बताते हुए मंचन रुकवा दिया गया।
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इस बीच वहां मौजूद रंगकर्मियों और अन्य दर्शकों ने भी मंचन रोकने के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन सिटी मजिस्ट्रेट तथा पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी। रात करीब सवा नौ बजे तक नाटक का दूसरा शो शुरू ही नहीं हो पाया था। इस संबंध में सिटी मजिस्ट्रेट अतुल कुमार से कई बार बात करने की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो पाई। एक बार संपर्क भी हुआ तो उन्होंने कुछ समय बाद बात करने को कहकर टाल दिया। यहां बता दें कि इससे पहले नाटक गाय को लेकर भी बवाल मचा था, जिसे प्रशासन ने बाद में रुकवा दिया था।
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नाटक रोकना बेहद शर्मनाक
पूर्व कृषि वैज्ञानिक एवं नाट्य प्रेमी डॉ. सुरेश चंद्र मिश्र का कहना है कि प्रशासन से अनुमति मिलने के बाद नाटक को इस तरह रोकना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अगर नाटक का मंचन रोकना ही था तो समय रहते रोक देना चाहिए था। इस तरह प्रशासन चंद हिंदू संगठनों के हाथों बंधक बनकर काम कर रहा है, यह बेहद शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि अगर इतना ही विरोध है तो सबसे पहले शाहजहांपुर का नाम बदलना चाहिए। कल को अगर हिंदू संस्कृति पर आधारित नाटक होता है और उस पर दूसरे पक्ष के लोग एतराज करने लगें तो क्या होगा।
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रंगमंच के लिए यह उचित नहीं
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली से पास आउट नाटक के निर्देशक तारिक खान का कहना है कि उनकी समझ में नहीं आ रहा कि विरोध किस बात का हो रहा है। पहले कुछ लोगों ने नाटक का नाम बदलने को कहा। बाद में दूसरे शो को इसलिए रुकवा दिया कि इसमें जय सिंह नामक किरदार को गद्दार बताया गया। तारिक ने कहा कि नाटक में कुछ मुसलमानों को भी गद्दार लिखा गया है। अब यदि दूसरे पक्ष के लोग इस बात पर विरोध करें तो यह कहां तक सही है। वह बोले कि फिलहाल उन्हें नाटक के सिलसिले में ही मलेशिया निकलना है, यदि संभव हुआ तो नाटक का मंचन जरूर किया जाएगा। नाट्य लेखक के पास कॉपी राइट का अधिकार होता है, इसलिए वह नाम भी नहीं बदल सकते।