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Sant Kabir Nagar News: महिलाओं ने रखा जीवित्पुत्रिका व्रत, बच्चों के दीर्घायु की कामना की
Thu, 26 Sep 2024 04:01 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
Updated Thu, 26 Sep 2024 04:01 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
मगहर। जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) का पर्व बुधवार को परंपरागत ढंग से श्रद्धा पूर्वक मनाया गया। इस पर्व में महिलाओं ने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना के साथ निर्जल व्रत रखा। साथ ही सभी के लिए मंगलकामना भी की। बुधवार को दोपहर के बाद माताओं ने संतान की समृद्धि और आरोग्य के मनोरथ के साथ बरियार (पौधे) की पूजा की। जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा भी सुनी। व्रती माताएं व्रत के पारन के उपरांत अपने और अपनी संतान के गले में जिउतिया बांधने के साथ ही मंगलकामना की।
अश्विन महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के मौके पर जिवित्पुत्रिका (जिउतिया) का पर्व पितृपक्ष में पड़ता है।ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध में बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को नष्ट कर दिया। तभी भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल अभिमन्यु की पत्नी की अजन्मी संतान को देकर गर्भ में जीवित कर दिया। गर्भ में मृत होकर जीवित होने के कारण उस बच्चे का नामकरण जिवित्पुत्रिका किया गया। तभी से इस पर्व को मनाने की परम्परा चली आ रही है। इस दिन मातायें अपने पुत्र के दीर्घायु होने की कामना के साथ चौबीस घंटे का निर्जल व्रत रखती हैं। व्रती महिलाएं बुधवार को निर्जल व्रत रखने के साथ नदी में स्नान करने के पश्चात पूजन अर्चन किया। उसके बाद जिवित्पुत्रिका की कहानी कथा सुनने-सुनाने के साथ ही बरियार नामक पौधे की पूजा कर पुत्र के लम्बी उम्र की कामना की।
मगहर। जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) का पर्व बुधवार को परंपरागत ढंग से श्रद्धा पूर्वक मनाया गया। इस पर्व में महिलाओं ने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना के साथ निर्जल व्रत रखा। साथ ही सभी के लिए मंगलकामना भी की। बुधवार को दोपहर के बाद माताओं ने संतान की समृद्धि और आरोग्य के मनोरथ के साथ बरियार (पौधे) की पूजा की। जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा भी सुनी। व्रती माताएं व्रत के पारन के उपरांत अपने और अपनी संतान के गले में जिउतिया बांधने के साथ ही मंगलकामना की।
अश्विन महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के मौके पर जिवित्पुत्रिका (जिउतिया) का पर्व पितृपक्ष में पड़ता है।ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध में बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को नष्ट कर दिया। तभी भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल अभिमन्यु की पत्नी की अजन्मी संतान को देकर गर्भ में जीवित कर दिया। गर्भ में मृत होकर जीवित होने के कारण उस बच्चे का नामकरण जिवित्पुत्रिका किया गया। तभी से इस पर्व को मनाने की परम्परा चली आ रही है। इस दिन मातायें अपने पुत्र के दीर्घायु होने की कामना के साथ चौबीस घंटे का निर्जल व्रत रखती हैं। व्रती महिलाएं बुधवार को निर्जल व्रत रखने के साथ नदी में स्नान करने के पश्चात पूजन अर्चन किया। उसके बाद जिवित्पुत्रिका की कहानी कथा सुनने-सुनाने के साथ ही बरियार नामक पौधे की पूजा कर पुत्र के लम्बी उम्र की कामना की।
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