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Sant Kabir Nagar News: फर्जी डिग्री पर चल रहे अस्पताल, रजिस्ट्रेशन निरस्त कर पल्ला झाड़ रहे जिम्मेदार

Tue, 10 Feb 2026 01:30 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 10 Feb 2026 01:30 AM IST
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Hospitals are operating with fake degrees, and the authorities are simply washing their hands of the matter by canceling registrations.
सीएमओ कार्यालय कुशीनगर।
पडरौना।
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जिले में निजी अस्पतालों के पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सीएमओ कार्यालय की ओर से बिना समुचित सत्यापन के फर्जी और संदिग्ध डिग्रियों के आधार पर अस्पतालों का पंजीकरण कर दिए जाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। चिंताजनक तथ्य यह है कि मरीजों की मौत के बाद जब जांच होती है, तब फर्जीवाड़े की परतें खुलती हैं, लेकिन कार्रवाई अस्पताल का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने तक सीमित रह जाती है। पंजीकरण की अनुमति देने वाले अधिकारियों की भूमिका पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।

निजी अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन से पहले नोडल अफसर के नेतृत्व में तीन स्तर पर जांच का दावा किया जाता है। इसके बावजूद फर्जी डिग्रियों पर अस्पतालों का संचालन होना न केवल सिस्टम की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि इस पूरे तंत्र में मिलीभगत की आशंका को भी बल देता है।
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रजिस्ट्रेशन में ‘खेल’, जांच सिर्फ मौत के बाद

स्वास्थ्य विभाग के जानकारों के अनुसार, जिले में निजी अस्पतालों के पंजीकरण में लंबे समय से गड़बड़ियां चल रही हैं। फर्जी डिग्रियों के अलावा कई मामलों में डॉक्टरों की डिग्री चोरी या बिना अनुमति के इस्तेमाल की जा रही है। कुशीनगर में ऐसे प्रकरण बार-बार सामने आए, लेकिन हर बार कार्रवाई का दायरा पंजीकरण निरस्त करने तक सिमट गया।
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सवाल यह है कि रजिस्ट्रेशन के वक्त किस स्तर पर चूक हुई और फर्जी या बिना सहमति की डिग्री का इस्तेमाल कैसे स्वीकार कर लिया गया-इन बिंदुओं पर न तो गहन जांच हो रही है और न ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा रही।

प्रभावशाली अस्पताल, ठंडी पड़ती जांच

हाल ही में शहर के छावनी क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन के बाद प्रसूता की मौत हो गई। दो माह से जांच लंबित है। बताया जा रहा है कि अस्पताल के प्रभावशाली संचालक और ऑपरेशन में मेडिकल कॉलेज की महिला डॉक्टर की मौजूदगी के चलते जांच को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश हो रही है। ऐसे मामलों की संख्या जिले में कम नहीं है।

अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं
सूत्रों के मुताबिक, कई निजी अस्पतालों के संचालकों द्वारा प्रस्तुत डिग्रियों का पंजीकरण से पहले सत्यापन ही नहीं कराया गया। नतीजा यह रहा कि अयोग्य लोग इलाज करते रहे और गंभीर मामलों में मरीजों की जान तक चली गई। सवाल यह भी है कि फर्जी डिग्री तैयार करने और उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क तथा उन दस्तावेजों को स्वीकार करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं की जा रही।

तमकुहीराज के अलाउद्दीन पर दर्ज है फर्जी डिग्री का मुकदमा

तमकुहीराज निवासी अलाउद्दीन के खिलाफ गोरखपुर में डॉक्टरों की फर्जी डिग्री बनाने और बेचने का मुकदमा दर्ज है। अलाउद्दीन खुद अस्पताल संचालित करता था और उसकी पत्नी कस्बे की सभासद है। पुलिस की घेराबंदी के बावजूद वह लंबे समय तक भूमिगत रहा और बाद में कोर्ट में हाजिर हुआ। इसके बावजूद जिले में फर्जी या संदिग्ध डिग्री पर अस्पतालों का पंजीकरण जारी रहना व्यवस्था की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

फाइल में दर्ज चार उदाहरण, सिस्टम पर सवाल



केस-1:

रामकोला कस्बे के गीतांजलि हॉस्पिटल में 22 नवंबर को ऑपरेशन के बाद प्रसूता पूनम देवी की मौत हुई। जांच में अस्पताल संचालिका की डिग्री फर्जी पाई गई। इसके बाद पंजीकरण निरस्त किया गया, जबकि पहले स्तर पर सत्यापन क्यों नहीं हुआ, इसका जवाब नहीं मिला।



केस-2:

पडरौना के सिधुआ स्थित कुशवाहा हेल्थ केयर में ओटी के भीतर झोलाछाप द्वारा ऑपरेशन का मामला सामने आया। टीम के पहुंचते ही आरोपी फरार हो गए। रजिस्ट्रेशन फर्जी मिलने पर प्राथमिकी दर्ज हुई।



केस-3:

छावनी क्षेत्र के जीवन रक्षक अस्पताल का पंजीकरण गोरखपुर के डॉक्टर की डिग्री पर कराया गया था, जो कभी पडरौना आए ही नहीं। जांच के बाद केवल रजिस्ट्रेशन निलंबित कर दिया गया।



केस-4:

खिरिया टोला स्थित हिंद हॉस्पिटल में प्रसव के बाद महिला की मौत हुई। पोस्टमार्टम में लापरवाही की पुष्टि हुई। अस्पताल सील हुआ, लेकिन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में हुई चूक पर सवाल जस के तस हैं।




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अस्पतालों के पंजीकरण से पहले नोडल अफसर की जांच होती है और बिना जांच रजिस्ट्रेशन नहीं दिया जाता। हाल के मामलों के बाद क्रॉस चेकिंग भी कराई जा रही है। लापरवाह स्वास्थ्य कर्मियों पर विभागीय कार्रवाई की जाती है।
-डॉ. एसएन मणि त्रिपाठी, प्रभारी सीएमओ
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