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Sant Kabir Nagar News: ढड़वा ताल उपेक्षा का शिकार, सुंदरीकरण का प्रस्ताव नहीं बढ़ा आगे
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धनघटा के निकट स्थित ढड़वा ताल कमल की प्राकृतिक खे
धनघटा। धनघटा के निकट स्थित ढड़वा ताल कमल की प्राकृतिक खेती के लिए प्रसिद्ध है। दस किलोमीटर लंबे ताल में बहुतायत से कमल खिलते हैं। दशकों से प्राकृतिक रूप से कमल उगाने वाला ताल उपेक्षा का शिकार है। इसके सुंदरीकरण का प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका है।
सरकार नकदी फसलों को बढ़ावा देने के लिए जहां अनेक योजनाएं लागू कर रही है वहीं कमल की खेती उपेक्षित है। धनघटा क्षेत्र में स्थित ढड़वा ताल में कमल की खेती से मुनाफे की असीम संभावनाएं सतह पर धूल फांक रही हैं। कमल की खेती बेहद कम समय में तैयार होकर कई गुना ज्यादा मुनाफा किसान को दे सकती है। कमल की खेती को वैज्ञानिक रूप से बढ़ावा मिलता तो बकौली कला, धनघटा, टेम्हा, लहुरेगांव आदि गांव के सैकड़ों किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती।
कमल की खेती तीन से चार महीने में तैयार हो जाती है। यही सबसे बड़ी वजह है कि कृषि विशेषज्ञ इसे कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों की श्रेणी में गिनते हैं। कमल की खेती में अच्छी उपज के लिए नमी से युक्त मिट्टी उपयोगी होती है। ढड़वा ताल की मिट्टी कमल की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती छायादार स्थानों पर नहीं की जा सकती है। ज्यादा ठंड भी इसकी फसल को नुकसान पहुंचाती है।
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इसकी खेती के लिए मानसून का महीना सबसे बढ़िया होता है क्योंकि इसकी फसल को पानी की पर्याप्त जरूरत होती है। ज्यादा बारिश इसकी फसल उपयुक्त होती है, जिससे कारण फसल भी अच्छी उपज देती है। कृषि विज्ञान केंद्र बगही के वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार ने बताया कि कमल के बीज या कमल को ताल व गड्ढे में डाल देना चाहिए। पानी से भरे ताल में फसल का विकास काफी तेजी से होता है। कमल की फसल अक्तूबर महीने तक तैयार हो जाती है, जिसके बाद कमल की तैयार फसल की तुड़ाई की जा सकती है। प्राकृतिक ढंग से अलग किसान खेतों में पानी भरकर कमल की खेती की शुरुआत कर सकते हैं। इसमें ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है।
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आर्थिक स्थिति हो सकती है मजबूत
कमल के पांच से छह हजार पौधे एक एकड़ में लग जाते हैं। कमल की खेती मुश्किल से 25 से 30 हजार रुपये तक का खर्च आता है। कमल के फूल के अलावा बीज के पत्ते और कमल गट्टे भी बिकते हैं। इस प्रकार कमल से तीन प्रकार से आमदनी प्राप्त होती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार किसान कमल की खेती पर 25 से 30 हजार खर्च कर इस फसल से दो लाख तक का मुनाफा कमा सकते हैं।
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ढड़वा ताल में कमल की खेती के विकास के लिए फिर शासन स्तर पर पत्र लिखेंगे, जिससे क्षेत्र में प्राकृतिक कमल की खेती को बढ़ावा मिल सके।
-वीरेंद्र गुप्ता, एसडीएम, धनघटा
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सरकार नकदी फसलों को बढ़ावा देने के लिए जहां अनेक योजनाएं लागू कर रही है वहीं कमल की खेती उपेक्षित है। धनघटा क्षेत्र में स्थित ढड़वा ताल में कमल की खेती से मुनाफे की असीम संभावनाएं सतह पर धूल फांक रही हैं। कमल की खेती बेहद कम समय में तैयार होकर कई गुना ज्यादा मुनाफा किसान को दे सकती है। कमल की खेती को वैज्ञानिक रूप से बढ़ावा मिलता तो बकौली कला, धनघटा, टेम्हा, लहुरेगांव आदि गांव के सैकड़ों किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती।
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कमल की खेती तीन से चार महीने में तैयार हो जाती है। यही सबसे बड़ी वजह है कि कृषि विशेषज्ञ इसे कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों की श्रेणी में गिनते हैं। कमल की खेती में अच्छी उपज के लिए नमी से युक्त मिट्टी उपयोगी होती है। ढड़वा ताल की मिट्टी कमल की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती छायादार स्थानों पर नहीं की जा सकती है। ज्यादा ठंड भी इसकी फसल को नुकसान पहुंचाती है।
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इसकी खेती के लिए मानसून का महीना सबसे बढ़िया होता है क्योंकि इसकी फसल को पानी की पर्याप्त जरूरत होती है। ज्यादा बारिश इसकी फसल उपयुक्त होती है, जिससे कारण फसल भी अच्छी उपज देती है। कृषि विज्ञान केंद्र बगही के वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार ने बताया कि कमल के बीज या कमल को ताल व गड्ढे में डाल देना चाहिए। पानी से भरे ताल में फसल का विकास काफी तेजी से होता है। कमल की फसल अक्तूबर महीने तक तैयार हो जाती है, जिसके बाद कमल की तैयार फसल की तुड़ाई की जा सकती है। प्राकृतिक ढंग से अलग किसान खेतों में पानी भरकर कमल की खेती की शुरुआत कर सकते हैं। इसमें ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है।
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आर्थिक स्थिति हो सकती है मजबूत
कमल के पांच से छह हजार पौधे एक एकड़ में लग जाते हैं। कमल की खेती मुश्किल से 25 से 30 हजार रुपये तक का खर्च आता है। कमल के फूल के अलावा बीज के पत्ते और कमल गट्टे भी बिकते हैं। इस प्रकार कमल से तीन प्रकार से आमदनी प्राप्त होती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार किसान कमल की खेती पर 25 से 30 हजार खर्च कर इस फसल से दो लाख तक का मुनाफा कमा सकते हैं।
ढड़वा ताल में कमल की खेती के विकास के लिए फिर शासन स्तर पर पत्र लिखेंगे, जिससे क्षेत्र में प्राकृतिक कमल की खेती को बढ़ावा मिल सके।
-वीरेंद्र गुप्ता, एसडीएम, धनघटा