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Sant Kabir Nagar News: अस्पताल की मांग अधूरी, इलाज के लिए गोरखपुर जाना मजबूरी
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संवाद न्यूज एजेंसी
मेंहदावल। जहां विकास की गाथाएं लिखी जा रही हैं। प्रदेश के प्रत्येक जिले में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की बात हो रही है। वहीं मेंहदावल के पूर्वी क्षेत्र में लगभग एक लाख की आबादी पर स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था नहीं है। लंबे समय से इस क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्थापना की मांग की जा रही है। यहां अस्पताल की मांग पूरी नहीं हो रही है। मजबूरी में लोगों को इलाज कराने के लिए गोरखपुर जाना पड़ता है।
मेंहदावल विकासखंड क्षेत्र का पूर्वी हिस्सा जो राप्ती के किनारे बसा हुआ है। प्रत्येक बरसात में तथा उमस भरी गर्मी में लोक संक्रामक बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं। क्षेत्र में झोलाछाप की भरमार है जिनके सहारे इनका इलाज होता है। विकासखंड क्षेत्र का अंतिम गांव धूरा पाली गोरखपुर सीमा से सटा हुआ है। वहां के मरीजों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मेंहदावल आने के लिए 20 से 22 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।
दूसरा गांव चिकिनिया डीह है। जो गोरखपुर सीमा के करीब ही है। यहां के मरीजों को भी मेंहदावल इलाज के लिए आना पड़ता है। 18 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। सबसे अधिक परेशानी उन मरीजों तथा परिजन को उठाना पड़ती है। जिन्हें रात में इलाज के लिए 20 किलोमीटर की दूरी तय करके सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आना पड़ता है।
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वर्ष 1998 से पूर्वी क्षेत्र के बढ़या ठाठर न्याय पंचायत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण की मांग की जा रही है लेकिन स्वास्थ्य केंद्र का मुद्दा आश्वासन बनकर रह गया। बेलौली, खैरा, थरौली, डुमरिया बाबू, कुसौना कलां, बढ़या ठाठर, बानडुमर, विशुनपुर, कछार, जोरवा, छपिया, पराग, नौगो, मधईपुर, सरफरा, जमोहरा, नगपुर, छपिया अंगद, पचनेउरी, हरपुर, बरईपुर, मेहावर सिंह समेत कई गांव के लोगों को स्वास्थ्य केंद्र के स्थापना से लाभ मिलेगा।
क्षेत्र के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य देवेंद्र पाठक, दिनेश सिंह, कृष्णा सिंह, प्रमोद यादव, अजय तिवारी, पूर्व प्रधान निरंजन विश्वकर्मा आदि लोगों ने कहा कि बढ़या ठाठर पूर्वी क्षेत्र के बीचोबीच मुख्य केंद्र बिंदु है। यदि यहां स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना हो जाती है तो इसका लाभ करीब एक लाख आबादी को मिलेगा। लोगों को लंबी दूरी तय कर मेंहदावल नहीं जाना पड़ेगा।
स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था क्षेत्र में न होने के कारण लोगों को मजबूरन झोलाछाप से इलाज करना पड़ता है, जिसके कारण कई लोग जान भी गवां चुके हैं।
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मेंहदावल। जहां विकास की गाथाएं लिखी जा रही हैं। प्रदेश के प्रत्येक जिले में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की बात हो रही है। वहीं मेंहदावल के पूर्वी क्षेत्र में लगभग एक लाख की आबादी पर स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था नहीं है। लंबे समय से इस क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्थापना की मांग की जा रही है। यहां अस्पताल की मांग पूरी नहीं हो रही है। मजबूरी में लोगों को इलाज कराने के लिए गोरखपुर जाना पड़ता है।
मेंहदावल विकासखंड क्षेत्र का पूर्वी हिस्सा जो राप्ती के किनारे बसा हुआ है। प्रत्येक बरसात में तथा उमस भरी गर्मी में लोक संक्रामक बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं। क्षेत्र में झोलाछाप की भरमार है जिनके सहारे इनका इलाज होता है। विकासखंड क्षेत्र का अंतिम गांव धूरा पाली गोरखपुर सीमा से सटा हुआ है। वहां के मरीजों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मेंहदावल आने के लिए 20 से 22 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।
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दूसरा गांव चिकिनिया डीह है। जो गोरखपुर सीमा के करीब ही है। यहां के मरीजों को भी मेंहदावल इलाज के लिए आना पड़ता है। 18 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। सबसे अधिक परेशानी उन मरीजों तथा परिजन को उठाना पड़ती है। जिन्हें रात में इलाज के लिए 20 किलोमीटर की दूरी तय करके सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आना पड़ता है।
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वर्ष 1998 से पूर्वी क्षेत्र के बढ़या ठाठर न्याय पंचायत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण की मांग की जा रही है लेकिन स्वास्थ्य केंद्र का मुद्दा आश्वासन बनकर रह गया। बेलौली, खैरा, थरौली, डुमरिया बाबू, कुसौना कलां, बढ़या ठाठर, बानडुमर, विशुनपुर, कछार, जोरवा, छपिया, पराग, नौगो, मधईपुर, सरफरा, जमोहरा, नगपुर, छपिया अंगद, पचनेउरी, हरपुर, बरईपुर, मेहावर सिंह समेत कई गांव के लोगों को स्वास्थ्य केंद्र के स्थापना से लाभ मिलेगा।
क्षेत्र के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य देवेंद्र पाठक, दिनेश सिंह, कृष्णा सिंह, प्रमोद यादव, अजय तिवारी, पूर्व प्रधान निरंजन विश्वकर्मा आदि लोगों ने कहा कि बढ़या ठाठर पूर्वी क्षेत्र के बीचोबीच मुख्य केंद्र बिंदु है। यदि यहां स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना हो जाती है तो इसका लाभ करीब एक लाख आबादी को मिलेगा। लोगों को लंबी दूरी तय कर मेंहदावल नहीं जाना पड़ेगा।
स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था क्षेत्र में न होने के कारण लोगों को मजबूरन झोलाछाप से इलाज करना पड़ता है, जिसके कारण कई लोग जान भी गवां चुके हैं।