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नहाय खाय के साथ आज से शुरू हुआ छठ का महापर्व
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नहाय खाय के साथ आज से शुरू हुआ छठ का महापर्व
सप्तमी को भोर में उगते सूर्य को पानी में खड़ा होकर महिलाएं देंगी अर्घ्य
10 नवंबर से शुरू हो रहा छठ पर्व
संवाद न्यूज एजेंसी
संतकबीरनगर। छठ पूजा का पर्व नौ नवंबर से शुरू हो रहा है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को निर्जल व्रत रहकर महिलाएं भगवान सूर्य की उपासना करेंगी, जिसमें उनके पति सहयोग करते हैं। छठ पूजा में संतानवती महिलाएं सायंकाल और भोर में सरोवर अथवा नदी के किनारे पानी के अंदर खड़े होकर भगवान सूर्य को दूध-जल से अर्घ्य देंगी तथा सात प्रकार के फलों से पूजा-अर्चना कर अपनी संतान की उन्नति और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करेंगी। पर्व को लेकर जनपद में शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में तैयारी तेज हो गईं हैं।
डाला छठ के नाम से पूर्वांचल में तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत में महिलाएं पंचमी को एक वक्त बिना नमक के भोजन करती हैं। षष्ठी को निर्जल व्रत रहकर सायंकाल नदी-सरोवर के जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं तथा सूर्य भगवान को विविध प्रकार के पकवानों का भोग लगाती है। रात भर जागरण होता है, सप्तमी को भोर में पुन: उसी स्थान पर जल में खड़ेे होकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है तथा फल, मिष्ठान, पकवान आदि अर्पित करती हैं। छठ पर्व को लेकर शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में तैयारियां तेज हो गईं हैं। नदी और पोखरों के किनारे साफ-सफाई शुरू हो गई है। शहर के समय जी स्थान के पास स्थित पोखरा, शुगर मिल आदि जगहों पर साफ-सफाई का कार्य शुरू हो गया है। इसके अलावा बाजारों में भी छठ पर्व को लेकर तैयारी तेज है।
कब-कब है छठ पर्व का दिन
पहला दिन- नहाय खाय
आठ नवंबर- इस दिन सुबह में नहाय खाय के साथ छठ पूजा प्रारंभ होगी। सुबह स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है, कुछ दान किया जाता है।
दूसरा दिन : खरना
खरना दूसरे दिन का व्रत है जो नौ नवंबर को रहेगा। इस दिन खरना होता है। कहीं-कहीं इसे लोहंडा के नाम से भी पुकारा जाता है। इस दिन व्रत रखते हैं। इस दिन महिलाएं पूरा दिन व्रत रखती हैं और शाम को मिट्टी के चूल्हे पर खीर का प्रसाद बनाती हैं। यह खीर गुड़ की होती है। शाम को पूजा करने के बाद इस गुड़ की खीर को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
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तीसरा दिन : 10 नवंबर
इस दिन छठ मैया और सूर्य देव वरुण देव की पूजा-अर्चना होती है। छठ का यह सबसे महत्वपूर्ण एवं कठिन व्रत होता है, क्योंकि इस दिन व्रती को निर्जल व्रत रखना होता है। शाम को नदी या तालाब के किनारे ऋतु फल तथा शुद्ध घी से बना हुए पकवान से डूबते हुए सूर्य का पूजन किया जाता है।
चौथा दिन: 11 नवंबर
इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण के साथ ही छठ पूजा का समापन हो जाता है।
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सप्तमी को भोर में उगते सूर्य को पानी में खड़ा होकर महिलाएं देंगी अर्घ्य
10 नवंबर से शुरू हो रहा छठ पर्व
संवाद न्यूज एजेंसी
संतकबीरनगर। छठ पूजा का पर्व नौ नवंबर से शुरू हो रहा है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को निर्जल व्रत रहकर महिलाएं भगवान सूर्य की उपासना करेंगी, जिसमें उनके पति सहयोग करते हैं। छठ पूजा में संतानवती महिलाएं सायंकाल और भोर में सरोवर अथवा नदी के किनारे पानी के अंदर खड़े होकर भगवान सूर्य को दूध-जल से अर्घ्य देंगी तथा सात प्रकार के फलों से पूजा-अर्चना कर अपनी संतान की उन्नति और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करेंगी। पर्व को लेकर जनपद में शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में तैयारी तेज हो गईं हैं।
डाला छठ के नाम से पूर्वांचल में तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत में महिलाएं पंचमी को एक वक्त बिना नमक के भोजन करती हैं। षष्ठी को निर्जल व्रत रहकर सायंकाल नदी-सरोवर के जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं तथा सूर्य भगवान को विविध प्रकार के पकवानों का भोग लगाती है। रात भर जागरण होता है, सप्तमी को भोर में पुन: उसी स्थान पर जल में खड़ेे होकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है तथा फल, मिष्ठान, पकवान आदि अर्पित करती हैं। छठ पर्व को लेकर शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में तैयारियां तेज हो गईं हैं। नदी और पोखरों के किनारे साफ-सफाई शुरू हो गई है। शहर के समय जी स्थान के पास स्थित पोखरा, शुगर मिल आदि जगहों पर साफ-सफाई का कार्य शुरू हो गया है। इसके अलावा बाजारों में भी छठ पर्व को लेकर तैयारी तेज है।
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कब-कब है छठ पर्व का दिन
पहला दिन- नहाय खाय
आठ नवंबर- इस दिन सुबह में नहाय खाय के साथ छठ पूजा प्रारंभ होगी। सुबह स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है, कुछ दान किया जाता है।
दूसरा दिन : खरना
खरना दूसरे दिन का व्रत है जो नौ नवंबर को रहेगा। इस दिन खरना होता है। कहीं-कहीं इसे लोहंडा के नाम से भी पुकारा जाता है। इस दिन व्रत रखते हैं। इस दिन महिलाएं पूरा दिन व्रत रखती हैं और शाम को मिट्टी के चूल्हे पर खीर का प्रसाद बनाती हैं। यह खीर गुड़ की होती है। शाम को पूजा करने के बाद इस गुड़ की खीर को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
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तीसरा दिन : 10 नवंबर
इस दिन छठ मैया और सूर्य देव वरुण देव की पूजा-अर्चना होती है। छठ का यह सबसे महत्वपूर्ण एवं कठिन व्रत होता है, क्योंकि इस दिन व्रती को निर्जल व्रत रखना होता है। शाम को नदी या तालाब के किनारे ऋतु फल तथा शुद्ध घी से बना हुए पकवान से डूबते हुए सूर्य का पूजन किया जाता है।
चौथा दिन: 11 नवंबर
इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण के साथ ही छठ पूजा का समापन हो जाता है।