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मुस्लिम महिलाओं की चिंता छोडे़ केंद्र सरकार
ब्यूरो/अमर उजाला, संभल
Updated Sun, 30 Oct 2016 12:39 AM IST
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उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार मुसलमानों की जगह गैरमुस्लिम महिलाओं को उनके वाजिब हक-हुकूक दिलवाए।
कांफ्रेंस को खिताब करते हुए दिल्ली से आए सैयद डा. फजलउल्लाह चिश्ती साबरी ने कॉमन सिविल कोड के बारे में बताया। कहा, हिंदुस्तान में हर मजहब के लोग अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक जिंदगी गुजार सकते हैं। महिलाओं को इस्लाम ने पूरा अधिकार दिया है।
सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ को बदलने की बात करती है। जो कि नामुमकिन है अगर सरकार को महिलाओं की इतनी चिंता है तो गोवा की उन गैरमुस्लिम महिलाओं को उनका अधिकार दिलाए। जिनके पतियों को यह अधिकार हासिल है कि अगर उनकी पत्नी 30 वर्ष तक किसी बच्चे को जन्म नहीं देती है तो वे दूसरी शादी कर सकते हैं। कहा कि उलेमाओं की जिम्मेदारी है कि तलाक, निकाह के बारे में मुस्लिम कौम को समझाएं। अगर कोई शख्स तीन तलाक देता है तो वह शरीयत की तालीम से दूर होने की वजह से देता है।
उन्होंने कहा कि आज तक किसी आलिम ने अपनी पत्नी को तीन तलाक नहीं दी है। मौलाना फाजिल मिस्वाही ने कहा कि शरई कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता है। क्योंकि यह मुस्लिमों का बनाया हुआ कानून नहीं है, जिसे बदल दिया जाए। बल्कि यह अल्लाह व उनके रसूल का बनाया हुआ कानून है जिसको मुसलमान भी नहीं बदल सकता।
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कांफ्रेंस को आजमगढ़ से आए मुफ्ती जाहिद अली सलामी व कारी इरफान लतीफी, मौलाना तौसीफ ने भी खिताब किया। शहर मुफ्ती कारी अलाउद्दीन अजमली, काइदे अहले सुन्न्त मौलाना नफीस अख्तर, इमामे ईदगाह मौलाना सुलेमान अशरफ, मुफ्ती अशफाक, मौलाना जियाउल मुस्तफा, मौलाना रईस, मौलाना फैजान अशरफ, मौलाना शुएब, मुफ्ती गुलाम मुस्तफा, कारी लईक, कारी मुदस्सिर, मौलाना शौकत, मुफ्ती गुलाम मुस्तफा, मौलाना जाकिर रहे।
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कांफ्रेंस को खिताब करते हुए दिल्ली से आए सैयद डा. फजलउल्लाह चिश्ती साबरी ने कॉमन सिविल कोड के बारे में बताया। कहा, हिंदुस्तान में हर मजहब के लोग अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक जिंदगी गुजार सकते हैं। महिलाओं को इस्लाम ने पूरा अधिकार दिया है।
सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ को बदलने की बात करती है। जो कि नामुमकिन है अगर सरकार को महिलाओं की इतनी चिंता है तो गोवा की उन गैरमुस्लिम महिलाओं को उनका अधिकार दिलाए। जिनके पतियों को यह अधिकार हासिल है कि अगर उनकी पत्नी 30 वर्ष तक किसी बच्चे को जन्म नहीं देती है तो वे दूसरी शादी कर सकते हैं। कहा कि उलेमाओं की जिम्मेदारी है कि तलाक, निकाह के बारे में मुस्लिम कौम को समझाएं। अगर कोई शख्स तीन तलाक देता है तो वह शरीयत की तालीम से दूर होने की वजह से देता है।
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उन्होंने कहा कि आज तक किसी आलिम ने अपनी पत्नी को तीन तलाक नहीं दी है। मौलाना फाजिल मिस्वाही ने कहा कि शरई कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता है। क्योंकि यह मुस्लिमों का बनाया हुआ कानून नहीं है, जिसे बदल दिया जाए। बल्कि यह अल्लाह व उनके रसूल का बनाया हुआ कानून है जिसको मुसलमान भी नहीं बदल सकता।
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कांफ्रेंस को आजमगढ़ से आए मुफ्ती जाहिद अली सलामी व कारी इरफान लतीफी, मौलाना तौसीफ ने भी खिताब किया। शहर मुफ्ती कारी अलाउद्दीन अजमली, काइदे अहले सुन्न्त मौलाना नफीस अख्तर, इमामे ईदगाह मौलाना सुलेमान अशरफ, मुफ्ती अशफाक, मौलाना जियाउल मुस्तफा, मौलाना रईस, मौलाना फैजान अशरफ, मौलाना शुएब, मुफ्ती गुलाम मुस्तफा, कारी लईक, कारी मुदस्सिर, मौलाना शौकत, मुफ्ती गुलाम मुस्तफा, मौलाना जाकिर रहे।