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बीमार हो रही जिले की कृषि भूमि, जिंक की कमी
ब्यूरो/अमर उजाला, संभल
Updated Wed, 04 Jan 2017 01:16 AM IST
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पंजाब में खेती और उत्पादन पर मॉनसून का असर
- फोटो : फाइल फोटो
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इसका मुख्य कारण यह है कि जमीन में पोषक तत्वों के बीच किसान जिंक सल्फेट को खेत में डालना भूल रहे हैं। परिणाम यह है कि रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग के बीच जिंक सल्फेट की मात्रा न्यूनतम पाई गई है। जिसे पूरा किया जाना आवश्यक है।
बदलते समय के साथ खेती किसान के तरीके भी बदल रहे हैं। किसान लगातार फसल उत्पादन लेने के चक्कर में खेतों को खाली नहीं छोड़ पा रहे हैं। हरी खाद, जैविक खाद से दूर हो रहे हैं। रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। किसान फसलें तो उगा रहे हैं लेकिन जमीन की उर्वरा शक्ति का ख्याल नहीं रख पा रहे हैं, जिंक सल्फेट को जमीन में नहीं डाल रहे हैं। यही कारण है कि मृदा परीक्षण की जो रिपोर्ट आई हैं, उनमें जिले की अधिकांश कृषि भूमि में जिंक सल्फेट की मात्रा कम पाई गई है। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जिन खेतों की मिट्टी में जिंक की मात्रा बेहद कम है। जिसका प्रभाव फसल उत्पादन पर दिखाई देने लगा है।
फसल की अच्छी पैदावार के लिए जमीन में नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटाश व सूक्ष्म तत्वों में जिंक, बोरान, आयरन, मैगनीज आदि पोषक तत्वों का होना आवश्यक है। इसमें यदि किसी भी पोषक तत्व की कमी रह जाती है, तो फसल की पैदावार कम होगी।
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जिंक सल्फेट की कमी का प्रभाव
जिंक की कमीं से पौधे की नीचे की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, लाल धब्बे भी हो जाते हैं, जिसके कारण पौधा सूर्य की किरणों से अपना पर्याप्त भोजन प्राप्त नहीं कर पाता है, जिसका असर उसके उत्पादन पर पड़ता है। क्योंकि जिंक के कारण पत्तियां हरी रहती हैं, जो सूर्य की किरणों से क्लोरोफिन प्राप्त करने में सहायक होती हैं।
क्यों कम हो रही जिंक सल्फेट
किसान फसल उत्पादन बेहतर प्राप्त करने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों का प्रयोग कर रहा है लेकिन जिंक सल्फेट नहीं डाल रहा है। क्योंकि अधिकांश खादों में जिंक की मात्रा नहीं है, इसके लिए किसानों को अलग से इसका प्रयोग करना होता है, जो नहीं हो रहा है। सामान्यत: किसानों को 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक का प्रयोग करना चाहिए, किसान वह भी नहीं कर रहे हैं। जमीन में जिंक की तीन श्रेणियां मध्यम, न्यूनतम व अति न्यूनतम होती हैं।
जिंक प्रयोग पर मिलेगा 50 फीसदी अनुदान
जिले की भूमि में उर्वरा शक्ति कम हो रही है, मिट्टी की जांच में खेतिहर जमीन में जिंक फास्फेट की कमी पाई गई है। किसानों को न्यूनतम श्रेणी वाले खेतों में 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक डालनी चाहिए। अति न्यूनतम श्रेणी वाले खेतों में कल्ले निकलने के दौरान दो से चार किलो जिंक 0.2 प्रतिशत के घोल में छिड़काव करें, फिर खड़ी फसल में पानी भरकर 25 किलो जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं।
किसानों को जागरूक किया जा रहा है। कई कंपनियों को जिंक कोटेड खाद बनाने के साथ ही किसानों को भी जिंक लगाने व उसकी खरीद का पचास फीसदी अनुदान खातों में भेजने की योजना भी शुरू की गई है।
- जेएस राठौर उप कृषि निदेशक संभल
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बदलते समय के साथ खेती किसान के तरीके भी बदल रहे हैं। किसान लगातार फसल उत्पादन लेने के चक्कर में खेतों को खाली नहीं छोड़ पा रहे हैं। हरी खाद, जैविक खाद से दूर हो रहे हैं। रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। किसान फसलें तो उगा रहे हैं लेकिन जमीन की उर्वरा शक्ति का ख्याल नहीं रख पा रहे हैं, जिंक सल्फेट को जमीन में नहीं डाल रहे हैं। यही कारण है कि मृदा परीक्षण की जो रिपोर्ट आई हैं, उनमें जिले की अधिकांश कृषि भूमि में जिंक सल्फेट की मात्रा कम पाई गई है। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जिन खेतों की मिट्टी में जिंक की मात्रा बेहद कम है। जिसका प्रभाव फसल उत्पादन पर दिखाई देने लगा है।
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फसल की अच्छी पैदावार के लिए जमीन में नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटाश व सूक्ष्म तत्वों में जिंक, बोरान, आयरन, मैगनीज आदि पोषक तत्वों का होना आवश्यक है। इसमें यदि किसी भी पोषक तत्व की कमी रह जाती है, तो फसल की पैदावार कम होगी।
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जिंक सल्फेट की कमी का प्रभाव
जिंक की कमीं से पौधे की नीचे की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, लाल धब्बे भी हो जाते हैं, जिसके कारण पौधा सूर्य की किरणों से अपना पर्याप्त भोजन प्राप्त नहीं कर पाता है, जिसका असर उसके उत्पादन पर पड़ता है। क्योंकि जिंक के कारण पत्तियां हरी रहती हैं, जो सूर्य की किरणों से क्लोरोफिन प्राप्त करने में सहायक होती हैं।
क्यों कम हो रही जिंक सल्फेट
किसान फसल उत्पादन बेहतर प्राप्त करने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों का प्रयोग कर रहा है लेकिन जिंक सल्फेट नहीं डाल रहा है। क्योंकि अधिकांश खादों में जिंक की मात्रा नहीं है, इसके लिए किसानों को अलग से इसका प्रयोग करना होता है, जो नहीं हो रहा है। सामान्यत: किसानों को 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक का प्रयोग करना चाहिए, किसान वह भी नहीं कर रहे हैं। जमीन में जिंक की तीन श्रेणियां मध्यम, न्यूनतम व अति न्यूनतम होती हैं।
जिंक प्रयोग पर मिलेगा 50 फीसदी अनुदान
जिले की भूमि में उर्वरा शक्ति कम हो रही है, मिट्टी की जांच में खेतिहर जमीन में जिंक फास्फेट की कमी पाई गई है। किसानों को न्यूनतम श्रेणी वाले खेतों में 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक डालनी चाहिए। अति न्यूनतम श्रेणी वाले खेतों में कल्ले निकलने के दौरान दो से चार किलो जिंक 0.2 प्रतिशत के घोल में छिड़काव करें, फिर खड़ी फसल में पानी भरकर 25 किलो जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं।
किसानों को जागरूक किया जा रहा है। कई कंपनियों को जिंक कोटेड खाद बनाने के साथ ही किसानों को भी जिंक लगाने व उसकी खरीद का पचास फीसदी अनुदान खातों में भेजने की योजना भी शुरू की गई है।
- जेएस राठौर उप कृषि निदेशक संभल