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Sambhal News: 163 वर्ष... तारीखों संग बदली चंदौसी की तस्वीर
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समय रुकता कहां है। बदलाव नियति है। दिन बीते, तारीखें बदलीं। कैलेंडर बदले। 163 वर्ष का यह बड़ा और सुखद इतिहास लिए मैं चंदौसी हूं। हां. मैं नगर पालिका चंदौसी हूं। गुलामी से लेकर भारत की आजादी तक का सफर देखा। बैलगाड़ी से लेकर हवाई जहाज तक, पांच पैसे के पोस्टकार्ड से लेकर इंटरनेट के जरिये विदेश में बैठे अपनों से रूबरू बातचीत, मिट्टी के चूल्हे से लेकर गैस तक और पगडंडी से लेकर एक्सप्रेस-वे तक की साक्षी हूं। लंबी जीवन यात्रा में विकास का रथ तेजी से दौड़ा, लेकिन अभी लोगों की उम्मीदें अधूरी हैं। आज मेरी वर्षगांठ है। ऐसे में योजनाएं गिनाने, बताने और समस्याओं पर चर्चा व चिंतन करने का मौका है। पेश है ओमप्रकाश शंखधार की यह रिपोर्ट-
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आंकड़ों के अनुसार मंडल की पहली नगर पालिका है चंदौसी
चंदौसी। प्रदेश में लखनऊ समेत जिन चार नगर पालिकाओं का गठन किया गया था, उनमें चंदौसी को भी आठ जुलाई 1863 में नगर पालिका का दर्जा मिला था। आंकड़े बताते हैं कि यह नगर पालिका मंडल की पहली है। इसके छह महीने बाद मुरादाबाद नगर पालिका का गठन हुआ था। इसके पहले चेयरमैन राव साहब जगन्नाथ बने थे। अब तक इस नगर पालिका में चेयरमैन के पद पर 28 महिला पुरुष आसीन रहे हैं। पालिका गठन के समय शहर की आबादी करीब 23 हजार थी और अब यहां की जनसंख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1.55 लाख से अधिक है। पहले वार्ड की संख्या भी कम थी, लेकिन अब शहर को 25 वार्ड में बांटा गया है।
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दस दरवाजों के बीच तालाें में बंद रहने वाला शहर
यूं तो ऐतिहासिक शहर चंदौसी की कई विशेषताएं हैं। गजेटियर के अनुसार सन् 1757 में जब रुहेलों का शासनकाल था तब इस शहर की चहारदीवारी बनवाकर सभी दिशाओं में दस गेट बनवाए गए थे। इन दरवाजों से ही शहर में आया-जाया जा सकता था। लोहे के बने इन दरवाजों में शाम होते ही ताले जड़ दिए जाते थे। यही नहीं गेटों पर बनीं छतरियों पर दरबान पहरेदारी करते थे। उसी समय सल्तनत बदली और अंग्रेजों की हुकूमत शुरू हुई। रुहेलों और इनके बाद अंग्रेजों द्वारा बनवाई गई भव्य इमारतें इनके जाने के बाद भी अवशेषों के रूप में अभी भी मौजूद हैं। इन खाली पड़ी इमारतों पर स्थानीय लोग काबिज हो गए।
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आजादी से पहले कहा जाता था कंपनी बाग, अब नगर पालिका कार्यालय
चंदौसी। आजादी के पूर्व से ही कारोबारी माहौल ने व्यापारियों को अपनी ओर आकर्षित किया तो कस्बे में तब्दील हो गया। देशी घी की प्राचीन मंडी से लेकर दलहन, तिलहन के बाजार इस शहर की खास पहचान बन गए। पहले रुहेलों और बाद में अंग्रेजों की फौज के सिपाही चंदौसी में रात को ठहरते थे, अपने घोड़े भी यहीं रखते थे। इसे कंपनी बाग कहा जाता था। इसे आजादी के बाद गांधी पार्क के नाम से जाना जाता है। अब इसमें नगर पालिका का कार्यालय संचालित है।
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आदर्श नगर काॅलोनी में रह रहे बीस से अधिक परिवार
चंदौसी। अंग्रेजों के जाने के बाद अमल में आई आदर्श नगर काॅलोनी में वर्तमान समय में 20 से अधिक परिवार रह रहे हैं। अधिकतर मकानों में तीसरी पीढ़ी रह रही है। करीब 1960 के बाद नगर पालिका की पहल पर सभी आवासों में बिजली और पानी के कनेक्शन दिए गए। जिन लोगों के नाम आवास का आवंटन हुआ था वो तो अब नहीं रहे। उनके वारिस के तौर पर रही उनकी तीसरी पीढ़ी के नाम आवास आवंटन हस्तांतरण में पालिका की ओर से हीलाहवाली की जा रही है।
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-- -- -- -- -- -- -- शहर के लोगों की अपेक्षा-- -- -- -- -- --
- बरसात के दिनों में सड़कों पर होने वाले जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान हो।
- शहर के सभी नाले व नालियों से अतिक्रमण पूरी तरह से समाप्त किया जाना चाहिए।
- शहर में वाहनों की पार्किंग के लिए कम से कम तीन स्थानों पर व्यवस्था की जानी चाहिए।
- गलियों में तब्दील होने वाली सड़कों का चौड़ीकरण किया जाना चाहिए।
- शहर के सभी छोटे-बड़े पार्काें का सौंदर्यीकरण किया जाना चाहिए।
- फुटपाथों पर लगे ठेले व फड़ वालों को हटाकर वेंडिंग जोन में भेजा जाना चाहिए।
- सीवर लाइन के साथ ही ड्रेनेज सिस्टम की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
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शहर की पहचान बने कई कारोबार
चंदौसी। शहर को जिले की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता है। चार दशक पहले मेंथा का कारोबार यहां से शुरू हुआ तो देश ही नहीं दुनिया के कई देशों में मेंथा आयल और इससे बने उत्पादों का निर्यात किया जाने लगा। देश प्रसिद्ध घी की मंडी भी यहीं पर रही थी। चंदौसी की कटपीस भरी दूरदराज तक मशहूर रही। इसके अलावा जूता बनाने का कारोबार भी यहां बड़े स्तर पर हो रहा है। प्लास्टिक के बोरे और भूसा भरने के वाटरप्रूफ बोंगे बनाने का काम भी यहां बड़े स्तर पर हो रहा है। गजक के मामले में भी कई मंडलों तक इस शहर की पहचान है। संवाद
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कोट-
पहले चेयरमैन और सभासदों का चुनाव प्रतिष्ठा के लिए होता था। यह पद आमदनी का जरिया नहीं थे। आज भी अगर सभासद और पालिकाध्यक्ष सामंजस्य के साथ शहर को बेहतर बनाने का प्रयास करें तो चार चांद लग सकते हैं। पहले इतना पैसा भी शहर के विकास को नहीं मिलता था, लेकिन अब तो भरपूर पैसा मिल रहा है, ऐसे में बहुत बड़ा परिवर्तन हो सकता है।
-डा. राजीव लोचन शर्मा, स्थानीय निवासी
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एक जनवरी 1989 से 13 मार्च 1992 तक हमारे पिता जी कृपा नंदन नगर पालिका के चेयरमैन रहे थे, लेकिन पद पर रहते हुए ही उनका निधन हो गया था। उस समय पालिका की सीमित आमदनी होती थी और उसी से नगर में विकास कार्य कराए जाते थे, लेकिन अब तो सरकार से करोड़ों रुपया नगर विकास के लिए मिलता है, ऐसे में शहर की काया ही पलट जानी चाहिए।
-कौशल नंदन, व्यवसायी
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शहर को चमकाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। सड़कें बनवाने के साथ ही शहर के मुख्य मार्गों पर फैंसी पोल लगवाकर खूबसूरत लाइटें लगवाई गई हैं। बरसात के दौरान सड़कों पर होने वाले जलभराव की समस्या को देखते हुए कई बड़े नालों का निर्माण कराया गया है। अमृत पेयजल योजना के तहत डाली गई पाइप लाइन की लीकेज को लेकर अब पाइप लाइनें बदलने का काम भी कराया जा रहा है।
- लता वाष्णेय, पालिकाध्यक्ष चंदौसी
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आंकड़ों के अनुसार मंडल की पहली नगर पालिका है चंदौसी
चंदौसी। प्रदेश में लखनऊ समेत जिन चार नगर पालिकाओं का गठन किया गया था, उनमें चंदौसी को भी आठ जुलाई 1863 में नगर पालिका का दर्जा मिला था। आंकड़े बताते हैं कि यह नगर पालिका मंडल की पहली है। इसके छह महीने बाद मुरादाबाद नगर पालिका का गठन हुआ था। इसके पहले चेयरमैन राव साहब जगन्नाथ बने थे। अब तक इस नगर पालिका में चेयरमैन के पद पर 28 महिला पुरुष आसीन रहे हैं। पालिका गठन के समय शहर की आबादी करीब 23 हजार थी और अब यहां की जनसंख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1.55 लाख से अधिक है। पहले वार्ड की संख्या भी कम थी, लेकिन अब शहर को 25 वार्ड में बांटा गया है।
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दस दरवाजों के बीच तालाें में बंद रहने वाला शहर
यूं तो ऐतिहासिक शहर चंदौसी की कई विशेषताएं हैं। गजेटियर के अनुसार सन् 1757 में जब रुहेलों का शासनकाल था तब इस शहर की चहारदीवारी बनवाकर सभी दिशाओं में दस गेट बनवाए गए थे। इन दरवाजों से ही शहर में आया-जाया जा सकता था। लोहे के बने इन दरवाजों में शाम होते ही ताले जड़ दिए जाते थे। यही नहीं गेटों पर बनीं छतरियों पर दरबान पहरेदारी करते थे। उसी समय सल्तनत बदली और अंग्रेजों की हुकूमत शुरू हुई। रुहेलों और इनके बाद अंग्रेजों द्वारा बनवाई गई भव्य इमारतें इनके जाने के बाद भी अवशेषों के रूप में अभी भी मौजूद हैं। इन खाली पड़ी इमारतों पर स्थानीय लोग काबिज हो गए।
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आजादी से पहले कहा जाता था कंपनी बाग, अब नगर पालिका कार्यालय
चंदौसी। आजादी के पूर्व से ही कारोबारी माहौल ने व्यापारियों को अपनी ओर आकर्षित किया तो कस्बे में तब्दील हो गया। देशी घी की प्राचीन मंडी से लेकर दलहन, तिलहन के बाजार इस शहर की खास पहचान बन गए। पहले रुहेलों और बाद में अंग्रेजों की फौज के सिपाही चंदौसी में रात को ठहरते थे, अपने घोड़े भी यहीं रखते थे। इसे कंपनी बाग कहा जाता था। इसे आजादी के बाद गांधी पार्क के नाम से जाना जाता है। अब इसमें नगर पालिका का कार्यालय संचालित है।
आदर्श नगर काॅलोनी में रह रहे बीस से अधिक परिवार
चंदौसी। अंग्रेजों के जाने के बाद अमल में आई आदर्श नगर काॅलोनी में वर्तमान समय में 20 से अधिक परिवार रह रहे हैं। अधिकतर मकानों में तीसरी पीढ़ी रह रही है। करीब 1960 के बाद नगर पालिका की पहल पर सभी आवासों में बिजली और पानी के कनेक्शन दिए गए। जिन लोगों के नाम आवास का आवंटन हुआ था वो तो अब नहीं रहे। उनके वारिस के तौर पर रही उनकी तीसरी पीढ़ी के नाम आवास आवंटन हस्तांतरण में पालिका की ओर से हीलाहवाली की जा रही है।
- बरसात के दिनों में सड़कों पर होने वाले जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान हो।
- शहर के सभी नाले व नालियों से अतिक्रमण पूरी तरह से समाप्त किया जाना चाहिए।
- शहर में वाहनों की पार्किंग के लिए कम से कम तीन स्थानों पर व्यवस्था की जानी चाहिए।
- गलियों में तब्दील होने वाली सड़कों का चौड़ीकरण किया जाना चाहिए।
- शहर के सभी छोटे-बड़े पार्काें का सौंदर्यीकरण किया जाना चाहिए।
- फुटपाथों पर लगे ठेले व फड़ वालों को हटाकर वेंडिंग जोन में भेजा जाना चाहिए।
- सीवर लाइन के साथ ही ड्रेनेज सिस्टम की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
शहर की पहचान बने कई कारोबार
चंदौसी। शहर को जिले की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता है। चार दशक पहले मेंथा का कारोबार यहां से शुरू हुआ तो देश ही नहीं दुनिया के कई देशों में मेंथा आयल और इससे बने उत्पादों का निर्यात किया जाने लगा। देश प्रसिद्ध घी की मंडी भी यहीं पर रही थी। चंदौसी की कटपीस भरी दूरदराज तक मशहूर रही। इसके अलावा जूता बनाने का कारोबार भी यहां बड़े स्तर पर हो रहा है। प्लास्टिक के बोरे और भूसा भरने के वाटरप्रूफ बोंगे बनाने का काम भी यहां बड़े स्तर पर हो रहा है। गजक के मामले में भी कई मंडलों तक इस शहर की पहचान है। संवाद
कोट-
पहले चेयरमैन और सभासदों का चुनाव प्रतिष्ठा के लिए होता था। यह पद आमदनी का जरिया नहीं थे। आज भी अगर सभासद और पालिकाध्यक्ष सामंजस्य के साथ शहर को बेहतर बनाने का प्रयास करें तो चार चांद लग सकते हैं। पहले इतना पैसा भी शहर के विकास को नहीं मिलता था, लेकिन अब तो भरपूर पैसा मिल रहा है, ऐसे में बहुत बड़ा परिवर्तन हो सकता है।
-डा. राजीव लोचन शर्मा, स्थानीय निवासी
एक जनवरी 1989 से 13 मार्च 1992 तक हमारे पिता जी कृपा नंदन नगर पालिका के चेयरमैन रहे थे, लेकिन पद पर रहते हुए ही उनका निधन हो गया था। उस समय पालिका की सीमित आमदनी होती थी और उसी से नगर में विकास कार्य कराए जाते थे, लेकिन अब तो सरकार से करोड़ों रुपया नगर विकास के लिए मिलता है, ऐसे में शहर की काया ही पलट जानी चाहिए।
-कौशल नंदन, व्यवसायी
शहर को चमकाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। सड़कें बनवाने के साथ ही शहर के मुख्य मार्गों पर फैंसी पोल लगवाकर खूबसूरत लाइटें लगवाई गई हैं। बरसात के दौरान सड़कों पर होने वाले जलभराव की समस्या को देखते हुए कई बड़े नालों का निर्माण कराया गया है। अमृत पेयजल योजना के तहत डाली गई पाइप लाइन की लीकेज को लेकर अब पाइप लाइनें बदलने का काम भी कराया जा रहा है।
- लता वाष्णेय, पालिकाध्यक्ष चंदौसी